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Tuesday, December 30, 2025

चौहान गुर्जरों की कलस्यान चौरासी खाप

डॉ सुशील भाटी

शामली जिले के कैराना और कांधला क्षेत्र में यमुना नदी के पूर्वी तट पर चौहान गुर्जरों की कलस्यान खाप के 84 गाँव आबाद हैं| प्रसिद्ध इतिहासकार राम शरण शर्मा अपनी पुस्तक भारतीय सामन्तवाद में कहते हैं कि अपने नव विजित क्षेत्र में, 12 अथवा उसके गुणांक 24, 60, 84, 360  की संख्या में गाँवो की जागीर अपनी सेना के विजेता सरदारों को प्रदान करने की परिपाटी, कन्नौज के गुर्जर प्रतीहार सम्राट तथा  उनके गुहिल, तोमर, चौहान आदि सामंतो की रही हैं| कल्स्यान गुर्जर इस खाप को बसाने का श्रेय हरिराज चौहान उर्फ़ राणा हर्रा को प्रदान करते हैं| हरिराज चौहान दिल्ली-अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान उर्फ़ राय पिथोरा के भाई थे| अतः चौहान गुर्जरों की यह कलस्यान चौरासी खाप मूलतः एक जागीर हैं जिसे पृथ्वीराज राज चौहान ने अपने भाई हरिराज चौहान को प्रदान किया था| हरिराज चौहान ने पंजीठ गाँव को चौरासी का केंद्र बनाया| उसने इस क्षेत्र में तीतरवाडा गाँव के त्तीतर खान को मारकर क्षेत्र के लोगो को उसके ज़ुल्मो से मुक्ति दिलाई थी| अपने पुत्र कल्सा को इस जागीर की देखभाल का कार्य सौप कर हरिराज चौहान अजमेर चले गएँ| 1192 में पृथ्वीराज चौहान तराइन के दूसरे युद्ध में मौहम्मद गोरी से पराजित हो गए और दिल्ली पर तुर्कों का कब्ज़ा हो गया| किन्तु चौहानों ने हरिराज चौहान के नेतृत्त्व में अजमेर से तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष ज़ारी रखा| कालान्तर में चौहान अजमेर में भी पराजित हुए| परिणाम स्वरुप चौहान राजपरिवार के सदस्यों ने रणथम्भोर को अपना केंद्र बना लिया| मशहूर इतिहासकार डिर्क एच ए कोल्फ के अनुसार यह हरिराज चौहान बगडावत गुर्जरों का भी दादा था|

इधर हरिराज चौहान के पुत्र कल्सा ने पंजीठ के अतिरिक्त कैराना को अपना केंद्र बनाया और चौरासी का संचालन किया| कल्सा के नाम पर ही यह चौरासी कलस्यान चौरासी खाप कहलाई|  मुग़ल बादशाह अकबर के समय भी कलस्यान खाप प्रभावशाली रूप से अस्तित्व में थीसर्वखाप पंचायत के सौरम गाँव में स्थित कार्यालय के दस्तावेजों के अनुसार 1578 ई. में अकबर ने दिल्ली सूबे की पांच खाप जिनमे बालियान जाट खाप, कलस्यान गूजर खापसलकलेन जाट खापदहिया जाट खाप तथा गठवाला जाट खाप सम्मिलित थी, के लिए एक फरमान ज़ारी कर उन्हें धार्मिक मामलो और आतंरिक प्रशासनिक मामलो में स्वतंत्रता प्रदान की थी| आज भी कलस्यान खाप के चौहान गुर्जर बालियान और सलकलेन जाटो से विशेष भाईचारा मानते हैंअबुल फज़ल द्वारा लिखित आईन-ए-अकबरी पुस्तक के अनुसार दिल्ली सूबे की सहारनपुर सरकार में कैराना महल के जमींदार गूजर जाति के थेइसके अतिरिक्त कांधला जोकि दिल्ली सरकार के अंतर्गत था, वहाँ के जमींदार भी गूजर जाति के थेइस प्रकार हम देखते हैं कि अकबर के शासनकाल में कल्शान चौरासी के क्षेत्र कैराना-कांधला में गूजर जमींदार थेकैराना में आज भी कलस्यान चौपाल हैं, जहाँ खाप की आवश्यक बैठक होती हैंकलस्यान खाप के वर्तमान चौधरी कैराना के चौधरी रामपाल हैं, जोकि  मूलतः पंजीठ गाँव से हैं| हालाकि कुछ पीढियों पहले उनका परिवार कैराना में बस गया था| उनके चाचा चौधरी हुकुम सिंह (1938 -2018) कैराना से सांसद और विधायक रहें हैं|  सन 1964 तक चौधरी हुकुम सिंह के दादा चौधरी मान सिंह कलस्यान खाप के चौधरी थे| उसके बाद चौधरी मान सिंह के बड़े पुत्र चौधरी मुख्तार सिंह 1964 से 2003 ई. तक खाप के चौधरी रहें| उसके बाद चौधरी मुख्तार सिंह के पुत्र चौधरी रामपाल सिंह 2003 से कलस्यान खाप के चौधरी हैं|

