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Wednesday, May 26, 2021

शाक्य कुल

डॉ. सुशील भाटी

गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में नेपाल की तराई स्थित लुम्बिनी वन में हुआ था| उनके पिता का नाम शुद्रोधन और माता का नाम महामाया था| शुद्रोधन शाक्य गणसंघ  के मुखिया था तथा राजा कहलाते थे| पाली भाषा में शाक्य के स्थान पर सक्य अथवा सक्क शब्द आया हैं|

गौतम बुद्ध के समय आधुनिक उत्तरी बिहार में कपिलवस्त के शाक्य, पावापुरी और कुसिनारा के मल्ल, वैशाली के लिच्छवी, मिथिला के विदेह, रामगाम के कोलिये, पीपलवन के मोरिये आदि गणसंघ अस्तित्व में थे| पाली भाषा में गण का अर्थ कबीला होता हैं| इस प्रकार ये गणसंघ कबीलाई संघ थे, जिनका शासन कबीले के प्रमुख लोगो (गणमान्यो) की आपसी सहमति या बहुमत के आधार पर चलता था| इन्ही गणसंघो में से एक शाक्य था, जिसमे गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था| कौशल नरेश विरुधक जिसकी माँ शाक्य कुल की थी, उसने कपिलवस्तु पर आक्रमण कर उनकी राजनैतिक शक्ति और पहचान को नष्ट कर दिया था|

भारत में लगभग 80 ईसा पूर्व से हमें शक जाति के राजाओ का इतिहास प्राप्त होता हैं, जोकि  भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्रो में चार सो वर्ष तक शक्तिशाली राजनैतिक तत्व के रूप में विधमान रहे, हालाकि शको ने कुषाणों की अधीनता स्वीकार कर ली थी| कनिष्क के रबाटक अभिलेख से ज्ञात होता हैं कि उसके शासन के पहले वर्ष में उज्जैन उसके साम्राज्य का हिस्सा था| उस समय वहां शक शासक चष्टन कनिष्क के क्षत्रप के रूप में तैनात था| कनिष्क कुषाण (कसाना) के सिक्को पर कुषाणों की आर्य नामक भाषा में  गौतम बुद्ध को ϷΑΚΑΜΑΝΟ ΒΟΔΔΟ (Shakamano Boddo, शकमनो बोददो) अंकित किया गया हैं| गौतम बुद्ध के शाक्य कुल से क्या इन शको का कोई सम्बन्ध था अथवा नहीं यह खोजबीन का विषय हैं| कुछ विद्वान जिनमे माइकल वितजेल ततः क्रिस्टोफर एल. बेकविथ मुख्य हैं गौतम बुद्ध के शाक्य कबीले को शक ही मानते हैं| अगर यह सच हैं तो शायद इसी कारण से शको ने अपने शासनकाल में बौद्ध धर्म का काफी समर्थन किया

वर्तमान उत्तर प्रदेश में शाक्य काछी जाति का एक घटक भी  हैं|

बौद्ध पाली  साहित्य में गौतम बुद्ध को खत्तिय बताया गया हैं| ऐसा प्रतीत होता हैं कि उस समय शासक वर्ग के लिए खत्तिय या क्षत्तिय शब्द काफी बड़े भूभाग पर प्रचलित था| बेहिस्तून अभिलेख के अनुसार ईरान के  शासक दारा (522-486) की उपाधी क्षत्तिय क्षत्तियानाम थी| अलग-अलग क्षेत्रो में बोलचाल की भाषा  में  क्ष ध्वनि ख में प्रवर्तित हो जाती हैं, जैसे क्षेत्र का खेत हो जाता हैं| पंजाब  में एक जाति का नाम खत्री हैं जोकि क्षत्री का एक रूप हैं| खत्तिय तथा क्षत्तिय का संस्कृत रूप क्षत्रिय हैं| इस प्रकार संभवतः बेहिस्तून अभिलेख क्षत्रिय शब्द के प्रयोग का प्राचीनतम पुरातात्विक प्रमाण हैं और पाली का खत्तिय शब्द प्राचीनतम साहित्यिक प्रमाण हैं| कनिष्क (78-101 ई,) ने भी रबाटक अभिलेख में अपने साम्राज्य के राजसी वर्ग के लिए क्षत्रिय शब्द प्रयोग किया हैं|

