Tuesday, February 11, 2014

भारत में जन इतिहास लेखन की चुनौती

डा. सुशील भाटी

भारत मे प्रजातंत्र के वास्तविक निर्माण के लिये आम जन के योगदान एवं उपलब्धियो का लिखा जाना आवश्यक है। किन्तु प्रश्न उठता है,  कैसे ? पूर्व का अधिकतर साहित्य एवं इतिहास लेखन तत्कालीन सभ्रान्त एवं उच्च वर्ग की उपब्धिपूर्ण भूमिका को रेखकिंत करता है। अतः इतिहास लेखन के लिये प्रयोग मे लाये जाने वाले सभी लिखित प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोत इसी सभा्रन्तवादी दृष्टिकोण से प्रभावित है। ऐसी स्थिति मे , पुरातात्विक स्त्रोतो के अतिरिक्त आम जन से जुडी मौखिक परम्पराओं, जन अनुश्रुतियो, मिथक, लोक कहावते, लोक गीत, लोकगाथाओं के अतिरिक्त लोक संगीत एवं कला का लिपिबद्ध किया जाना अति आवश्यक है। शहरी मजदूर, देहाती किसान एवं दूर दराज के जगंलो एवं पहाडो मे निवास करने वाले जनजातिय समुदायो के पास अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं एवं उपलब्धियो का व्यवस्थित एवं लिखित साहित्य एवं इतिहास नही होता है,  वे अपनी सांस्कृति एवं इतिहास को मौखिक रुप से ही अपनी नई पीढी को हस्तान्तरित करते है, इस कारण से आम जन के इतिहास लिखते समय मौखिक परम्पराओ का अनिवार्य स्रोत के रुप मे प्रयोग करना पडेगाआम जन का इतिहास सिर्फ पुस्तकालयो मे बैठकर नही वरन उनके बीच रहकर उनसे निरन्तर संवाद स्थापित करके ही लिखा जा सकता है।

इन्ही वर्गो  के बीच से ही कुछ युवा शोधार्थियो एवं इतिहासकारो को इस कार्य के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जिससे कि उनके भूतकाल के चित्रण मे उन्ही के मूल्यों एवं दृष्टिकोण का समावेश किया जा सके।

भारतीय इतिहास लेखन की अखिल भारतीय रुप रेखा मे आम जन का जिक्र लगभग नगण्य है। उनकी भूमिका क्षेत्रीय एवं स्थानीय इतिहास मे अधिक स्थान पा सकती है अतः इनका इतिहास लिखते समय स्थानीय राजस्व,  प्रशासनिक,  न्याययिक एवं जनगणना सम्बन्धी लेखे जोखे, गजेटेयर  आदि का उपयोग भी श्रेयस्कर है।

यह ध्यान रखने योग्य है कि इतिहास के शोध पत्र एवं ग्रन्थ पुस्तकालयो के धूल न चाटते रहे,  आम जन के इतिहास लिखने का उददेशय उनकी एक गरिमामयी पहचान स्थापित करना एवं उनमे एक प्रगतिशील चेतना का निर्माण करना है। इसके लिये आवश्यक है कि भारत की सभ्यता के विकास एवं भारत के स्वतंत्रता सघर्ष मे आम जन के योगदान एवं उपलब्धियो की गाथा आम समाज तक पहुचेजो कि तभी सम्भव है जब इतिहास आम आदमी के घर तक दस्तक दें, इतिहासकार इसके लिये आधुनिक प्रचार साधन - टीवी,  इन्टरनेट,  अखबार, पत्रिकायें आदि का उपयोग  कर सकते है। लघु पुस्तिकाए एवं पैम्पहलैट इत्यादि भी इस कार्य मे काफी उपयोगी हो सकते है। इतिहास संगोष्ठियो  एवं कार्यशालाओं मे आम जन की भागेदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये , साथ ही आम जलसो मे भी इतिहास की चर्चा के अवसर खोजे जाने चाहिये।  आखिर यह आम आदमी ही तो है, जिसे अपना इतिहास जानने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

 जन इतिहास का मूलमंत्र है -"जनता का इतिहास जनता के द्वारा जनता के लिये"|



                 

