Search This Blog

Showing posts with label लोक संस्कृति. Show all posts
Showing posts with label लोक संस्कृति. Show all posts

Sunday, February 17, 2013

गोधन पूजा और गोधन गीत ( Godhan Geet)

-डा. सुशील भाटी

 गोवर्धन अथवा गोधन पूजा का सम्बन्ध भगवान कृष्ण से हैं| भारत की शास्त्रीय परम्पराओ के अनुसार गोकुलवासियों को, भगवान इंद्र जनित बारिश और बाढ़ से, बचाने के लिए भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपने बाये हाथ की कनकी उंगुली पर उठा  लिया था और सभी गोकुलवासियों को पशुओ सहित उसके नीचे शरण देकर उनकी रक्षा की थी | तभी से गोवर्धन पर्वत की हर वर्ष पूजा की जाती हैं| भारत के अहीर, गुर्जर और जाट आदि किसान-पशुपालक चरवाहे समुदायों में यह त्यौहार विशेष लोकप्रिय हैं|

इतिहासकार केनेडी के अनुसार मथुरा के कृष्ण की बाल लीलाओ की कथाओ के जनक गुर्जर ही हैं| मथुरा इलाके में प्रचलित लोक मान्यताओ के अनुसार कृष्ण की प्रेमिका राधा बरसाना गांव की गुर्जरी थी और कृष्ण को पालने वाले नन्द बाबा और यशोदा माता भी गुर्जर थे| इबटसन कहता हैं कि पंजाब के गुर्जर नन्द मिहिर को अपना पूर्वज मानते हैं| रसेल के अनुसार मालवा इलाके की बड-गुर्जर खाप अपने को दूसरे गुर्जरों से बड़ा मानती हैं क्योकि वो अपने उत्पत्ति कृष्ण से मानते हैं| गुर्जरों और राजपूतो में पाए जाने वाले भाटी गोत्र की वंशावली भगवान कृष्ण के वंशज भाटी तक जाती हैं|

दक्षिणी एशिया में रहने वाला गुर्जर कबीला मूलतः एक पशुपालक अर्ध- घुमंतू चरवाहा समुदाय रहा हैं| इनके पूर्वज माने जाने वाले कुषाण और हूण कबीले भी पशुपालक घुमंतू चरवाहे थे| पश्चिमिओत्तर दक्षिणी एशिया से प्राप्त हूणों के सिक्को पर इनके राजा भैस के सींगो वाले मुकुट पहने दिखाई देते हैं| आज भी कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के घुमंतू गुर्जर चरवाहे मुख्यतः भैस पलते हैं गाय नहीं| भगवान कृष्ण की मथुरा कुषाणों की भी राजधानी रही हैं| एक कुषाण/कसाना सम्राट का नाम वासुदेव था जोकि कनिष्क महान का पोता था| शासक कबीलो का लोक मान्यताओ में स्थान बना लेना एक स्वाभाविक प्रक्रिया हैं, इसलिए मथुरा इलाके में गुर्जरों को कृष्ण से जोड़ना अस्वाभिक नहीं हैं|

इस त्यौहार में घरों में गाय-भैंस के गोबर से गोवर्धन पर्वत की देव रुपी आकृति बनायी जाती हैं, जिसे गोधन कहते हैं| गोधन के ऊपर गोबर के बने हुए गाय-भैंस और ग्वाले भी रखे जाते हैं| गोधन के साथ हंडिया-पारे और दूध बिलोने की रही भी रखी जाती हैं| इसके पैरों की तरफ एक गोबर का  कुत्ता भी बनाया जाता हैं| शाम के वक्त वहाँ एक दिया जलाया जाता हैं| घर-कुनबे-गांव के लोग ग्वाले के रूप में इक्कट्ठे होकर गोधन के दोनों ओर खड़े हो जाते हैं| तब गोधन गीत गाया जाता हैं, उसके बाद गोधन की परिक्रमा करते हैं|

नीचे दिया गया गोधन गीत का प्रचलन बुलंदशहर जिले के गंगा किनारे पर बसे गुर्जरों के गांवों में हैं| गीत में गोधन के अलावा मांडू (ग्वालो के आंचलिक देवता) , राधिका (राधा) और भोजला (भोज) का भी ज़िक्र हैं| मांडू एक ग्वाला था जिसका पेट फाड़ कर क़त्ल कर दिया गया था, गंगा के किनारे इसका मंदिर बना हुआ हैं| राधिका कृष्ण की प्रेमिका राधा हैं| भोजला प्रसिद्ध गुर्जर प्रतिहार सम्राट भोज प्रतीत होता हैं, जिसे गुर्जरों अपने इस लोक गीत में स्थान दिया हैं| कहाँ रजा भोज कहाँ गंगू तेली लोक कहावत का प्रसिद्ध भोज भी यही गुर्जर-प्रतिहार सम्राट हैं|