तुर्कों और मुगलों के काल में कलस्यान खाप के कुछ परिवारों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था| कलस्यान खाप के ग्राम माल्हीपुर में जन्मे मशहूर इतिहासकार राणा अली हसन चौहान के अनुसार उनके पूर्वज राणा वीरसाल ने 1300 ई. के आस-पास इस्लाम धर्म अपनाया था| राणा अलीहसन चौहान के अनुसार हरिराज चौहान (हर्रा) की सत्ताईस्वी पीढ़ी में उनका जन्म हुआ| राणा वीरसाल के अतिरिक्त चौहान गुर्जरों की कल्शान खाप के बहुत से अन्य परिवारों एवं गाँवों ने भी इस्लाम धर्म काबुल कर लिया था कलस्यान चौरासी का मूल मुख्यालय पंजीठ के एक परिवार ने भी इस्लाम धर्म अपना लिया और वो पास में ही जन्धेदी गाँव में बस गया| जबकि उनके हिंदू भाई ही काल्स्यान खाप की चौधर संभालते रहे। जन्धेडी के इसी मुस्लिम कलस्यान गुर्जर परिवार में कालांतर में चौधरी अख्तर हसन (कलस्यान) का जन्म हुआ, उनका परिवार कैराना के मोहल्ला "आल दरम्यान" में आकर बस गया| उन्होंने कैराना में एक चबूतरा स्थापित किया और वहाँ से अपनी सामाजिक और राजनैतिक गतिविधिया का संचालन किया|वे 1984 में कैराना से सांसद निर्वाचित हुए| उनकी विरासत को उनके पुत्र चौधरी मुनव्वर हसन (कलस्यान) (1964-2008) ने संभाला जोकि संसद और विधानसभा के चारो सदनों के सदस्य रहें, इस उपलब्धि के कारण उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज हैं| वर्तमान में चौधरी अख्तर हसन के पोते चौधरी नाहिद हसन (कलस्यान) कैराना से विधायक और पोती चौधरी इकरा हसन (कलस्यान) कैराना से सांसद हैं|

इस प्रकार हम देखते कि कलस्यान खाप के मूल मुख्यालय पंजीठ से सम्बंधित एक ही खानदान के एक  हिन्दू और एक मुस्लिम कलस्यान परिवार खाप की सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों को नियंत्रित कर रहें हैं|

