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Tuesday, February 11, 2014

भारत में जन इतिहास लेखन की चुनौती

डा. सुशील भाटी

भारत मे प्रजातंत्र के वास्तविक निर्माण के लिये आम जन के योगदान एवं उपलब्धियो का लिखा जाना आवश्यक है। किन्तु प्रश्न उठता है,  कैसे ? पूर्व का अधिकतर साहित्य एवं इतिहास लेखन तत्कालीन सभ्रान्त एवं उच्च वर्ग की उपब्धिपूर्ण भूमिका को रेखकिंत करता है। अतः इतिहास लेखन के लिये प्रयोग मे लाये जाने वाले सभी लिखित प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोत इसी सभा्रन्तवादी दृष्टिकोण से प्रभावित है। ऐसी स्थिति मे , पुरातात्विक स्त्रोतो के अतिरिक्त आम जन से जुडी मौखिक परम्पराओं, जन अनुश्रुतियो, मिथक, लोक कहावते, लोक गीत, लोकगाथाओं के अतिरिक्त लोक संगीत एवं कला का लिपिबद्ध किया जाना अति आवश्यक है। शहरी मजदूर, देहाती किसान एवं दूर दराज के जगंलो एवं पहाडो मे निवास करने वाले जनजातिय समुदायो के पास अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं एवं उपलब्धियो का व्यवस्थित एवं लिखित साहित्य एवं इतिहास नही होता है,  वे अपनी सांस्कृति एवं इतिहास को मौखिक रुप से ही अपनी नई पीढी को हस्तान्तरित करते है, इस कारण से आम जन के इतिहास लिखते समय मौखिक परम्पराओ का अनिवार्य स्रोत के रुप मे प्रयोग करना पडेगाआम जन का इतिहास सिर्फ पुस्तकालयो मे बैठकर नही वरन उनके बीच रहकर उनसे निरन्तर संवाद स्थापित करके ही लिखा जा सकता है।

इन्ही वर्गो  के बीच से ही कुछ युवा शोधार्थियो एवं इतिहासकारो को इस कार्य के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जिससे कि उनके भूतकाल के चित्रण मे उन्ही के मूल्यों एवं दृष्टिकोण का समावेश किया जा सके।

भारतीय इतिहास लेखन की अखिल भारतीय रुप रेखा मे आम जन का जिक्र लगभग नगण्य है। उनकी भूमिका क्षेत्रीय एवं स्थानीय इतिहास मे अधिक स्थान पा सकती है अतः इनका इतिहास लिखते समय स्थानीय राजस्व,  प्रशासनिक,  न्याययिक एवं जनगणना सम्बन्धी लेखे जोखे, गजेटेयर  आदि का उपयोग भी श्रेयस्कर है।

यह ध्यान रखने योग्य है कि इतिहास के शोध पत्र एवं ग्रन्थ पुस्तकालयो के धूल न चाटते रहे,  आम जन के इतिहास लिखने का उददेशय उनकी एक गरिमामयी पहचान स्थापित करना एवं उनमे एक प्रगतिशील चेतना का निर्माण करना है। इसके लिये आवश्यक है कि भारत की सभ्यता के विकास एवं भारत के स्वतंत्रता सघर्ष मे आम जन के योगदान एवं उपलब्धियो की गाथा आम समाज तक पहुचेजो कि तभी सम्भव है जब इतिहास आम आदमी के घर तक दस्तक दें, इतिहासकार इसके लिये आधुनिक प्रचार साधन - टीवी,  इन्टरनेट,  अखबार, पत्रिकायें आदि का उपयोग  कर सकते है। लघु पुस्तिकाए एवं पैम्पहलैट इत्यादि भी इस कार्य मे काफी उपयोगी हो सकते है। इतिहास संगोष्ठियो  एवं कार्यशालाओं मे आम जन की भागेदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये , साथ ही आम जलसो मे भी इतिहास की चर्चा के अवसर खोजे जाने चाहिये।  आखिर यह आम आदमी ही तो है, जिसे अपना इतिहास जानने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

 जन इतिहास का मूलमंत्र है -"जनता का इतिहास जनता के द्वारा जनता के लिये"|



                 

भारतीय इतिहास लेखन में सभ्रांतवादी दृष्टीकोण

डा. सुशील भाटी 

भारत के संविधान में प्रजातान्त्रिक राजव्यवस्था का प्रावधान है,  इस व्यवस्था को देश में लागू हुए लगभग छः दशक बीत चुके है, परन्तु भारतीय समाज में प्रजातान्त्रिक सोच पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो सकी। प्रजातान्त्रिक समाज आम जनता के निर्णय लेने की क्षमता में विश्वास करता है,  ऐसे समाजों मे सभी महत्वपूर्ण निर्णय आम जनता में सहमति के आधार पर किये जाते है। किसी भी कानून के निर्माण के लिए समाज में एक जनमत तैयार किया जाता है| बहुत से देशों में सीधे जनमत संग्रह कराकर देश हित के निर्णय लिए जाते है। आजादी के 63 वर्ष पश्चात् भी भारत का सभ्रांत वर्ग देश की आम जनता को लोकतान्त्रिक व्यवस्था के योग्य नहीं मानता,  यह समझता है कि अनपढ़ अर्धशिक्षित, गरीब और ग्रामीण जनता को समाज और देश के गम्भीर मसलों की कोई समझ नहीं है, उनके निर्णय धन के लोभ और बाहुबल के आंतक से आसानी से प्रभावित हो जाते है? अतः लोकतन्त्र का इस देश में कोई विशेष अर्थ नहीं है।

भारतीय समाज की इस अलोकतान्त्रिक सोच का भारतीय इतिहास लेखन पर भी व्यापक प्रभाव दिखाई पड़ता है। भारतीय इतिहासकारों का एक बड़ा तबका भारतीय सभ्यता के विकास एवं प्रगति में सभ्रांत वर्ग की भूमिका को रेखाकिंत करता नजर आता है,  इनके इतिहास लेखन में बडे नेताओं, बड़े परिवारों और राजवंशो को ही मुख्य स्थान दिया जाता है, इसमें आम जनता की भूमिका का कोई खास जिक्र-माजरा नहीं होता। सामान्य जन को विवेकहीन एवं सिर्फ अनुसरण करने वाला पिछलग्गू मान लिया जाता है।

