Search This Blog

Tuesday, June 9, 2020

मिहिर भोज की मुद्रा


डॉ. सुशील भाटी

सियादोनी अभिलेख, आहड अभिलेख और कमान अभिलेख से हमें पूर्व-मध्यकाल  (600-1000 ई) के दौरान उत्तर भारत में ‘दम्म्र’ नामक मुद्रा के प्रचलन के विषय में ज्ञात होता हैं| द्रम्म शब्द की उत्पत्ति मुद्रा के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द ‘द्रच्म’ से हुई हैं| द्रम्म शब्द चांदी की उस मुद्रा के लिए प्रयोग होता था, जिसका भार मानदंड यूनानी द्रच्म मुद्रा पर आधारित होता था|

सियादोनी अभिलेख (902-96 ई.) में ‘विग्रहपाल’ तथा ‘आदिवराह’ द्रम्म नामक मुद्राओ का उल्लेख हुआ हैं| वस्तुतः गुर्जर प्रतिहार काल में उत्तर भारत में ‘विग्रहपाल’, ‘आदिवराह’ तथा विनायकपाल अंकित द्रम्म मुद्रा प्रचलित थी| अलाउद्दीन खिलजी की दिल्ली टकसाल के अधिकारी ठक्कर फेरु (1291-1323 ई.) ने द्रव्य परीक्षा नामक एक ग्रन्थ लिखा, जिसमे उसने ‘वराहमुद्रा’ का उल्लेख किया हैं| इस आदिवराह अथवा वराह मुद्रा की पहचान उत्तर भारत से प्राप्त श्रीमदआदिवराहअंकित सिक्को से की जाती हैं| श्रीमद आदिवारह गुर्जर प्रतिहार शासक मिहिर भोज का बिरुद था अतः ऐसा माना जाता हैं कि ये सिक्के उसी के द्वारा ज़ारी किये गए थे|

मिहिरभोज के ग्वालियर अभिलेख में भी मुद्रा के लिए द्रम्म शब्द प्रयुक्त हुआ हैं| श्रीमदआदिवराह द्रम्म में ऊपर की तरफ वराह अवतार तथा सूर्य चक्र अंकित हैं| वराह अवतार का सिर वराह का और धड़ मनुष्य का हैं| सिक्को के दूसरी तरफ श्रीमदआदिवराहलिखा हैं तथा सासानी ढंग की वेदी उत्कीर्ण हैं|

‘आदिवराह’ द्रम्म को हिन्द-सासनी सिक्को में वर्गीकृत किया जाता रहा हैं, क्योकि इन सिक्को का डिजाईन ईरान के सासानी वंश के शासको के सिक्को जैसा हैं| 484 ई. में हूणों ने ईरान के सासानी वंश के शासक फ़िरोज़ को युद्ध में पराजित कर दिया| उसके पश्चात् छठी शताब्दी में  अलखान हूणों ने उत्तर और पश्चिम भारत में सासनी ढंग की वेदी वाले सिक्के प्रचलित किये| हूणों के इन्ही सिक्को का अनुसरण गुर्जर राज्यों ने किया| यह भी उल्लेखनीय हैं कि कल्हण कृत राजतरंगिणी ग्रन्थ (1149 ई.) में पंजाब के राजा का नाम अलखान गुर्जर बताया गया हैं अलखान गुर्जर का युद्ध कश्मीर के शासक शंकरवर्मन (885-902 ई.) के साथ हुआ था| स्पष्ट हैं कि नवी शताब्दी के अंत में अलखान हूण गुर्जर के रूप में जाने जा रहे थे, अतः गुर्जरों द्वारा हूणों की मुद्रा का अनुकरण स्वाभाविक था|  