सन्दर्भ-

1. Attwood, Jayarava. (2012). Possible Iranian Origins for the Śākyas and Aspects of Buddhism.. Journal of the Oxford Centre for Buddhist Studies. 3. 47-69. https://www.researchgate.net/publication/280568234_Possible_Iranian_Origins_for_the_Sakyas_and_Aspects_of_Buddhism/link/55ba4cfb08aec0e5f43e995a/download

2.  Some scholars, including Michael  Witzel and Chritopher l Beckwith  suggested that the Shakyas, the clan of the historical Gautam Buddha  were originally Scythian from Central  Asia, and that the Indian ethnonym Śākya has the same origin as “Scythian”, called Sakas in India. This would also explain the strong support of the Sakas for the Buddhist faith in India. https://en.wikipedia.org/wiki/Indo-Scythians

3. https://socrethics.com/Folder2/Hellenism-Buddhism.htm

4. Darius and Xerexs called themselves Kshatiya = Skt. Kshatriya , Pali’s Khattiya.. Chandra Chakraberty, The cultural History of Hindus, Calcutta, p253

5. https://en.wikipedia.org/wiki/Shakya

Thursday, February 11, 2021

­­­­­­­­दनकौर का युद्ध और “बहादुर बे-बदल” चंदू गूजर

डॉ. सुशील भाटी

Key Words- Bharatpur, Jat Kingdom, Gujar General,  Dankour, Jats, Gujars 

चंदू गूजर भरतपुर के जाट राज्य अंतर्गत ­रामगढ़ किले का किलेदार और कोइल क्षेत्र (वर्तमान अलीगढ) का सूबेदार था| जे. एम. सिद्दीकी (1981) ने उसका वास्तविक नाम चंद्रभान बताया हैं जबकि के. आर. कानूनगो (1925) ने उसका वास्तविक नाम चन्दन बताया हैं| इतिहास में चंदू गूजर को उसकी अप्रतिम बहादुरी के लिए जाना जाता हैं| मुगल साम्राज्य और भरतपुर जाट राज्य के बीच 15 सितम्बर 1773 को हुए दनकौर युद्ध में उसके द्वारा प्रदर्शित की गई बहादुरी से प्रभावित होकर मुगलों के इतिहासकार खैर-उद-दीन ने अपने ग्रन्थ इबरतनामा (Ibratnama)  में उसे “बहादुर बे-बदल” कह कर पुकारा हैं| बहादुर बे-बदल का में अर्थ हैं-  बेजोड़ बहादुर अथवा अतुलनीय बहादुर|

उस समय भरतपुर राज्य के शासक राजा नवल सिंह (1771-76ई’) थे| राजा नवल सिंह राजा सूरजमल के ­­­तीसरे पुत्र तथा राजा जवाहर सिंह के भाई और उत्तराधिकारी थे| उस समय दिल्ली के मुग़ल दरबार में मिर्ज़ा नज़फ़ खान का बोलबाला था| वह मुग़ल दरबार में द्वितीय बख्शी के पद पर आसीन था तथा उसे मुग़ल बादशाह ने आमिर उल उमरा का ख़िताब दे रखा था| मिर्ज़ा नज़फ़ ने अनेक युद्धों में विजय प्राप्त कर मुगलों की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया|

आक्रमण को ही रक्षा की श्रेष्ठ नीति मानते हुए राजा नवल सिंह ने मुगलों की राजधानी दिल्ली पर हमला करने का निर्णय किया| नवल सिंह ने दिल्ली को एक साथ तीन तरफ से घेरने की योजना बनाई| उस समय दिल्ली के निकट भरतपुर जाट राज्य के तीन केंद्र थे, दिल्ली के पश्चिम में फर्रुखनगर, दक्षिण-पूर्व में कोइल (अलीगढ) क्षेत्र तथा दक्षिण में बल्लमगढ़| अतः इन तीनो जगहों को सैन्य आधार बना कर दिल्ली पर आक्रमण की योज़ना बनाई गई|  एक सेना को फर्रुखनगर से आक्रमण करना था, दूसरी सेना को अलीगढ से दोआब को तहस-नहस करना था तथा मुख्य सेना को राजा नवल सिंह के नेतृत्व में दक्षिण में बल्लमगढ़ से दिल्ली पर हमला करना था| योज़नानुसार युद्ध बरसात ख़त्म होने के बाद प्रारम्भ करना था तथा पंजाब के सिक्खों को हरयाणा और दोआब में मुगलों के खिलाफ भरतपुर का साथ देना था| इस योज़ना के जवाब में मुगलों के सेनापति मिर्ज़ा नज़फ़ खान ने राजा नवल सिंह का रास्ता रोकने के उद्देश्य से दिल्ली और बल्लमगढ़ के बीच बदरपुर में अपनी सेना के साथ डेरा डाल दिया|