वस्तुतः  भारतीय सभ्यता की शास्त्रीय परम्पराओं में से अधिकांश, सभ्रांत वर्ग द्वारा मजदूरों, किसानों, ग्रामीणों की विभिन्न आंचलिक परम्पराओं को व्यवस्थित एवं संगठित कर विकसित की गई है। जैसे कि, अमेरिकी मानव शास्त्री मैकिम मैरियट ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किशनगढ़ी गांव में, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से किये गये, अपने अध्ययन में सिद्व किया है कि भारत में लक्ष्मी पूजा एवं रक्षाबन्धन पर्व की परम्पराएं, लौकिक परम्पराओं के सर्वभौमिकरण का परिणाम है। भारतीय सभ्यता की प्रगति और आजादी की लड़ाई में भी आम जनता की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में आम जनता की एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इसकी शुरूआत करने वाले मंगल पाण्डे (29 मार्च, बैरकपुर) एवं धन सिंह गुर्जर (10 मई, मेरठ) क्रमशः सेना और पुलिस में साधारण सिपाही थे और ग्रामीण पृष्ठभूमि के किसान परिवारों से सम्बन्धित थे। हालांकि, धन सिंह उस समय मेरठ की सदर कोतवाली में कार्यवाहक कोतवाल थे। दिल्ली की आम जनता के द्वारा उसके भाईयों के मुकाबले रजिया सुल्तान के समर्थन की बात हो या तैमूर के आक्रमण के समय हरिद्वार के निकट उसका विरोध करने का, किसानों की सर्वखाप पंचायत के निर्णय का प्रसंग हो, भारत की आम जनता ने अनेक अवसरों पर अपने विवेक का प्रयोग कर अहम् भूमिका अदा की है।
वास्तव में, भारतीय इतिहास लेखन के इस सभ्रांतवादी दृष्टिकोण ने भारत में अलोकतान्त्रिक सोच का पोषण किया है। यदि भारत को सही अर्थो में लोकतान्त्रिक देश बनाना है, यदि भारत को कुछ लोगों का गौरवशाली राष्ट्र की बजाय सौ करोड लोगों का परिपक्व, सक्षम और सशक्त राष्ट्र बनाना है तो हमें समाज में आम जन की योग्यता और क्षमता में विश्वास जगाना होगा। हमें आम जन का इतिहास भी लिखना होगा। 
                                                       

Thursday, October 3, 2013

प्राचीन भारत के इतिहास लेखन में नस्लीय पूर्वाग्रह

डा. सुशील भाटी

प्राचीन भारत के इतिहास लेखन में वैदिक आर्यों के योगदान को अधिकाधिक स्थान दिया गया है। अधिकांश इतिहासकार वैदिक आर्यों को भारतीय इतिहास धारा के एक मात्र नेता के रूप मे प्रस्तुत करते हैं| वे वैदिक साहित्य को समस्त ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता और संस्कृति का स्रोत मानते हैं। इस कारण से भारत जैसे बहुनस्लीय, बहुभाषायी, बहुसांसकृतिक और बहुधार्मिक देश में अधिकांश जनसंख्या बिना किसी ऐतिहासिक उपलब्धि के दीन-हीन दिखायी देती है। वस्तुतः भारत की निचली और मध्यम कही जाने वाली अधिकांश जातियाँ समाज में बेहतर पहचान के लिए प्रयासरत हैं| वे ने केवल संस्कृतिकरण के दौर से गुजर रही है बल्कि वे अपने आप को शुद्धतम आर्य साबित करने की होड़ में भी लगे हैं।

इस नस्लीय एवं सांस्कृतिक पूर्वाग्रह ने प्राचीन भारत के इतिहास को विकृत कर दिया हैं|
और प्राचीन भारत का इतिहास लेखन विभिन्न जाति वर्गों को सदृश करने  का औजार बन गया है। इस प्रकार का इतिहास लेखन बहुसंख्यक भारतीयों को ऐतिहासिक रूप से महत्वहीन और उपलब्ध विहीन साबित करता है, अतः यह भारतीय राष्ट्र एवं लोकतन्त्र को कमजोर करने वाला है। यदि हम भारत को एक मजबूत लोकतान्त्रि राष्ट्र के रूप में देखना हैं तो हमें प्राचीन भारत के इतिहास के आर्यीकरण की प्रवृति से बचना होगा।

नर्मदा नदी के दक्षिण के लोग अपने को द्रविण कहते है और वहाँ अपने को आर्य कहने वाले लोग गिनती के हैं| इसी प्रकार उत्तर-पूर्व के सात राज्यो में मोंगलोइड नस्ल के लोग हैं। उत्तर भारत में भी अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकतर लोग, जो कुल जनसंख्या का लगभग 21 प्रतिशत है, भूमध्य सागरीय और प्रोटो-ऑस्ट्रोलोइड नृवंश के माने जाते हैं| कर्नल टाड, वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि इतिहासकार जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उ0प्र0 और पश्चिमी म0प्र0 के बसी हुई जाट, गूजर आदि जातियों को मध्य एशिया से आये सीथयनो शको, कुषाणों और हूणों का वंशज मानते है। 1901 की जन गणना में हबर्ट रिजले ने आर्यवृत्त का हृदय प्रदेश कहे जाने वाले पूर्वी उ0प्र0 एवं बिहार के निवासियों को आर्यों-द्रविण यानि आर्य और द्रविण का समिश्रण कहा है। भारतीय सन्दर्भ में बी0 एस0 गुहा का नस्लीय वर्गीकरण सर्वाधिक मान्य है। गुहा ने अपने वर्गीकरण में भारत की जनसंख्या को 6 नस्लों (Races) में बांटा है लेकिन उसमें आर्य नस्ल का जिक्र तक नहीं किया है।