भारतीय इतिहास लेखन में सभ्रांतवादी दृष्टीकोण

डा. सुशील भाटी 

भारत के संविधान में प्रजातान्त्रिक राजव्यवस्था का प्रावधान है,  इस व्यवस्था को देश में लागू हुए लगभग छः दशक बीत चुके है, परन्तु भारतीय समाज में प्रजातान्त्रिक सोच पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो सकी। प्रजातान्त्रिक समाज आम जनता के निर्णय लेने की क्षमता में विश्वास करता है,  ऐसे समाजों मे सभी महत्वपूर्ण निर्णय आम जनता में सहमति के आधार पर किये जाते है। किसी भी कानून के निर्माण के लिए समाज में एक जनमत तैयार किया जाता है| बहुत से देशों में सीधे जनमत संग्रह कराकर देश हित के निर्णय लिए जाते है। आजादी के 63 वर्ष पश्चात् भी भारत का सभ्रांत वर्ग देश की आम जनता को लोकतान्त्रिक व्यवस्था के योग्य नहीं मानता,  यह समझता है कि अनपढ़ अर्धशिक्षित, गरीब और ग्रामीण जनता को समाज और देश के गम्भीर मसलों की कोई समझ नहीं है, उनके निर्णय धन के लोभ और बाहुबल के आंतक से आसानी से प्रभावित हो जाते है? अतः लोकतन्त्र का इस देश में कोई विशेष अर्थ नहीं है।

भारतीय समाज की इस अलोकतान्त्रिक सोच का भारतीय इतिहास लेखन पर भी व्यापक प्रभाव दिखाई पड़ता है। भारतीय इतिहासकारों का एक बड़ा तबका भारतीय सभ्यता के विकास एवं प्रगति में सभ्रांत वर्ग की भूमिका को रेखाकिंत करता नजर आता है,  इनके इतिहास लेखन में बडे नेताओं, बड़े परिवारों और राजवंशो को ही मुख्य स्थान दिया जाता है, इसमें आम जनता की भूमिका का कोई खास जिक्र-माजरा नहीं होता। सामान्य जन को विवेकहीन एवं सिर्फ अनुसरण करने वाला पिछलग्गू मान लिया जाता है।

वस्तुतः  भारतीय सभ्यता की शास्त्रीय परम्पराओं में से अधिकांश, सभ्रांत वर्ग द्वारा मजदूरों, किसानों, ग्रामीणों की विभिन्न आंचलिक परम्पराओं को व्यवस्थित एवं संगठित कर विकसित की गई है। जैसे कि, अमेरिकी मानव शास्त्री मैकिम मैरियट ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किशनगढ़ी गांव में, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से किये गये, अपने अध्ययन में सिद्व किया है कि भारत में लक्ष्मी पूजा एवं रक्षाबन्धन पर्व की परम्पराएं, लौकिक परम्पराओं के सर्वभौमिकरण का परिणाम है। भारतीय सभ्यता की प्रगति और आजादी की लड़ाई में भी आम जनता की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में आम जनता की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसकी शुरूआत करने वाले मंगल पाण्डे (29 मार्च, बैरकपुर) एवं धन सिंह गुर्जर (10 मई, मेरठ) क्रमशः सेना और पुलिस में साधारण सिपाही थे और ग्रामीण पृष्ठभूमि के किसान परिवारों से सम्बन्धित थे। हालांकि, धन सिंह उस समय मेरठ की सदर कोतवाली में कार्यवाहक कोतवाल थे। दिल्ली की आम जनता के द्वारा उसके भाईयों के मुकाबले रजिया सुल्तान के समर्थन की बात हो या तैमूर के आक्रमण के समय हरिद्वार के निकट उसका विरोध करने का, किसानों की सर्वखाप पंचायत के निर्णय का प्रसंग हो, भारत की आम जनता ने अनेक अवसरों पर अपने विवेक का प्रयोग कर अहम् भूमिका अदा की है।
वास्तव में, भारतीय इतिहास लेखन के इस सभ्रांतवादी दृष्टिकोण ने भारत में अलोकतान्त्रिक सोच का पोषण किया है। यदि भारत को सही अर्थो में लोकतान्त्रिक देश बनाना है, यदि भारत को कुछ लोगों का गौरवशाली राष्ट्र की बजाय सौ करोड लोगों का परिपक्व, सक्षम और सशक्त राष्ट्र बनाना है तो हमें समाज में आम जन की योग्यता और क्षमता में विश्वास जगाना होगा। हमें आम जन का इतिहास भी लिखना होगा।