बदरपुर से 6 मील पश्चिम में स्थित मैदानगढ़ी में एक किला था, जो कभी राजा सूरजमल ने बनवया था, यह किला अभी भी जाटो के नियंत्रण में था| इस किले से जाट छापा मारकर मुगलों के मवेशी और घोड़े ले गए| नजफ़ खान ने तुरंत मैदानगढ़ी पर हमला करने का आदेश दे दिया| कई घंटो के घमासान युद्ध के पश्चात मुगलों ने मैदानगढ़ी को जीत लिया|

इस प्रकार बरसात ख़त्म होने से पहले ही मुगलों और भरतपुर जाट राज्य की दुश्मनी बढ़ गई| ये सितम्बर की शुरुआत थी तथा सिक्ख अभी युद्ध के लिए तैय्यार नहीं थे| लेकिन प्रतिशोध की अग्नि में जल रहे राजा नवल सिंह ने मैदानगढ़ी में हुई अपनी हार के बदला लेने के कोई देरी नहीं की|

राजा नवल सिंह ने अपने रिश्तेदार दान साही के नेतृत्व में एक मज़बूत सेना को अतरौली और रामगढ़ भेज दिया, जहाँ दुर्जन सिंह गूजर और चंदू गूजर भरतपुर जाट राज्य के सूबेदार और किलेदार थे| चंदू गूजर, दान साही और दुर्जन सिंह गूजर ने 20,000 सैनिको की एक सेना को संगठित किया और दोआब पर आक्रमण कर दिया| इन्होने सिकन्द्राबाद को जीत लिया और दिल्ली तक के परगनों पर अधिकार कर लिया| अपने आदेश का उल्लघन करने वाले मुग़ल कर्मचारियों को फांसी पर लटका दिया| दूसरी तरफ फर्रुखनगर से शंकर जाट के नेतृत्व में भरतपुर की सेना ने दिल्ली के पश्चिम में घमासान मचा दिया और गढ़ी हरसरू (Garhi Harsaru) का घेरा डाल दिया| मुगलों की स्थिति की गम्भीर हो गई, बादशाह को बंगाल के सूबेदार से मदद मागनी पड़ी|

राजा नवल सिंह का सेना के साथ बल्लमगढ़ में मोजूद होने के कारण मिर्ज़ा नजफ़ खान बदरपुर में ही बना रहा, उसने नियाज़ बेग खान और ताज मौहम्मद खान बलोच के नेतृत्व में पांच हज़ार घुड़सवार चंदू गूजर, दान साही, और दुर्जन सिंह गूजर से मुकाबला करने के लिए भेज दिए| मुग़ल बादशाह ने भी लाल पठानों की एक सेना और तोपखाने की टुकडिया भरतपुर जाट राज्य के इन यौधाओ के विरुद्ध भेज दी| भरतपुर की सेना ने पीछे हटकर दनकौर में मोर्चा लगाया और चंदू गूजर के नेतृत्व में 15 सितम्बर 1773 को शाही मुग़ल सेना से एक भीषण  युद्ध लड़ा| दनकौर के इस भीषण युद्ध में चंदू गूजर भरतपुर जाट राज्य का प्रधान सेनापति था| उसने सेना का नेतृत्व करते हुए मुग़ल सेना के तोपखाना पर निर्भीकतापूर्वक जबरदस्त हमला बोल दिया|  इस हमले में चंदू गूजर की निर्भीकता ने मुग़ल के पुराने अनुभवी और रणकुशल सेनानियों को भी हैरत में डाल दिया| बहादुर गूजर सरदार चंदू ने पूरे वेग से दुश्मन के तोपखाने पर आक्रमण कर दिया, उसके सैनिक उसकी इस वीरता से प्रभावित होकर उत्तेजना और जीवन्तता से भर उठे और उसके पीछे-पीछे दुश्मन सेना पर टूट पड़े| चंदू गूजर के इस अंदाज़ से भयभीत मुग़ल बरकंदाजो ने गोलियों और और तोपचियों ने गोलों की बरसात कर दी| चंदू गूजर घायल हो गया और उसका आक्रमण छिन्न-भिन्न होने लगा परन्तु घायल होने के बावजूद वो अपने बहादुर सैनिको के साथ बरसती गोलियों में तोपो के गरजते गोलों का सामना करते हुए लगातार आगे बढ़ता गया| अपने घायल नेता के नेतृत्व में भरतपुर के सैनिक आगे बढ़ते गए और खपते गए, मात्र कुछ सैनिक ही मुग़ल सेना तक पहुँच सके| घायल चंदू गूजर और उसके उसके सैनिक तब तक नहीं रुके जब तक दुश्मन की संगीनों से मार कर गिरा नहीं दिए गए| के. आर. कानूनगो ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ़ जाट्स” में दनकौर के युद्ध में चंदू गूजर के साहस और बहादुरी का वर्णन इस प्रकार किया हैं-