गोधन गीत

गोधन माडू रे तू बड़ों
तोसू बड़ों ना रे कोये
गोधन उतरो रे पार सू
उतरो गढ़ के रे द्वारे
कल टिको हैं रे जाट क
तो आज गूजर के रे द्वारे

उठके सपूती रे पूज ल
गोधन ठाडो रे द्वारे
ठाडो हैं तो रे रहन द
गौद जडूलो रे पूते

गोधन पूजे राधिका
भर मोतियन को रे थारे
एक जो मोती रे गिर गयो
तो ढूंढे सवरे रे ग्वारे

कारी को खैला बेच क
ओझा लूँगी रे छुटाए
इतने प भी न छुटो
तो बेचू गले को रे हारे

कारी-भूरी रे झोटियाँ
चलती होड़ा रे होडे
कारी प जड़ दू रे खांकडो
भूरी प जड़ दू रे हाँसे

कैसो तो कई य रे भोजला
कैसी वाकि रे मोछे
भूरी मोछन को रे भोजला
हिरन सिंगाडी रे आँखे

बंगरी बैठो रे मैमदो
मुड मुड दे रो रे असीसे
अजय विजय सुरेश इतने बाढियो
गंग-जमन के रे असीसे  
छोटे-बड्डे इतने रे बाढियो
गंग-जमन के रे नीरे


(स्त्रोत गोधन गीत- जैसा श्री नरेश नागर एवं श्री रोहित नागर  ने बताया)

Friday, December 14, 2012

छठ, छाठ और गुर्जर

डा. सुशील भाटी                            
Emperor Kanishka


सूर्य उपासना का महापर्व हैं- छठ पूजा| यह त्यौहार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश मनाया जाता हैं| सूर्य पूजा का यह त्यौहार क्योकि षष्ठी को मनाया जाता हैं इसलिए लोग इसे सूर्य षष्ठी भी कहते हैं| इस दिन लोग व्रत रखते हैं और संध्या के समय तालाब, नहर या नदी के किनारे, बॉस सूप घर के बने पकवान सजा कर डूबते सूर्य भगवान को अर्ध्य देते हैं| अगले दिन सुबह उगते हुए सूर्य को अर्ध्य दिया जाता हैं|

सूर्य षष्ठी के दिन सूर्य पूजा के साथ-साथ कार्तिकेय की पत्नी षष्ठी की भी पूजा की जाती हैं| पुराणों में षष्ठी को बालको को अधिष्ठात्री देवी और बालदा कहा गया हैं|

लोक मान्यताओ के अनुसार सूर्य षष्ठी के व्रत को करने से समस्त रोग-शोक, संकट और शत्रुओ का नाश होता हैं| निः संतान को पुत्र प्राप्ति होती हैं तथा संतान की आयु बढती हैं|

सूर्य षष्ठी के दिन दक्षिण भारत में कार्तिकेय जयंती भी मनाई जाती हैं और इसे वहाँ कार्तिकेय षष्ठी अथवा स्कन्द षष्ठी कहते हैं|

सूर्य, कार्तिकेय और षष्ठी देवी की उपासनाओ की अलग-अलग परम्परों के परस्पर मिलन और सम्मिश्रण का दिन हैं कार्तिक के शुक्ल पक्ष की षष्ठी| इन परम्पराओं के मिलन और सम्मिश्रण सभवतः कुषाण काल में हुआ|

चूकि भारत मे सूर्य और कार्तिकेय की पूजा को कुषाणों ने लोकप्रिय बनाया था, इसलिए इस दिन का ऐतिहासिक सम्बन्ध कुषाणों और उनके वंशज गुर्जरों से हो सकता हैं| कुषाण और उनका नेता कनिष्क (78-101 ई.) सूर्य के उपासक थे| इतिहासकार डी. आर. भंडारकार के अनुसार कुषाणों ने ही मुल्तान स्थित पहले सूर्य मंदिर का निर्माण कराया था| भारत मे सूर्य देव की पहली मूर्तिया कुषाण काल मे निर्मित हुई हैं| पहली बार कनिष्क ने ही सूर्यदेव का मीरो मिहिर के नाम से सोने के सिक्को पर अंकन कराया था| अग्नि और सूर्य पूजा के विशेषज्ञ माने जाने वाले  इरान के मग पुरोहित कुषाणों के समय भारत आये थे| बिहार मे मान्यता हैं कि जरासंध के एक पूर्वज को कोढ़ हो गया था, तब मगो को मगध बुलाया गया| मगो ने सूर्य उपासना कर जरासंध के पूर्वज को कोढ़ से मुक्ति दिलाई, तभी से बिहार मे सूर्य उपासना आरम्भ हुई|