कलस्यान खाप में बीनडा गाँव की भी एक अलग पहचान हैं| आज़ादी के बाद 1950 ई. में सर्व खाप पंचायत को फिर से सक्रिय किया गया| इस हेतु मुज़फ्फरनगर के सोरम गाँव में सर्वखाप  पंचायत का आयोजन किया गया| पंचायत में पश्चिमी यू. पी., हरियाणा और पंजाब की विभिन्न जातियों की लगभग 18 खापो ने भागेदारी की| बीनडा गाँव के चौधरी जवान सिंह (कलस्यान) गुर्जर को सर्वखाप पंचायत का प्रधान चुना गया| ठाकुर यशपाल सिंह निवासी ग्राम पनियाला को सर्वखाप का उप प्रधान तथा एवं ग्राम सोरम के चौधरी कबूल सिंह (जाट) को सर्वखाप का मंत्री/वजीर चुना गया| सर्वखाप पंचायत ने बहुत से महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए, जो प्रतिभागी सभी खापो और जातियों के लिए बाध्यकारी थे| बीनडा गाँव से चौधरी नारायण सिंह सन 1979-80 में (कलस्यान) उत्तर प्रदेश के पहले उप मुख्यमंत्री रहें| इनके पुत्र श्री संजय (कलस्यान) चौहान बिजनौर लोकसभा से सांसद रहें तथा वर्तमान में इनके पोते श्री चन्दन चौहान बिजनौर से सांसद हैं|

कलस्यान खाप का जसाला गाँव भी महत्वपूर्ण हैं| यहाँ के चौधरी अजब सिंह कांधला से विधायक रहें| बाद में उनके भतीजे चौधरी वीरेंदर सिंह अनेक बार कांधला से विधायक रहें| उनके दूसरे भतीजे चौ. यशवीर सिंह 1989 में खादी एवं ग्राम उद्योग के अध्यक्ष बने| चौधरी वीरेंदर सिंह के सुपुत्र श्री मनीष चौधरी शामली जिले के जिला पंचायत अध्यक्ष रहें हैं| डुंडुखेड़ा गाँव में कलस्यान इंटर कॉलेज हैं|

इस प्रकार स्पष्ट हैं कि कलस्यान खाप की क्षेत्रीय समाज और राजनीती में महत्वपूर्ण भूमिका हैं| इसका  प्रमुख कारण कलस्यान खाप की एकता हैं|

गुर्जरों की कलस्यान खाप में 84 गाँव, जोकि मुख्यतः जनपद शामली के अंतर्गत आते हैं, की सूची निम्नवत हैं-  

मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों के गाँव की सूची – 1. पंजीठ  2. जन्धेडी 3. मंडावर 4. गंदरऊ  5. दभेडी खुर्द 6. गढ़ी मियां 7. रामडा 9. खुरगान 10. बसेड़ा 11. अकबरपुर सुन्हेटी 12. गढ़ी दौलत 13. मंसूरा 14. मुकुंदपुर खेडी 15. बरनावी 16. रोटन 17. ओदरी 18. ख्वाजपुरा/कबीरपुर 19. फतेहपुर (यमुना किनारे)  20. असरपुर/अशरफपुर 21. बधुपुरा 22. बराला 23. गोंगवान 24 केरटू  25. माल्हीपुर (मशहूर इतिहासकार राणा अली हसन का पैतृक गाँव) 26. चौंतरा 27. मलकपुर 28. जडाना 29. दुगड्डा 30. अम्भेटा 31. गढ़ी अब्दुल्ला, 32. साल्हा खेडी 33. तसंग 34. बरनऊ

यमुना नदी द्वारा अपना रास्ता बदलने के कारण मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों के कुछ गाँव हरयाणा में चले गएँ, जो इस प्रकार हैं- 1.पत्थरगढ़ (राय पिथोरा के नाम पर), 2. जलालपुर 3. गढ़ी बैसख 4. राणा माजरा 5. बल्हेडा 6. मुण्डी गढ़ी, 7. नवादा  

हिन्दू-मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों के मिश्रित गाँवो की सूची – 1. कैराना, 2. भूरा 3. पावटी कला 4. बलवा गुजरान 5. खन्द्ररावली 6. खेडा कुरतान 7. तीतरवाडा  8. अलीपुर  9. जहानपुरा  10. कांधला 11. ममौर   