आधुनिक मानवशास्त्री और कुछ प्रमुख इतिहासविद्व आर्य को एक नस्ल नहीं बल्कि एक भाषायी समूह मानते हैं। जिसमे यूरोप की अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, रूसी आदि तथा मध्य एशियाई भाषाए, ईरानी और उत्तर भारत की भाषाए आदि आती हैं| वर्तमान मे इण्डो-आर्यन शब्द का अर्थ उत्तर भारत में संस्कृत मूल की अथवा उससे प्रभावित भाषाए बोलने वाले लोगों के लिए जाता है। किन्तु नयी अवधारणाओ के बावजूद आर्य नस्ल की श्रेष्ठता का पूर्वाग्रह अधिकतर इतिहासकारो के मन में जगह बनाए हुए है। जिसका प्रभाव इतिहास लेखन पर पड़ रहा है। प्राचीन भारत के इतिहास लेखन में नस्लीय और सांस्कृतिक पूर्वाग्रह के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
     
1. भारतीय इतिहासकार आज तक भी यह लिखने-कहने में कतराते हैं कि भारत के किस समुदाय या वर्ग ने सिन्धु घाटी की सभ्यता का निर्माण किया? दक्षिण भारतीय द्रविणों और उत्तर भारत की अनुसूचित जातियों और जनजातियों का इस सभ्यता से जो ऐतिहासिक जुड़ाव रहा हैं उस पर पूर्ण प्रकाश पड़ना अभी बाकी है।

2. लगभग 100 ई. पू, से 550 ई. तक मध्य एशिया से भारत में प्रवेश करने वाले शक, कुषाण और हूण कबीलो ने भारत में बहुत से राज्यों और साम्राज्यों का निर्माण किया| यह जानते हुए भी कि पश्चिमोत्तर भारत की एक बड़ी जनसंख्या इन कबीलों की वंशज है, इन्हे विदेशी मानना कहाँ तक न्यायोचित है? इसी पूर्वाग्रह के चलते कुषाण साम्राज्य और सम्राट कनिष्क को भारतीय इतिहास में उचित स्थान नहीं मिल सका है। इसी देशी-विदेशी की भावना के कारण हूणों को भारतीय इतिहास में मात्र खलनायक के रूप में चित्रित किया जाता रहा है। भारतीय जनसंख्या और सभ्यता के विकास में इन कबीलों के योगदान की बहुदा अनदेखी की गई है। गुप्तों से लगभग दुगने साम्राज्य पर उनसे अधिक समय तक राज्य करने वाले कुषाणों के समय को कुषाण काल नहीं कहा जाता, जैसे  मोर्य काल या गुप्त काल| बल्कि इस मोर्योत्तर काल में समाहित किया जाता है। जबकि कुषाण साम्राज्य आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनैतिक उपलब्धियों में गुप्त साम्राज्य से कमतर नहीं है। इस प्रकार हूणों ने एक साम्राज्य के रूप में उत्तर भारत पर 50 वर्षों तक शासन किया, उन्हें महज विदेशी आक्रमणकारी कहकर गुप्तोत्तर काल में समाहित कर दिया जाता है।

3. अधिक उपलब्धिपूर्ण मोर्य एवं कुषाण काल की उपेक्षा कर गुप्त काल को प्राचीन भारत का स्वर्ण काल कहा जाना भी एक पूर्वाग्रह है।
     
4. हर्षवर्धन को अंतिम हिन्दू सम्राट कहना भी निराधार है। हर्षवर्धन बोद्ध था| हर्षवर्धन के बाद गुर्जर-प्रतिहारों ने उत्तर भारत में हर्षवर्धन से अधिक विस्तृत और स्थायी साम्राज्य का निर्माण किया। वस्तुतः गुर्जर सम्राट मिहिर भोज को अंतिम हिन्दू सम्राट कहा जा सकता है| गुर्जर प्रतिहार सम्राटों की उपेक्षा के पीछे भी यह कारण हो सकता है कि गुर्जरों को मध्य ऐशियाई खजर, हूण, कुषाण आदि कबीलों से जोड़ा जाता रहा है, और वर्तमान में वे साधारण पशुपालक और किसान हैं।

व्यवसायिक समुदायों के आर्थिक पक्ष के साथ-साथ उनकी सामाजिक और राजनैतिक भूमिका का अध्ययन भी आवश्यक है। यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत के पहले साम्राज्य, मगध साम्राज्य, का निर्माता नन्द वंश मूलतः नाई व्यवसायिक वर्ग से था।

प्राचीन भारत का इतिहास वैदिक आर्यों और उनकी परम्पराओं के अतरिक्त अन्य नृवंशो  के कार्यों का इतिहास भी हैं। इतिहास में द्रविणों, किराटों, भीलों, मुंडा, संस्थालों, झीवरों, निषादों, सीथयनो, दासों, पासियों, जाटवों, आदि की उपलब्धियों और परम्पराओं को भी समुचित स्थान मिलना चाहिए। वास्तव में इन समुदायों के इतिहास की उपेक्षा और अनदेखी हुई हैं।

उत्तर वैदिक काल के साहित्य में ही हमें द्रविड़, मुंडा और किरात आदि लोगो का धर्म और संस्कृति पर प्रभाव दिखाई पड़ने लगता है। पुराणों में इनके लोक देवता और मान्यताओं भी काफी मात्रा में है। वस्तुतः वैदिक हवन-यज्ञ के इतर योग आदि धार्मिक परम्मपराएं मुख्यतः अनार्य प्रभाव की देन है, मोहनजोदड़ो से प्राप्त योगी की मुहर इसी ओर इशारा करती है।