Chandu  Gujar, who was the commander-in-chief of the Jat army, led the Van and attacked the sepoy regiments and the artillery of the Mughals With an intrepidity which astonished even the veteran Mughal cavaliers, the valiant Gujar  chief charged the enemy’s artillery at full gallop, animating his brave followers. But the volleys of musketry and artillery fearfully shattered the attacking column; only a small body of troopers headed by their wounded leader succeeded in penetrating the lines of the sepoys and fell there pierced by bayonets after performing prodigies of valour. The battle raged furiously for two or three hours ; it was an awul struggle of native valour of man against science and discipline.

चंदू गूजर के मारे जाने के बाद अतरौली के सूबेदार राव दुर्जन सिंह गूजर ने भी अपनी घुड़सवार सेना के साथ मुगलों को मुकाबला किया, परन्तु सफल नहीं हो सका| दान साही भी युद्ध में घायल हो गया और दो दिन बाद उसकी भी मृत्यु हो गई|

भरतपुर जाट राज्य के प्रधान सेनापति चंदू गूजर और उसके सैनिक दनकोर के युद्ध में खेत रहे परन्तु दुश्मन भी उनकी बे-मिसाल बहादुरी देखकर दंग रह गया, वह भी उनकी दिलेरी की प्रशंषा किये बिना नहीं रह सका| खैर-उद-दीन ने इबरतनामा पुस्तक में दनकौर के युद्ध का वर्णन करते हुए चंदू गूजर की वीरता की प्रशंषा की हैं, उसने उसे “बहादुर बे-बदल” अर्थात बेजोड़ यौद्धा अतुलनीय वीर कहा हैं| के. आर. कानूनगो ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ़ जाट्स” में  लिखते हैं कि

He Calls Chandu Gujar “Bahadur Be-Badal” [Unequalled in Bravery], and says that he was killed within the ranks of sepoys pierced by their bayonets [Ibratnama, MS., p 214]”

दनकौर युद्ध में चंदू गूजर का वीरगति को प्राप्त होना भरतपुर राज्य के लिए एक बड़ा झटका था, इसके परिणाम स्वरूप पडला मुग़ल सेनापति मिर्ज़ा नजफ़ खान के पक्ष में झुक गया, राजा नवल सिंह ने बल्लमगढ़ से डेरा उठा लिया और भरतपुर के तरफ लौट गए|   

सन्दर्भ ग्रन्थ -

1. Kalika-Ranjan Qanungo, History Of The Jats, Vol. I, M C Sarkar & Sons, Calcutta, 1925, p 250-57

2. Jadunath Sarkar, Fall Of The Mughal Empire, Vol. III, M C Sarkar & Sons, Calcutta, 1952, p 66-67

3. Uma Shankar Pandey, European Adventurers in Northern India 1750-1803, Taylor & Francis, 2019, P

4. J. M. Siddiqi, Aligarh District: A Historical Survey, from Ancient Times to 1803 A.D.. India: Munshiram Manoharlal, 1981,

5. Persian Records of Maratha History, 1952, p 73

6. D. H. Kolff,  Grass in Their Mouths: The Upper Doab of India Under the Company's Magna Charta, 1793-1830. Netherlands: Brill, 2010, p 149