हिन्दू कलस्यान गुर्जरों के गाँव की सूची – 1. कंडेला 2. शेखूपुरा 3. हिंगोखेड़ी 4. मीमला 7.  ऊँचागाँव 8.  गुर्जरपुर 9. बीनडा 10. पंजोखरा 12. बुच्चाखेडी 13. फतेहपुर 14. जगनपुर 15. आल्दी 16. गढ़ी रामकौर 17. डुंडुखेड़ा 18. श्याम गढ़ी 19. रसूलपुर 20. जसाला 21. ब्रह्मखेडा  22. डूढार 23. बल्हेडा 24. इस्सोपुर टील, 25. सहपत 26. बोड्ढा 27. गढ़ी राडा 28. चढाव 29. सलेमपुर  30 पठेड 31. बीबीपुर 32. डोंकपुरा 33. जैनपुर 34. गंगेरु 35. ककौर

दिल्ली रोड के पूर्व में कलस्यान चौरासी के सात गाँव पड़ते हैं, इन्हें सतगामा भी कहते हैं| ये सात गाँव इस प्रकार हैं- जसाला, रसूलपुर, मीमला, बलवा गुजरान, पंजोखरा, और ब्रह्मखेडा| इस सतगामे की चौधर लम्बे समय तक माल्हीपुर गाँव में रही हैं| आज़ादी से पहले माल्हीपुर के बाबा न्यादरा सतगामे के प्रसिद्ध चौधरी थे| इस सतगामे की पुरानी धर्मशाला खंद्रावली रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित हैं| यह धर्मशाला इस सतगामे की चौधर का प्रतीक हैं, वर्तमान में बड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं| बाबा न्यादर अली उर्फ़ न्यादरा गुर्जर जाति की जो भी बारात खंद्रावली रेलवे स्टेशन आती थी, उन सभी का उचित सत्कार कर उन्हें अपनी बैलगाडियो से उनके गंतव्य तक पहुचाते थे| माल्हीपुर के श्री क़ुतुब मुखिया भी सतगामे के चौधरी रहें हैं| वर्तमान में बलवा गाँव के चौधरी अनिल सिंह (कलस्यान) सतगामे के चौधरी हैं|

कलस्यान चौरासी में एक नौगामा भी जिसमे आल्दी, फतेहपुर, गुर्जरपुर, सलेमपुर, मलकपुर आदि गाँव हैं| आल्दी के चौधरी पहल सिंह नौगामे के मौजूदा मुखिया हैं|

इसी प्रकार कलस्यान चौरासी में एक बारहा भी हैं जिसमे तीतरवाडा, सहपत, चढाव, गंगेरु, गढ़ी दौलत, डुंडुखेड़ा,ऊँचा गाँव, बुच्चाखेडी आदि गाँव हैं| वर्तमान में तीतारवाडा के चौधरी सुरेश सिंह बारहा के चौधरी हैं|  

खुरगान के चौधरी फतेहजंग भी क्षेत्र की मशहूर हस्ती रहें हैं, जोकि अपनी दरियादिली के लिए जाने जाते हैं| खुरगान मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों का सबसे बड़ा गाँव हैं| कांधला के चौधरी शफकत जंग 1971 में कैराना से सांसद रहें, उनके यहाँ सभी हिन्दू-मुस्लिम कलस्यान गुर्जर आते-जाते थे, और एक ही हुक्का पीते थे|

गुर्जरों की कलस्यान खाप एकता की मिसाल हैं| कलस्यान खाप हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो के मानने वाले गुर्जर हैं किन्तु वे समाज में बहुत भाईचारे से रहते हैं, वे सभी अपने को बाबा कल्सा की संतान मानते हैं| राजनीती में भी वो धर्म-संप्रदाय से ऊपर उठकर जाति के उमीदवार को वोट करते हैं|

 

सन्दर्भ –

1. Dirk H A Kolff, Naukar, Rajput and Sepoy, Cambridge University Press, 1991, p 83

2 . राणा अली हसन चौहान, गुर्जरों का संछिप्त इतिहास (अनुवाद- श्री ओमप्रकाश गुर्जर (गांधी), यमुनानगर, 2001