भारत में कार्तिकेय की पूजा को भी कुषाणों ने ही शुरू किया था और उन्होंने भारत मे अनेक कुमारस्थानो (कार्तिकेय के मंदिरों) का निर्माण कराया था| कुषाण सम्राट हुविष्क को उसके कुछ सिक्को पर महासेन 'कार्तिकेय' के रूप में चित्रित किया गया हैं| संभवतः हुविष्क को महासेन के नाम से भी जाना जाता था| मान्यताओ के अनुसार कार्तिकेय भगवान शिव और पार्वती के छोटे पुत्र हैं| उनके छह मुख हैं| वे देवताओ के सेना देवसेना के अधिपति हैं| इसी कारण उनकी पत्नी षष्ठी को देवसेना भी कहते हैं| षष्ठी देवी प्रकृति का छठा अंश मानी जाती हैं और वे सप्त मातृकाओ में प्रमुख हैं| यह देवी समस्त लोको के बच्चो की रक्षिका और आयु बढाने वाली हैं| इसलिए पुत्र प्राप्ति और उनकी लंबी आयु के लिए देवसेना की पूजा की जाती हैं|

कुषाणों की उपाधि देवपुत्र थी और वो अपने पूर्वजो को देव कहते थे और उनकी मंदिर में मूर्ति रख कर पूजा करते थे, इन मंदिरों को वो देवकुल कहते थे| एक देवकुल के भग्नावेश कुषाणों की राजधानी रही मथुरा में भी मिले हैं| अतः कुषाण देव उपासक थे| यह भी संभव हैं कि कुषाणों की सेना को देवसेना कहा जाता हो|

देवसेना की पूजा और कुषाणों की देव पूजा का संगम हमें देव-उठान के त्यौहार वाले दिन गुर्जरों के घरों में देखने को मिलता हैं| कनिंघम ने आधुनिक गुर्जरों की पहचान कुषाणों के रूप में की हैं| देव उठान त्यौहार सूर्य षष्ठी के चंद दिन बाद कार्तिक की शुक्ल पक्ष कि एकादशी को होता हैं| पूजा के लिए बनाये गए देवताओं के चित्र के सामने पुरुष सदस्यों के पैरों के निशान बना कर उनके उपस्थिति चिन्हित की जाती हैं| गुर्जरों के लिए यह पूर्वजो को पूजने और जगाने का त्यौहार हैं| गीत के अंत में कुल-गोत्र के देवताओ के नाम का जयकारा लगाया जाता हैं, जैसे- जागो रे कसानो के देव या जागो रे बैंसलो के देव| देव उठान पूजन के अवसर पर गए जाने वाले मंगल गीत में घर की माताओं और उनके पुत्रो के नाम लिए जाते है और घर में अधिक से अधिक पुत्रो के जन्मने की कामना और प्रार्थना की जाती हैं|

देवसेना और देव उठान में देव शब्द की समानता के साथ पूजा का मकसद- अधिक से अधिक पुत्रो की प्राप्ति और उनकी लंबी आयु की कामना भी समान हैं| दोनों ही त्यौहार कार्तिक के शुक्ल पक्ष में पड़ते हैं|

Last Hindu Emperor of North India - Mihir Bhoj 
गुर्जरों के साथ सूर्य षष्ठी का गहरा संबंध जान पड़ता हैं क्योकि सूर्य षष्ठी को प्रतिहार षष्ठी भी कहते हैं| प्रतिहार गुर्जरों का प्रसिद्ध ऐतिहासिक वंश रहा हैं| प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज (836-885 ई.) के नेतृत्व मे गुर्जरों ने उत्तर भारत में अंतिम हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया था, जिसकी राजधानी कन्नौज थी| मिहिरभोज ने बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को जीत कर प्रतिहार साम्राज्य मे मिलाया था, सभवतः इसी कारण पश्चिमी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ भाग को आज तक भोजपुर कहते हैं| सूर्य उपासक गुर्जर और उनका प्रतिहार राज घराना सूर्य वंशी माने जाते हैं| गुर्जरों ने सातवी शताब्दी मे, वर्तमान राजस्थान मे स्थित, गुर्जर देश की राजधानी भिनमाल मे जगस्वामी सूर्य मंदिर का निर्माण किया गया था| इसी काल के, भडोच के गुर्जरों शासको के, ताम्रपत्रो से पता चलता हैं कि उनका शाही निशान सूर्य था| अतः यह भी संभव हैं कि प्रतिहारो के समय मे ही बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सूर्य उपासना के त्यौहार सूर्य षष्ठी को मनाने की परम्परा पड़ी हो और प्रतिहारो से इसके ऐतिहासिक जुड़ाव के कारण सूर्य षष्ठी को प्रतिहार षष्ठी कहते हो|