यदि हमें भारत को एक सशक्त लोकतान्त्रिक राष्ट्र बनाना है तो हमें भारत की हर नस्ल, धर्म, भाषा, वर्ग, जाति और क्षेत्र की उपलब्धियों एवं योगदान को खुले मन से स्वीकार कर इतिहास में स्थान देना होगा। जिससे की सभी समुदाय और वर्गों को ससम्मान राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोया जा सके।

सन्दर्भ

1. भगवत शरण उपाध्याय, भारतीय संस्कृति के स्त्रोत, नई दिल्ली, 1991, 
2. रेखा चतुर्वेदी भारत में सूर्य पूजा-सरयू पार के विशेष सन्दर्भ में (लेख) जनइतिहास शोध पत्रिका, खंड-1 मेरठ, 2006
3. रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय
4. डी.एन. झा एवं के. एम श्रीमाली, प्राचीन भारत का इतिहास, दिल्ली यूनिवर्सिटी, 1991
5. परमेश्वरी लाल गुप्त, प्राचीन भारतीय मुद्राए, वाराणसी, 1995  
6.  A CUNNINGHAM, ARCHAELOGICAL  SURVEY REPORT, 1864
7. D R BHANDARKAR, FOREIGN ELEMENT IN INDIAN POPULATION (ARTICLE) INDIAN ANTIQUQUARY, VOL. X L ,1911
8. J M CAMPBELL, BHINMAL, BOMBAY GAZETEER,VOL I, PART I BOMBAY 1896   
9. V A SMITH, OXFORD HISTORY OF INDIA, FORTH EDITION, DELHI, 1990
10. K C Ojha, history of foreign rule in ancient india, allahbad, 1968.
11.  paRmeswarilal gupta, coins, new delhi, 1969.
12. r c majumdar, ancient india.
13. rama shankar tripathi, history of ancient india, delhi, 1987.
14. atreyi biswas, the political history of hunas in india, munshiram manoharlal publishers, 1973.
15. upendera thakur, the hunas in india.
16 tod, annals and antiquities of rajasthan, edit. william crooke, vol.1, introduction
17. j m campbell, the gujar, gazeteer of bombay presidency,                      vol.9, part.2, 1896
18. d r bhandarkar, gurjaras, j b b r a s , vol.21, 1903
19 p c bagchi, india and central asia, calcutta, 196520. K B PATHAK , COMMEMORATIVE ESSAYS , NEW LIGHT ON GUPTA ERA AND MIHIRKULA, P215 http://www.archive.org/stream/commemorativeess00bhanuoft/commemorativeess00bhanuoft_djvu.txt

21. KRISHNA CHANDRA SAGAR, FOREIGN INFLUENCE ONANCIENT INDIA

22. A L BASHAM, THE WONDER THAT WAS INDIA, CALCUTTA ,1991     

23. U P ARORA, ANCIENT INDIA: NURTURANTS OF COMPOSITE CULTURE, PAPER FROM THE ALIGARH HISTORIAN S SOCIETY, EDITOR IRFAN  HABIB , INDIAN HISTORY CONGRESS ,66 SESSION, 2006

Saturday, July 6, 2013

Sialkot- The Ancient Capital Of Hunas

Dr.Sushil Bhati

Sialkot is located in the northeast of the Punjab province in Pakistan at the foot of Kashmir hills near the Chenab River. The city is about 125 km north of  Lahore.  Sialkot is bounded by Gujjar populated areas, on the north by Jammu, north-west by Gujrat, on the west by  Gujranwala, and on the south by Narowal.  Siyalkot itself has 25% Gujjar population.

According to Punjabi folklore, the early history of Sialkot is closely interwoven with the traditions of King Sháliváhan and his son  Risálu. Shalivahan is sometimes credited for starting the Saka Era in 78 A D. and that’s why Saka Era is also called as Shalivahan Saka Era. It is a well-known historical fact that King Shalivahan and Rasalu belonged to the Bhati clan. Present days Bhati is a celebrated clan among Gujjaras, Jats, and Rajputs. During the thirteenth century in the reign of Prithviraj Chauhan Bhati Gujjaras had a fiefdom 0f 360 villages, administered from Kasnaa, in southwest of Delhi. Later in the eighteenth Century Rao Ajit Singh Bhati also got mukkarardari of 138 villages from Mughals in the same area which was administered from Dadri.

Shalivahan re-established Sialkot city and ruled over the area between the rivers Ravi and Chenab. Shalivahan supposedly used more than 10,000 laborers and masons for the repair and extension of the Fort with stone slabs and rocks which were brought to the location from Pathankot.

The Huna ruler Tormana established his rule over north-western Hindustan, and was succeeded by his son Mihirkula (502-542 A D) in the early sixth century whose capital was Sakala or modern-day Sialkot in Pakistan's Punjab According to Hieung Tsang’s Si –Yu - Ki written in seventh-century Mihirkul Huna ruled over the whole Hindustan from Sakala or Siyalkot and received tributes from Gupta kings of Magadha. According to Kalhana’s Rajtarangini written in the thirteenth century, Mihikula Huna even attacked and defeated the Sri Lankan king. Mihirkula built many forts including that of Gwalior and Chittor.

Mehrauli, one of the seven ancient cities that make up the present state of Delhi, was earlier known as Mihirawali means abode of Mihiras or row of houses of Mihiras. It was probably founded by Huna Emperor Mihirkula as Mihira is another name for the Huna tribe. Mehrauli area is still inhabited by four villages of the Bidhuri clan of Gujjaras which do not intermarry with the Huna clan as they consider themselves as one and the same. Mehrauli area also has twelve villages of Tomara/ Tanwar Gujjaras which also have Huna origin as per the testimony of Pehowa inscription and are considered to be the descendent Of Javula Tormana, the celebrated Huna Chief and father of Emperor Mihirkula.  The family Bhats of the Khari clan of Gujjaras also claims that this clan has migrated to Delhi from Sialkot.Tomara/Tanwar Chief Anangpal I Constructed the Lalkot fort at Mehrauli and later Anangpal  II Shifted his Capital from Kannauj to Lalkot.
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Mihira is not just another name for Hunas and their emperor, it was also the name of the most famous Gujjar emperor Bhoja/Mihir Bhoj (836-885 A D) of Kannauj. Mihira is still a title of honor amongst Ajmer Gujjaras. According to E. Rtveladze, Huna's own name was Alkhon. Humbach (1996, 210) proposes that the reading of this name should be “Alkhan”. which is the same as the name of Alkhan Gujar (900 A D), the King of Punjab Gurjat which find mentioned in Kalhan' Rajtarangini. 