3. R S Sharma, Indian Feudalism, AD 300-1200, Macmilan publishers pvt. ltd, Delhi, 1965

4. Sushil Bhati, Khaps in Upper Doab of Ganga and Yamuna, Janitihas Blog, 2017 https://janitihas.blogspot.com/2017/01/khaps-in-upper-doab-of-ganga-and-yamuna.html

5. John F Richards, The Mughal Empire, Part 1, Vol. 5, Cambridge University Press, 1995

6 . M C Pradhan, The political system of the Jats of Northern India. 1966

7. Abul Fazl Allami, Ain I Akbari, Vol. II (Translation- H S Jarrett), Calcutta, 1981
8. D.R. Chaudhary, Khap Panchayat and Modern Age, National Book Trust, 2014

9. “For instance, in its first sarv khap panchayat after independence in Sorem in the district of Muzaffarnagar of western UP held in 1950, Chaudhary Jawan Singh Gurjjar of the village Beenra Niwas was its pradhan, Thakur Yashpal Singh of village Puniala was UP Pradhan, while Chaudhary Kabul Singh of village Sorem was its mantri,” https://iajesm.in/admin/papers/67cec74342bb6.pdf

10. अनिरुद्ध चौहान (कलस्यान), ग्राम ब्रह्मखेडा, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 26.12.25

11. चौधरी मैसर अली (कलस्यान) चौहान, ग्राम माल्हीपुर, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 27.12.25 

12. श्री सतीश कलस्यान, ग्राम गढ़ी रामकौर, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 28.12.25 

13. श्री विनय कलस्यान, ग्राम जसाला, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 29.12.25 

14. सुशील भाटी, राणा अली हसन चौहान की वंशावली, Janitihas Blog, 2023 https://janitihas.blogspot.com/2023/06/

 

  

कलस्यान चौरासी खाप के चौधरी रामपाल सिंह डॉ सुशील भाटी के साथ 

Wednesday, December 24, 2025

बटार गुर्जरों की बावनी

डॉ सुशील भाटी

बटार गोत्र के गुर्जरों के 52 गाँव की एक खाप जिले सहारनपुर में स्थित हैं, इस खाप को बटारो की बावनी कहते हैं और इसका केंद्र गंगोह क़स्बा हैं| जानकार लोगो का मानना हैं कि परम्परागत 52 गाँव अब बढ़ कर 65 के करीब हो गए हैं| बटारो के अधिकांश गाँव गंगोह और नकुड के बीच हैं| वास्तव में यह बावनी “गुजरात” का हिस्सा हैं| अठारवी शताब्दी में मध्य सहारनपुर गुर्जर जाति की बाहुल्यता और आधिपत्य के कारण “गुजरात” कहलाता था| इस “गुजरात” में सहारनपुर के नकुड, गंगोह, रामपुर, परगने तथा मुज़फ्फरनगर के कैराना और झिंझाना क्षेत्र आते थे| इस क्षेत्र के ननौता, अम्भेटा, गंगोह, देवबंद और कांधला कस्बो में “गुज्जरवाडा” नाम के मोहल्ले हैं, जो इस क्षेत्र में  गुर्जरों के आधिपत्य को दर्शाते हैं|

बटारो गोत्र के लोगो में यह मान्यता चली आ रही हैं कि उनके पूर्वज मुल्तान से आये थे| डेंजिल इबटसन की पुस्तक ‘पंजाब कास्ट’ के अनुसार मुल्तान क्षेत्र में आज भी बटार गोत्र के जाट बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं| सबसे पहले बटार गुर्जर गंगोह के निकट दूधला गाँव में बसे| उन्होंने गंगोह के आस-पास 52 गाँव बसाये| जो कालांतर में बटारो की बावनी के नाम से प्रसिद्ध हुए| बटार गोत्र के सरदार ने गंगोह में एक किले का निर्माण किया और वहाँ सैन्य छावनी स्थापित किया| उसने गंगोह के इस किले को अपने प्रभावक्षेत्र का केंद्र बनाया| गंगोह स्थित इस किले के चार बुर्ज़ थे, जिनके अवशेष आज भी मौजूद हैं|| गंगोह में आज भी गुज्जरवाडा मोहल्ला हैं, ज़हां बटार गोत्र के गुर्जर रहते हैं| कुछ बटार परिवार, पंवार गुर्जरों की लंढोरा रियासत के उत्कर्ष काल में, लगभग 250 वर्ष पूर्व, गंगा के खादर में लक्सर क्षेत्र में चले गए, ज़हां आज भी उनके लक्सर, बसेडी, बसेड़ा  सीमली, मुबारिकपुर आदि अनेक गाँव हैं|