गुर्जर समाज मे छठ पूजा का त्यौहार सामान्य तौर पर नहीं होता हैं, परतु राजस्थान के गुर्जरों मे छाठ नाम का एक त्यौहार कार्तिक माह कि अमावस्या को होता हैं| इस दिन गुर्जर गोत्रवार नदी या तालाब के किनारे इक्कट्ठे होते हैं और अपने पूर्वजो को याद करते हैं| पुर्वजो का तर्पण करने के लिए वो उन्हें धूप देते हैं, घर से बने पकवान जल मे प्रवाहित कर उनका भोग लगते हैं तथा सामूहिक रूप से हाथो मे ड़ाब की रस्सी पकड़ कर सूर्य को सात बार अर्ध्य देते हैं| इस समय उनके साथ उनके नवजात शिशु भी साथ होते हैं, जिनके दीर्घायु होने की कामना की जाती हैं| हम देखते हैं कि छाठ और  छठ पूजा मे ना केवल नाम की समानता हैं बल्कि इनके रिवाज़ भी एक जैसे हैं| राजस्थान की छाठ परंपरा गुर्जरों के बीच से विलोप हो गयी छठ पूजा का अवशेष प्रतीत होती हैं|

                                       सन्दर्भ
1. भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991, 
2. रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख) जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006
3. 0 कनिंघम आर्केलोजिकल सर्वे रिपोर्ट, 1864
4. के0 सी0 ओझा, दी हिस्ट्री आफ फारेन रूल इन ऐन्शिऐन्ट इण्डिया, इलाहाबाद, 1968  
5. डी0 आर0 भण्डारकर, फारेन एलीमेण्ट इन इण्डियन पापुलेशन (लेख), इण्डियन ऐन्टिक्वैरी खण्ड 1911
6. जे0 एम0 कैम्पबैल, भिनमाल (लेख), बोम्बे गजेटियर खण्ड 1 भाग 1, बोम्बे, 1896
7. छठ पूजा, भारत ज्ञान कोष का हिंदी महासागर, file:///C:/Documents%20and%20Settings/Dell/Desktop/Surya%20shasthi/%E0%A4%9B%E0%A4%A0%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%9C%E0%A4%BE%20-%20%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A5%8B%E0%A4%B6,%20%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80%20%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A4%B0.htm
8.अनुष्ठान-सूर्यषष्ठी छठ पूजा) file:///C:/Documents%20and%20Settings/Dell/Desktop/Surya%20shasthi/Pratihar%20shasthi.htm

9.छठ के अलावा डूबते सूर्य की पूजा का कोई इतिहास नहीं मिलता, http://www.aadhiabadi.com/spirituality/festivals/391-chhat-pooja-surya-puja

10. नवरत्न कपूर, छठ पूजा और मूल स्त्रोत (लेख), दैनिक ट्रिब्यून, 14-12-12.

Monday, November 26, 2012

गुर्जरों में देव उठान और देव उठान मंगल गीत (Dev Uthan)