Many renowned historians like A M T Jackson, Buhler, Hornle, V A Smith, and William crook Consider the Gujjar to be of Huna stock. Huna is an important Clan of Gujjaras. Mansukh Gujjar the friend of Puranic raja Nal was Huna Gujjar. There are at least twelve villages of Huna Gujjaras in Meerut. Former parliamentarian from Meerut Chaudhary Harishpal is a Huna Gujjara. There are four Huna Gujjara Villages near Laksar, Haridwar, Uttrakhand, and around seven villages in the Alwar District of Rajasthan. Huna Gujjaras are most numerous in the Bundi and Kota areas of Rajasthan Which was once known as Huna Pradesh. The Bidhuri clan of Gujjaras, which have sizeable numbers in Delhi and Rajasthan, and the Marid clans do not intermarry with the Huna clan because they consider themselves one and the same. Many other Gujjar Clans –Tomara (descendants of  Javula Tormana Huna), Paramara/Panwar, Lohmor, and Solanki are of  Huna origin.

The Sialkot area remained a Gujjar stronghold even in the sixteenth century as in,' Babur Nama, Babur records: ‘If one goes into Hindustan, the Jats, and Gujars always pour down in countless hordes from the hill and plain for loot in bullock and buffalo. These ill-omened peoples are senseless oppressors! Previously, their deeds did not concern us because the territory was an enemy. But they did the same senseless deeds after we had captured it. When we reached Sialkot, they swooped on the folk who were coming out of the town to our camp and stripped them bare. I had the witless brigands apprehended and ordered a few of them to be cut to pieces.

References 

2. MIHIRAKULA, WIKIPEDIA, http://en.wikipedia.org/wiki/Mihirakula

4. K C Ojha, history of foreign rule in ancient india,  allahbad, 1968.

5. prameswarilal  gupta, coins, new delhi, 1969.

6. r c majumdar, ancient india.

7. rama shankar tripathi, history of ancient india, delhi, 1987.

8. atreyi biswas, the political history of hunas in india, munshiram manoharlal publishers, 1973.

9. upendera thakur, the hunas in india.

10. tod, annals and antiquities of rajasthan, vol.2

11. j m campbell, the gujar, gazeteer of bombay presidency, vol.9, part.2, 1896

12. d r bhandarkar, gurjaras, j b b r a s , vol.21, 1903

13. . tod, annals and antiquities of rajasthan, edit. william crooke, vol.1, introduction

14. p c bagchi, india and central asia, calcutta, 1965

15. v a smith, earley history of india

16. AYDOGDY KURBANOV, THEHEPHTHALITES: ARCHAEOLOGICALAND HISTORICAL ANALYSIS, http://www.diss.fuberlin.de/diss/servlets/MCRFileNodeServlet/FUDISS_derivate_000000007165/01_Text.pdf











Wednesday, May 15, 2013

कल्कि अवतार और मिहिरकुल हूण ( kalki Avtar Aur Mihirkula Huna)

डा. सुशील भाटी 

ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों की संकल्पना ग्यारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक अपना निश्चित आकार ले चुकी थी| भगवान विष्णु के दस अवतार माने जाते हैं- मतस्य, क्रुमु, वराह, नरसिंह, वामन, पशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध ओर कल्कि|  पुराणों के अनुसार कल्कि अवतार भगवान विष्णु के दस अवतारों में अंतिम हैं जोकि भविष्य में जन्म लेकर कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा| अग्नि पुराण ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण किये हुए  एक घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित करेगा|

परन्तु कुछ पुराण ओर कवि कल्कि अवतार के लिए भूतकाल का प्रयोग करते हैं| वायु पुराण के अनुसार कल्कि अवतार कलयुग के चर्मौत्कर्ष पर जन्म ले चुका हैं| मतस्य पुराण, बंगाली कवि जयदेव (1200 ई.) ओर चंडीदास के अनुसार भी कल्कि अवतार की घटना हो चुकी हैं| अतः कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो सकता हैं|

जैन पुराणों में भी एक कल्कि नामक भारतीय सम्राट का वर्णन हैं| जैन विद्वान गुणभद्र नवी शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखता हैं कि कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के एक हज़ार वर्ष बाद हुआ| जिन सेन ‘उत्तर पुराण’ में लिखता हैं कि कल्किराज ने 40 वर्ष राज किया और 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई|  कल्किराज अजितान्जय का पिता था, वह बहुत निरंकुश शासक था, जिसने दुनिया का दमन किया और निग्रंथो के जैन समुदाय पर अत्याचार किये| गुणभद्र के अनुसार उसने दिन में एक बार दोपहर में भोजन करने वाले जैन निग्रंथो के भोजन पर भी टैक्स लगा दिया जिससे वो भूखे मरने लगे | तब निग्रंथो को कल्कि की क्रूर यातनाओ से बचाने के लिए एक दैत्य का अवतरण हुआ जिसने वज्र (बिजली) के प्रहार से उसे मार दिया ओर अनगिनत युगों तक असहनीय दर्द ओर यातनाये झेलने के लिए रत्नप्रभा नामक नर्क में भेज दिया|