मुग़ल काल में बटारो की बवानी के बड़े आबादी समूह ने इस्लाम धर्म को अपना लिया| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध 1857 के स्वाधीनता संग्राम के समय बटारो की बावनी के परंपरागत चौधरी भी बुड्ढाखेडा गाँव के एक मुस्लिम गुर्जर चौधरी फतुआ गूजर थे| उनके पास 5200 बीघा ज़मीन थी| चौधरी फतुआ गूजर बुड्ढाखेड़ा स्थित मिट्टी के किले में लखौरी इंटों से बने शानदार महल में रहते थे| उन्होंने अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूक दिया और स्वयं को क्षेत्र का राजा घोषित किया| उन्होंने अंग्रेजो को सहारनपुर जिले में गुर्जरों के परपरागत क्षेत्र ‘गुजरात’ से बाहर निकालने का आवाहन किया| उनके नेतृत्त्व में हिन्दू और मुस्लिम गुर्जर सगे भाइयो के तरह मिलकर कम्पनी शासन के विरुद्ध लड़ें| इस संघर्ष में वे अपने साथ क्षेत्रीय हिन्दू राजपूतो और मुस्लिम राजपूतो (रांघडो) को भी अपने साथ जोड़ने में सफल रहें| शेख एवं तुर्कमान भी वैचारिक रूप से इस संघर्ष में फतुआ गूजर के साथ थे, हालाकि वे प्रत्यक्ष इस संघर्ष में उनके साथ नहीं लड़ें| इब्राहिमी गाँव के चौधरी आलिया खटाना, टाबर गाँव के ठाकुर बख्शी सिंह, रांघडो के उमरपुर, मानपुर, कुंडा कलां आदि गाँव बाबा फतुआ गूजर के विशेष सहयोगी थे|  फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में लगभग 3000 क्षेत्रीय लोगो ने गंगोह और नकुड पर हमला बोल दिया और अंग्रेजी राज का सफाया कर दिया| नकुड तहसील और थाने को आग के हवाले कर दिया| प्रतिक्रिया में अंग्रेजी सेना ने रोबर्टसन के नेतृत्त्व में बुड्ढाखेडा पर हमला बोल दिया| हाथी के मदद से अंग्रेजो ने किले का दरवाज़ा तोड़ दिया| फतुआ गूजर बहादुरी से लड़ें किन्तु पराजित हुए| किन्तु वे किले से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहें| अंग्रेजो ने मिट्टी के किले का गिरा दिया और महल को क्षतिग्रस्त कर दिया| एक ज़ोरदार संघर्ष के बाद अंततः 27 जून 1857 फतुआ गूजर सुर्खवाला के युद्ध में शहीद हो गए| अंग्रेजो ने उनकी भूमि और संपत्ति ज़ब्त कर ली| उनके गाँव को राज़स्व रिकार्ड्स में कच्चा घोषित कर बदहाल स्तिथि में पहुंचा दिया गया| बाबा फतुआ के कोई पुत्र नहीं था| बुड्ढा खेडा के बहुत से लोग अंग्रेजो के जुल्म के कारण भिस्सल हेडा गाँव चले गए|