डा.सुशील भाटी                        
Kanishka The Great


देव उठान का त्यौहार गुर्जर और जाटो में विशेष रूप से मनाया जाता हैं| यू तो हिंदू शास्त्रों के अनुसार हिन्दुओ द्वारा यह त्यौहार विष्णु भगवान के योग निद्रा से जागने के उपलक्ष्य में मनाया जाता हैं परन्तु इस अवसर पर गुर्जर परिवारों में गाये जाने वाला मंगल गीत अपने पूर्वजो को संबोधित जान पड़ता हैं| गुर्जर अपने पूर्वजों को देव कहते हैं और उनकी पूजा भी करते हैं| यह परम्परा इन्हें अपने पूर्वज सम्राट कनिष्क कुषाण/कसाना (78-101 ई.)से विरासत में मिली हैं| कुषाण अपने को देवपुत्र कहते थे| कनिष्क ने अपने पूर्वजो के मंदिर बनवाकर उसमे उनकी मूर्तिया भी लगवाई थी| इन मंदिरों को देवकुल कहा जाता था| एक देवकुल के भग्नावेश मथुरा में भी मिले हैं|गूजरों और जाटो के घरों और खेतों में आज भी छोटे-छोटे मंदिर होते हैं जिनमे पूर्वजो  का वास माना जाता हैं और इन्हें देवता कहा जाता हैं, अन्य हिंदू अपने पूर्वजों को पितृ कहते हैं|घर के वो पुरुष पूर्वज जो अविवाहित या बिना पुत्र के मर जाते हैं, उन देवो को अधिक पूजा जाता हैं| भारत  में मान्यता हैं कि यदि पितृ/देवता रूठ जाये तो पुत्र प्राप्ति नहीं होती| पुत्र प्राप्ति के लिए घर के देवताओ को मनाया जाता हैं| देव उठान पूजन के अवसर पर गए जाने वाली मंगल गीत में जाहर (भगवान जाहर वीर गोगा जी) और नारायण का भी जिक्र हैं, परन्तु यह स्पष्ट नहीं हैं कि गीत में वर्णित नारायण भगवान विष्णु हैं या फिर राजस्थान में गुर्जरों के लोक देवता भगवान देव नारायण या कोई अन्य| लेकिन इस मंगल गीत में परिवार में पुत्रो की महत्ता को दर्शाया गया हैं और देवताओ से उनकी प्राप्ति की कामना की गयी हैं| पूजा के लिए बनाये गए देवताओं के चित्र के सामने पुरुष सदस्यों के पैरों के निशान बना कर उनके उपस्थिति चिन्हित की जाती हैं| इस चित्र में एक नहीं कई देवता दिखलाई पड़ते हैं, अतः गुर्जरों के लिए यह सिर्फ किसी एक देवता को नहीं बल्कि अनेक पूर्वजो को पूजने और जगाने का त्यौहार हैं| गीत के अंत में जयकारा भी कुल-गोत्र के देवताओ के नाम का लगाया जाता हैं, जैसे- जागो रे भाटियो के देव या जागो रे बैंसलो के देव, किसी नाम विशेष के देवता का नहीं| यह भी संभव हैं की भारत में प्रचलित देव उठान का त्यौहार गुर्जरों की जनजातीय परंपरा के सार्वभौमिकरण का परिणाम हो| कम से कम गुर्जरों में यह शास्त्रीय हिंदू परंपरा और गुर्जरों की अपनी जनजातीय परंपरा का सम्मिश्रण तो हैं ही| आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं देव उठान मंगल गीत-

देव उठान गीत

उठो देव बैठो देव
देव उठेंगे कार्तिक में.....
कार्तिक में...... कार्तिक में
सोये हैं आषाढ़ में

नई टोकरी नई कपास
जा रे मूसे जाहर जा.....
जाहर जा.....जाहर जा 
जाहर जाके डाभ कटा
डाभ कटा कै खाट बुना.....
खाट बुना........खाट बुना
खाट बुना कै दामन दो
दामन दीजो गोरी गाय
गोरी गाय……कपिला गाय
जाके पुण्य सदा फल होय

गलगलिया के पेरे पाँव
पेरे पाँव……पिरोथे पाँव
राज़ करे अजय की माँ..... विजय की माँ
राज करे संजय की माँ...... जीतेंद्र की माँ
राज करे मिहिर की माँ

औरें धौरे धरे मंजीरा
ये रे माया तेरे बीरा
ये रे अनीता तेरे बीरा
ये रे कविता तेरे बीरा

औरें धौरे धरे चपेटा
ये हैं नांगणन तेरे बेटा
औरें कौरें धरे चपेटा
यह हैं बैस्लन तेरे बेटा
औरें कौरें धरे चपेटा
यह हैं कसानी तेरे बेटा

नारायण बैठा ओटा
नो मन लीक लंगोटा
जितने जंगल हीसा-रौडे
उतने या घर बर्द-किरोडे
जितने अम्बर तारैयां 
उतनी या घर गावानियां
जितने जंगल झाऊ-झूड
उतने या घर जन्में पूत

जागो...........रे......भाटियो के देव........


(स्त्रोत- जैसा मेरी माँ ने मुझे बताया) 

                                           [Dr.Sushil Bhati]