प्राचीन जैन ग्रंथो के वर्णनों के अनुसार कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिसका शासनकाल महावीर की मृत्यु (470 ईसा पूर्व) के एक हज़ार साल बाद, यानि कि गुप्तो के बाद, छठी शताब्दी ई. के प्रारभ में, होना चाहिए चाहिए| गुप्तो के बाद अगला शासन हूणों का था| जैन ग्रंथो में वर्णित कल्कि का समय और कार्य हूण सम्राट मिहिरकुल के साथ समानता रखते हैं| अतः कल्कि राज ओर मिहिरकुल (502- 542 ई.) के एक होने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता| इतिहासकार के. बी. पाठक ने सम्राट मिहिरकुल हूण की पहचान कल्कि के रूप में की हैं, वो कहते हैं कि कल्किराज मिहिरकुल को दूसरा नाम है|

चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु हेन सांग मिहिरकुल की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष बाद भारत आया| उसके द्वारा लिखित सी यू की नामक वृतांत इस मामले में कुछ और प्रकाश डालता हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल कि मृत्यु के समय भयानक तूफ़ान आया और ओले बरसे, धरती कांप उठी तथा चारो ओर गहरा अँधेरा छा गया| बौद्ध पवित्र संतो ने कहा कि अनगिनत लोगो को मारने ओर बुध के धर्म को उखाड फेकने के कारण मिहिरकुल गहरे नर्क में जा गिरा जहाँ वह अंतहीन युगों तक सजा भोगता रहेगा|  जैन धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश कल्कि के गहरे नर्क में जाने ओर अनगिनत युगों तक दुःख ओर यातनाये झेलने का वर्णन,  बौद्ध धर्म पर प्रहार करने वाले निरंकुश मिहिरकुल के नर्क में गिरने के वर्णन से बहुत मेल खाता हैं| अतः जैन ग्रन्थ में वर्णित कल्कि राज के मिहिरकुल होने की सम्भावना प्रबल  हैं|

ब्राह्मण ग्रन्थ अग्नि पुराण ने कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण करने वाला एक घुडसवार के रूप में किया हैं| कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफ़ेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध ओर विजय के लिए निकलेगा तथा  बोद्ध, जैन ओर म्लेछो को पराजित कर धर्म (सनातन धर्म) की पुनर्स्थापना करेगा|  इतिहास में हूण कल्कि की तरह श्रेष्ठ घुडसवार ओर धनुर्धर के रूप में विख्यात हैं तथा  कल्किराज/  मिहिरकुल हूण ने भी कल्कि की तरह  जैन  ओर बोद्ध धर्म के अनुयायियों का दमन किया था|  कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था| कल्हण ने राजतरंगिणी नामक ग्रन्थ में मिहिरकुल का वर्णन ब्राह्मण समर्थक शिव भक्त के रूप में किया हैं| कल्हण कहता हैं कि मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया ओर ब्राह्मणों को 1000 गांव (अग्रहार) दान में दिए| हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं वरन पूरे भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था| भारत में बौद्ध धर्म के अवसान ओर  सनातन  धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका हैं|

मिहिरकुल की संगति कल्कि अवतार के साथ करने में एक कठनाई ये हैं कि कुछ इतिहासकार हूणों को विधर्मी संस्कृति का विदेशी आक्रांता मानते हैं| किन्तु हूणों को विधर्मी ओर विदेशी नहीं कहा जा सकता हैं| ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हारा हूण (किदार कुषाण) लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमीओत्तर में स्थापित राजनेतिक शक्ति थे| श्वेत हूण भी पांचवी शताब्दी में पश्चिमीओत्तर भारत के शासक थे| 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने मध्य भारत में साम्राज्य स्थापित किया तब वो सनातन संस्कृति ओर धर्म का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था| अतः हूणों ओर गुप्तो टकराव राजनैतिक सर्वोच्चता ओर साम्राज्य के लिए दो भारतीय ताकतों का संघर्ष था| भारत के प्रथम हूण सम्राट तोरमाण के शासन काल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्य भारत के एरण नामक स्थान से वराह मूर्ति से मिला हैं| हूणों के कबीलाई देवता वराह का सामजस्य भगवान विष्णु के वाराह अवतार के साथ कर उसे सनातन  धर्म में अवशोषित किया जा चुका था|  कालांतर में हूणों से सम्बंधित माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिर भोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिंदू साम्राज्य का निर्माण किया ओर ब्राह्मण संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई| गुर्जर प्रतिहारो की राजधानी कन्नौज संस्कृति का उच्चतम केंद्र होने के कारण महोदय कहलाती थी|  तोरमाण हूण के तरह गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वराह का उपासक था ओर उसने आदि वाराह की उपाधि भी धारण की थी| संभवतः आम समाज के द्वारा मिहिरभोज को भगवान विष्णु का वराह अवतार माना जाता था| गुर्जर- प्रतिहारो ने सातवी शताब्दी से लेकर दसवी शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत ओर उसकी संस्कृति की जो रक्षा की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं| समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु कहा हैं| मिहिरभोज ने आदि वराह की उपाधि सनातन धर्म ओर संस्कृति के रक्षक होने के नाते ही धारण की थी| मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को उसके गुरु राजशेखर ने आर्यवृत्त का सम्राट कहा हैं|  गुर्जर सभवतः हूणों ओर कुषाणों की नयी पहचान थी|

अतः हूणों ओर उनके वंशज गुर्जरों ने सनातन धर्म ओर संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुल हूण ओर मिहिरभोज गुर्जर को समकालीन ब्राह्मण/हिंदू समाजो द्वारा अवतारी पुरुष के रूप में देखा गया हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं हैं|

सन्दर्भ ग्रन्थ

1. K B PATHAK, COMMEMORATIVE ESSAYS, NEW LIGHT ON GUPTA ERA AND MIHIRKULA, P215 http://www.archive.org/stream/commemorativeess00bhanuoft/commemorativeess00bhanuoft_djvu.txt

2. KRISHNA CHANDRA SAGAR, FOREIGN INFLUENCE ON ANCIENT INDIA http://books.google.co.in/books?id=0UA4rkm9MgkC&pg=PA219&lpg=PA219&dq=kalki+mihirkula&source=bl&ots=3bFzWMZnli&sig=ad_ek0hzpbTd9gScpU-YfmFyUEQ&hl=en&sa=X&ei=xPVFUcuOCYfNrQe9nIDQAw&ved=0CCwQ6AEwAA#v=onepage&q=kalki%20mihirkula&f=false