उपरोक्त परिस्थिथियो में बटारो की चौधर 1890 ई. के लगभग में शेरमऊ गाँव के हिन्दू बटार गुर्जरों के पास चली गई| शेर मऊ गाँव के चौधरी उमराव सिंह उर्फ़ अमरा सिंह बटारो की बावनी के चौधरी बनें| इसके बाद इनके वंशज लगातार बटारो की बावनी खाप के चौधरी बनते आ रहें हैं| शेर मऊ के चौधरी परिवार से सम्बंधित चौधरी पारस सिंह पुत्र श्री जय सिंह ने बताया की औरंगजेब के काल में भी बटारो की चौधर शेर मऊ गाँव में उनके पूर्वज चौधरी करमचंद जी के पास थी, जोकि क्षेत्र से लगान वसूल कर दिल्ली खजाने में जमा करते थे| एक बार जब वो इसी कार्य से दिल्ली गए हुए थे, लौटकर मुसलमान बन गएँ| श्री इमरान अली, निवासी बुड्ढा खेडा के अनुसार यह घटना जहाँगीर के काल की हैं| वे कहते हैं उनके पूर्वज ने वहां मुस्लिम भोजनालय या किसी मुस्लिम के यहां खाना खा लिया और घर आकर सच्चाई बता दी। घरवालों ने सनातन धर्म का मानने से इनकार कर दिया, उसके खाने पीने के बर्तन अलग कर दिए। उसका दूसरा बियाह उसकी घरवाली ने ही कराया था। उनकी हिन्दू पत्नी जोकि कैराना की बेटी थी, उसने उनकी देखभाल के लिए, उनका निकाह कैराना से ही अपनी जान-पहचान की एक मुस्लिम लड़की से करा दिया, जिनसे उन्हें दो पुत्र हुए| एक पुत्र का नाम जामुद्दीन था, जिसने बुड्ढा खेडा गाँव बसाया, और वह बटारो की बावनी का चौधरी बना| मुस्लिम पत्नी के दूसरे पुत्र ने भिस्सल हेडा गाँव बसाया| चौधरी करमचंद की हिन्दू पत्नी के तीन लडको के वंशज कम्हेडा, शेर मऊ और कुराली में बस गए| शेर मऊ के वर्तमान चौधरी का वंश वृक्ष इस प्रकार हैं-

1.     चोधरी उमराव सिंह उर्फ़ अमरा सिंह

2.     चौधरी राजाराम

3.     चौधरी नत्थू सिंह

4.     चौधरी सोम सिंह

5.     श्री धनेंदर चौधरी (बटार बावनी के वर्तमान चौधरी)

मुस्लिम बटार गुर्जरों के गाँवो की सूची-

1. दरबूजी 2. थावनी 3. भिस्सलहेडा 4. तिघरी 5. घाटमपुर 6. नवाज़पुर 7. घिस्सेवाला 8. किडौली  9. भलापड़ा 10. हाजीपुर 11. गुड़हनपुर 12. खानपुर 13 खैरपुर 14. टापाहेडी 115. सौंतर  16. पीर माजरा 17. हमजागढ़ 18.फतेहपुर ढोला 19. क़ुतुब खेडी 20. बोड़पुर 21. बुड्ढाखेडा 22. कोटडा 23. टिंडोल्ली

हिन्दू-मुस्लिम बटार गुर्जरों की मिश्रित आबादी वाले गाँवों की सूची

1. मैनपुरा / मोहनपुरा 2. बाढ़ी माजरा 3. बडगाँव 4. सांगाखेडा 5. कुलहेडी 6. गंगोह (गुज्जरवाडा) 7. भोगीवाला माज़रा

हिन्दू बटार गुर्जरों के गाँवो की सूची-

1. रामगढ़ 2. ढोला माजरा 3. सिरस्का 4. किशनपुरा 5. सनौली 6. छाप्पुर छोटी 7. छाप्पुर बड़ी  7. बिस्नोट 8. खोसपुर 9. कुराली 10. नया गाँव 11. समसपुर 12. भैरमऊ 13. दरियापुर 14. रामसहायवाला 15. रंधेडी / धीर खेडी 16. ढायकी 17. चकवाली 18. अलीपुरा 19. बंदाहेडी 20. बीराखेडी 21. शेरमऊ  22. कम्हेडा 23. सालारपुरा 24. 25. जुखेडी  26. ज़न्धेडा