प्रतिहारो के सामन्तो ने भी अपने सिक्के चलाये| मेवाड़ में चलने वाले सिक्के चौड़े और पतले हैं जोकि हूणों के सिक्को से अधिक मिलते हैं| इन सिक्को पर अग्निवेदिका की सेविकाए हीरो के मनको से निर्मित तीन श्रंखलाओ के रूप में दर्शायी गई हैं| के इन सिक्को का प्रचलन क्षेत्र भीलवाड़ा-मेवाड़ था| ये सिक्के गुहिलोत शासको ने चलाये थे| गुर्जर प्रतिहारो के शाही सिक्को की तुलना में इन सिक्को में चांदी की मात्रा कम हैं| इस प्रकार के 3000 सिक्को का ढेर भीलवाड़ा जिले से प्राप्त हुआ हैं| इस प्रकार के सिक्को का एक और पिपलांज से प्राप्त हुआ हैं| ये सिक्के अठारवी शताब्दी तक प्रचलन में रहे तथा फडिया/पड़िया कहलाते थे| जॉन एस. ड़ेयेल्ल (John S Deyell) के अनुसार चौदहवी शताब्दी के आरम्भ दिल्ली टकसाल के अधिकारी फेरु ठक्कर ने पड़िया मुद्रा को ‘गुर्जर सिक्का’ कहा हैं|

गुजरात का चाप सामन्तो ने भी चांदी के सिक्के चलाये| अपने डिजाईन के कारण ये सिक्के भी हिन्द-सासानी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं| के इन सिक्को में चांदी की मात्रा गुर्जर प्रतिहारो के सिक्को से भी अधिक थी|

उज्जैन-कन्नौज के प्रतिहारो से पूर्व में भी गुर्जरों ने सासानी ढंग के सिक्के जारी किये थे|  सातवी शताब्दी में गुर्जर देश की राजधानी भीनमाल से भी सासानी ढंग की अग्निवेदिका वाले सिक्के जारी किये गए थे| उस समय गुर्जर देश पर चाप (चावड़ा) वंश के व्याघ्रमुख का शासन था| इन सिक्को को गदहिया सिक्के भी कहते हैं| एक जैन लेखक के विवरण से यह तथ्य ज्ञात होता हैं कि गदहिया सिक्केभीनमाल से ज़ारी किये गए थे| भीनमाल से ज़ारी किये गए गदहिया सिक्के हूणों के सिक्को का अनुकरण हैं| हूणों के सिक्को पर भी सासानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण हैं| गदहिया सिक्को का सम्बन्ध गुर्जरों से रहा हैं तथा इनके द्वारा शासित पश्चिमी भारत में सातवी से लेकर दसवी शताब्दी तक भारी प्रचलन में रहे हैं| चाप (चावड़ा) वंश के गुजरात में प्रबल होने पर गदहिया सिक्को का प्रचलन गुजरात में बढ़ गया|

इब्न खोर्दाद्बेह (Ibn Khordadbeh) जिसकी मृत्यु 912 में हुई थी, उसके अनुसार हज़र (गुर्जर) राज्य में तातारिया सिक्के भी प्रचलन में थे|

छोटे व्यापारिक लेनदेन के लिए कौड़ियो का प्रचलन भी था| ऊपरी गंगा घाटी के खजौसा (Khajausa) नामक स्थान से अदिवराह तथा विनायकपाल द्रम्म के साथ कौड़िया भी प्राप्त हुई हैं|