3. KALKI AVTAR: AN HISTORICAL FIGURE

 http://www.sakshitimes.net/blog/2008/09/01/kalki-avatar-an-historical-figure-282/

4. JOHALS, http://wikipedia.atpedia.com/en/articles/j/o/h/Johal.html

5. JOHALS, http://www.spiritus-temporis.com/johal/history.html

6. GURJARS IN AND AFTER 5TH CENTURY, http://gurjara.blogspot.in/2010/08/3-gurjars-in-after-5th-century.html

7. K C OJHA, HISTORY OF FOREIGN RULE IN ANCIENT INDIA,  ALLAHBAD, 1968.

8. PRAMESWARILAL  GUPTA, COINS, NEW DELHI, 1969.

9. R C MAJUMDAR, ANCIENT INDIA.

10. RAMA SHANKAR TRIPATHI, HISTORY OF ANCIENT INDIA, DELHI, 1987.

11. ATREYI BISWAS, THE POLITICAL HISTORY OF HUNAS IN INDIA, MUNSHIRAM MANOHARLAL PUBLISHERS, 1973.

12. UPENDERA THAKUR, THE HUNAS IN INDIA.

13. TOD, ANNALS AND ANTIQUITIES OF RAJASTHAN, VOL.2

14. J M CAMPBELL, THE GUJAR, GAZETEER OF BOMBAY PRESIDENCY, VOL.9, PART.2, 1896

15. D R BHANDARKAR, GURJARAS, J B B R A S , VOL.21, 1903

16. . TOD, ANNALS AND ANTIQUITIES OF RAJASTHAN, EDIT. WILLIAM CROOKE, VOL.1, INTRODUCTION

17. P C BAGCHI, INDIA AND CENTRAL ASIA, CALCUTTA, 1965

18. V A SMITH, EARLEY HISTORY OF INDIA

Thursday, March 7, 2013

हिंडन का युद्ध ( The war of Hindan )

डा. सुशील भाटी 

1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में मेरठ और दिल्ली की सीमा पर हिंडन नदी के किनारे 30, 31 मई 1857 को राष्ट्रवादी सेना और अंग्रेजों के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था जिसमें भारतीयों ने मुगल शहजादा मिर्जा अबू बक्र,[1] दादरी के राजा उमराव सिंह[2] और मालागढ़ के नबाब वलीदाद खाँन[3] के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे कर दिये थे।

जैसा कि विदित है कि 10 मई 1857 को मेरठ में देशी सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया और रात में ही वो दिल्ली कूच कर गए थे। 11 मई को इन्होंने अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया[4] और अंग्रेजों को दिल्ली के बाहर खदेड़ दिया। अंग्रेजों ने दिल्ली के बाहर रिज क्षेत्र में शरण ले ली।
तत्कालीन परिस्थितियों में दिल्ली की क्रान्तिकारी सरकार के लिए मेरठ क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण था। केवल मेरठ से सैनिक विद्रोह की शुरूआत हुई थी वरन पूरे मेरठ क्षेत्र में, सहारनपुर से लेकर बुलन्दशहर तक का हिन्दू-मुस्लिम, किसान-मजदूर सभी आमजन, इस अंग्रेज विरोधी संघर्ष में कूद पड़े थे। ब्रिटिश विरोधी संघर्ष ने यहाँ जन आन्दोलन और जनक्रान्ति का रूप धारण कर लिया था। मेरठ क्षेत्र दिल्ली के क्रान्तिकारियों को जन, धन एवं अनाज (रसद) की भारी मदद पहुँच रहा था। स्थिति को देखते हुए मुगल बादशाह ने मालागढ़ के नवाब वलीदाद खान को इस क्षेत्र का नायब सूबेदार बना दिया,[5] उसने इस क्षेत्र की क्रान्तिकारी गतिविधियों को गतिविधियों को गति प्रदान करने के लिये दादरी में क्रान्तिकारियों के नेता राजा उमराव सिंह से सम्पर्क साधा[6], जिसने दिल्ली की क्रान्तिकारी सरकार का पूरा साथ देने का वादा किया।

                मेरठ में अंग्रेजों के बीच अफवाह थी कि विद्रोही सैनिक, बड़ी भारी संख्या में, मेरठ पर हमला कर सकते हैं।[7] अंग्रेज मेरठ को बचाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे क्योंकि मेरठ पूरे डिवीजन का केन्द्र था। मेरठ को आधार बनाकर ही अंग्रेज इस क्षेत्र में क्रान्ति का दमन कर सकते थे। अंग्रेज इस सम्भावित हमले से रक्षा की तैयारी में जुए गए। मेरठ होकर वापिस गए दो व्यक्तियों ने बहादुर शाह जफर को बताया कि 1000 यूरोपिय सैनिकों ने सूरज कुण्ड पर एक किले का निर्माण कर लिया है।[8]

                इस प्रकार दोनों और युद्ध की तैयारियां जोरो पर थी। तकरीबन 20 मई 1857 को भारतीयों ने हिंडन नदी का पुल तोड़ दिया जिससे दिल्ली के रिज क्षेत्र में शरण लिए अंग्रेजों का सम्पर्क मेरठ और उत्तरी जिलो से टूट गया।[9]
                इस बीच युद्ध का अवसर गया जब दिल्ली को पुनः जीतने के लिए अंगे्रजों की एक विशाल सेना प्रधान सेनापति बर्नाड़ के नेतृत्व में अम्बाला छावनी से चल पड़ी। सेनापति बर्नाड ने दिल्ली पर धावा बोलने से पहले मेरठ की अंग्रेज सेना को साथ ले लेेने का निर्णय किया। अतः 30 मई 1857 को जनरल आर्कलेड विल्सन की अध्यक्षता में मेरठ की अंगे्रज सेना बर्नाड का साथ देने के लिए गाजियाबाद के निकट हिंडन नदी के तट पर पहुँच गई। किन्तु इन दोनों सेनाओं को मिलने से रोकने के लिए क्रान्तिकारी सैनिकों और आम जनता ने भी हिन्डन नदी के दूसरी तरफ मोर्चा लगा रखा था।[10]