यह ज्ञात करना कि गुर्जर प्रतिहारो के शासनकाल में कितनी मात्रा में मुद्रा प्रचलित थी, काफी कठिन कार्य हैं| भू राजस्व व्यवस्था, सैन्य विभाग तथा स्थानीय और विदेशी व्यापार के सुचारू परिचालन के लिए एक स्थिर मुद्रा व्यवस्था की आवश्यकता थी| राज्य की आय का मुख्य स्त्रोत भू राज़स्व था, वही राजकोष का धन मुख्य रूप शाही परिवार और सेना पर से खर्च किया जाता था| स्थानीय और विदेशी व्यापारिक गतिविधियाँ और लेन-देन काफी मात्रा में किया जाता हैं| कन्नौज, अहिछत्र (बरेली), पुराना किला (दिल्ली), अतरंजीखेड़ा, राजघाट (वाराणसी), आदि प्राचीन नगर प्रतिहार काल में भी फलते-फूलते रहे| तत्तनन्दपुर (आहर), सियादोनी, जिला- झाँसी , गोपाद्री (ग्वालियर), पृथुदक (पेहोवा), नडुल्ल आदि नए नगरो का उदय गुर्जर प्रतिहार काल में हुआ| इन नगर में बाज़ार और व्यापारिक समुदाय अस्तित्व में थे| अल बिरूनी के ग्रन्थ किताब उल हिन्द (1030 ई.) से हम उत्तर भारत के व्यापारिक मार्गो की जानकारी प्राप्त होती हैं| विदेशो से घोड़ो का व्यापार किया जाता हैं| भारत में गुर्जर राज्य की घुड़सवार सेना सबसे अच्छी थी| पेहोवा अभिलेख (882 ई.) के अनुसार वहाँ घोड़ो की खरीद-फरोख्त की एक मंडी थी| अल मसूदी के अनुसार बौरा (वराह) के चार सेनाये थी, उत्तर की सेना मुल्तान के विरुद्ध, दक्षिण की सेना मनकीर (मान्यखेट) के बल्हर (वल्लभ) के विरुद्ध तैनात रहती थी| दो सेनाए हमेशा किसी भी आवश्यता पड़ने पर किसी भी दिशा में कूच के लिए तैयार रहती थी| सीमाओं पर तैनात सैनिको के लिए नकद वेतन की व्यवस्था की आवश्यकता रही होगी|  जॉन एस. डेयेल्ल (John S Deyell) ने अपने विश्लेषण में ए. के. श्रीवास्तव के अध्ययन को आधार बनाया हैं| इस विश्लेषण के अनुसार 1882-1979 तक उत्तर प्रदेश में गुप्त काल (300-500 ई.) के कुल 21 ढेरो से 159 सिक्के प्राप्त हुए हैं, जबकि पूर्व मध्काल (600-1000ई.) / गुर्जर प्रतिहार काल के 110 ढेरो से 16121 द्रम्म सिक्के प्राप्त हुए हैं| गुर्जर प्रतिहार काल में मुद्रा की कमी नहीं थी, वरन इस काल में गुप्त काल से अधिक मुद्रा प्रचलित थी| 

सन्दर्भ-

1. John S Deyell, The Gurjara Pratiharas, Trade in Early India (Edited) Ranabir  Chakravarti, OUP, New Delhi, 2001, p 396-415
2. A K Shrivastava, Coin Hoards of Uttar Pradesh 1882-1979, Lucknow, 1980
3. Surabhi Srivastava,  “Coins and Currency system under the Gurjara Pratiharas of kannauj” Proceedings of the Indian History Congress, vol. 65, 2004, pp. 111–120., www.jstor.org/stable/44144724. Accessed 15 May 2020.
4. B N Puri, History of Gurjara Pratihara, Bombay, 1957
5. Sushil Bhati, Huna origin of Gurjara clans, Janitihas blogspot.com, 2015 https://janitihas.blogspot.com/2015/01/huna-origin-of-gurjara-clans.html
6. Sushil Bhati, Gurjar Pratiharo ki Huna Virasat, Janitihas blogspot.com, 2016 https://janitihas.blogspot.com/2016/11/blog-post.html
7. K M Munshi, Glory That Was Gurjara Desha,
8. R S Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1960
9. R C Mazumdar, The age of Imperial Kannauj, Bombay, 1955
10. B.N. Mukherjee, ‘Gold Coin of Pratihara Bhoja I’, Numismatic Digest VII, (1983), pp.60-61
11. Lalallanji Gopal, Economic Life of Northern India, C.A.D. 700-1000, Delhi, 1965
12. V. A. Smith, The Gurjaras of Rajputana and Kanauj, Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland, (Jan., 1909), pp.53-75

No comments:

Post a Comment