                जनरल विल्सन की सेना में 60वीं शाही राइफल्स की 4 कम्पनियां, कार्बाइनरों की 2 स्क्वाड्रन, हल्की फील्ड बैट्री, ट्रुप हार्स आर्टिलरी, 1 कम्पनी हिन्दुस्तानी सैपर्स एवं माईनर्स, 100 तोपची एवं हथगोला विंग के सिपाही थे।[1]1 अंग्रेजी सेना अपनी सैनिक व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रही थी कि क्रान्तिकारी सेना ने उन पर तोपों से आक्रमण कर दिया।[12] भारतीयों की राष्ट्रवादी सेना की कमान मुगल शहजादे मिर्जा अबू बक्र दादरी के राजा उमराव सिंह एवं नवाब वलीदाद खान के हाथ में थी। भारतीयों की सेना में बहुत से घुड़सवार, पैदल और घुड़सवार तोपची थे।[13] भारतीयों ने तोपे पुल के सामने एक ऊँचे टीले पर लगा रखी थी। भारतीयों की गोलाबारी ने अंग्रेजी सेना के अगले भाग को क्षतिग्रस्त कर दिया।

                अंग्रेजों ने रणनीति बदलते हुए भारतीय सेना के बायें भाग पर जोरदार हमला बोल दिया। इस हमले के लिए अंग्रेजों ने 18 पौंड के तोपखाने, फील्ड बैट्री और घुड़सवार तोपखाने का प्रयोग किया। इससे क्रान्तिकारी सेना को पीछे हटना पड़ा और उसकी पाँच तोपे वही छूट गई। जैसे ही अंग्रेजी सेना इन तोपों को कब्जे में लेने के लिए वहाँ पहुँची, वही छुपे एक भारतीय सिपाही ने बारूद में आग लगा दी, जिससे एक भयंकर विस्फोट में अंग्रेज सेनापति कै. एण्ड्रूज और 10 अंग्रेज सैनिक मारे गए। इस प्रकार इस वीर भारतीय ने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजों से भी अपने साहस और देशभक्ति का लोहा मनवा लिया। एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा था किऐसे लोगों से ही युद्ध का इतिहास चमत्कृत होता है!”[14]

                अगले दिन भारतीयों ने दोपहर में अंग्रेजी सेना पर हमला बोल दिया यह बेहद गर्म दिन था और अंग्रेज गर्मी से बेहाल हो रहे थे। भारतीयों ने हिंडन के निकट एक टीले से तोपों के गोलों की वर्षा कर दी। अंग्रेजों ने जवाबी गोलाबारी की। 2 घंटे चली इस गोलाबारी में लै0 नैपियर और 60वीं रायफल्स के 11 जवान मारे गए तथा बहुत से अंग्रेज घायल हो गए।15 अंग्रेज भारतीयों से लड़ते-2 पस्त हो गए, हालांकि अंग्रेज सेनापति जनरल विल्सन ने इसके लिए भयंकर गर्मी को दोषी माना। भारतीय भी एक अंग्रेज परस्त गांव को आग लगाकर सुरक्षित लौट गए।

                1 जून 1851 को अंग्रेजों की मदद को गोरखा पलटन हिंडन पहुँच गई तिस पर भी अंग्रेजी सेना आगे बढ़ने का साहस नहीं कर सकी और बागपत की तरफ मुड़ गई।16 इस प्रकार भारतीयों ने 30, 31 मई 1857 को लड़े गए हिंडन के युद्ध में साहस और देशभक्ति की एक ऐसी कहानी लिख दी, जिसमें दो अंग्रेजी सेनाओं के ना मिलने देने के लक्ष्य को पूरा करते हुए, उन्होंने अंग्रेजी बहादुरी के दर्प को चूर-2 कर दिया।

सन्दर्भ

1. 0 बी0 जोशी, मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर, गवर्नमेन्ट प्रेस, 1963, पृष्ठ संख्या 53
2. शिव कुमार गोयल, ऐसे शुरू हुई मेरठ में क्रान्ति (लेख), दैनिक प्रभात, मेरठ, दिनांक 10 मई 2007
3. वही।
4. वही 0 बी0 जोशी।
5. एस0 0 0 रिजवी, फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश, खण्ड टए लखनऊ, 1960, पृष्ठ सं0 45 पर मुंशी लक्ष्मण स्वरूप का बयान।
6. वही।      
7. बिन्दु क्रमांक 221, नैरेटिव   ऑफ इवेन्टस अटैन्डिग आऊटब्रैक   ऑफडिस्टरबैन्सिस एण्ड रेस्टोरेशन ऑफ ऑथोरिटी  इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ 1857-58, राष्ट्रीय अभिलेखागार, दिल्ली।
8. वही 0 बी0 जोशी।
9. वही 0 बी0 जोशी।
10. उमेश त्यागी, 1857 की महाक्रान्ति में गाजियाबाद जनपद (लेख), दी जर्नल आफ मेरठ यूर्निवर्सिटी हिस्ट्री एलमनी, खण्ड   2006, पृष्ठ संख्या 311
11. वही बिन्दु क्रमांक 232, नैरेटिव इन डिस्ट्रक्ट मेरठ। 
12. वही उमेश त्यागी
13. वही 0 बी0 जोशी
14. वही उमेश त्यागी
15. विघ्नेष त्यागी, मेरठ के ऐतिहासिक क्रान्ति स्थल और घटनाएं (लेख), दैनिक जागरण, मेरठ, दिनांक 5 मई 2007
16. वही उमेश त्यागी
                                                                                           ( Dr Sushil Bhati )