दूधला गाँव के कैप्टन मंगत सिंह (बटार), अधिवक्ता एक अन्य प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और नेता थे, जोकि 1937 में विधायक निर्वाचित हुए थे| ग्राम बीरा खेडी में जन्मे महंत जगन्नाथ दास (बटार) क्षेत्र की एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे, उनका आश्रम गाँव रणदेवा में था| वे 1946 में सहारनपुर से निर्विरोध विधायक चुने गए| उनकी याद में “महंत जगन्नाथ दास इंटर कॉलेज” बांदूखेडी गाँव संचालित किया जाता हैं| गंगोह के श्री कदम सिंह (बटार) स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार थे|  दूधला गाँव के श्री कंवरपाल सिंह (बटार) नकुड विधानसभा से तीन बार वर्ष 1989, 1991 और 1996 में विधायक चुने गए| उनके सुपुत्र श्री प्रदीप चौधरी दो बार नकुड और एक बार गंगोह से विधायक रहें| वे एक बार वर्ष 2014 से 2019 तक कैराना लोकसभा से सांसद भी रहें हैं| चौधरी इरशाद वर्ष 2005 से 2010 तक सहारनपुर के जिला पंचायत अध्यक्ष रहें हैं| भिस्सल हेडा के चौधरी दोस्त मोहम्मद (बटार) गंगोह ब्लाक के प्रमुख रहें हैं| हरडाखेडी गाँव के चौधरी ताहिर (बटार) चिलकाना ब्लाक के प्रमुख रहें हैं| फतेहपुर ढोला गाँव के चौधरी मज़ाहिर राणा एक अन्य प्रमुख बटार गुर्जर हैं|

क्षेत्र के लोग हिन्दू-मुस्लिम गुर्जरों की एकता की मिसाल देते हैं| बटार गोत्र के हिन्दू-मुस्लिम गुर्जरों की एकता को प्रोत्साहित करने के लिए वर्ष 1986 में सालारपुरा गाँव में एक गुर्जर सम्मलेन का अयोज़न भी किया गया था| वर्तमान में हिन्दू-मुस्लिम गुर्जर, 27 जून को, गंगोह कस्बे में बाबा फतुआ गूजर का शाहदत दिवस बड़े धूम-धाम से मनाते हैं| चुनावी राजनीती में भी हिन्दू-मुस्लिम गूजर धर्म-संप्रदाय से ऊपर उठकर अपनी जाति और गोत्र के प्रत्याशी को वोट करते हों|

सन्दर्भ-

1. टेलीफोनिक साक्षात्कार चौधरी पारस सिंह, ग्राम शेर मऊ, सहारनपुर, दिनांक 23.12.2025

2. टेलीफोनिक साक्षात्कार चौधरी धनेंदर सिंह, ग्राम शेर मऊ, सहारनपुर, दिनांक 23.12.2025

3. टेलीफोनिक साक्षात्कार चौधरी संजय सिंह, ग्राम शेर मऊ, सहारनपुर, दिनांक 21.12.2025

4. टेलीफोनिक साक्षात्कार श्री मुस्तकीम चौधरी, गुज्जरवाडा, गंगोह, सहारनपुर, दिनांक 19.12.2025

5. टेलीफोनिक साक्षात्कार श्री विपिन आर्य, ग्राम ढोला माज़रा, सहारनपुर, दिनांक 19.12.2025

6. टेलीफोनिक साक्षात्कार श्री ओमकार सिंह चौधरी, ग्राम उमरी कलां, सहारनपुर, दिनांक 19.12.2025

7. H. R. Nevill, Saharanpur: A Gazetteer, Allahabad, 1909, p 101

8. Dangli Prasad Varun, Uttar Pradesh District Gazetteer: Saharanpur, Lucknow, 1981, p 64

9. Eric Stroke, Peasant Armed, Oxford, 1986, p 199, 207

10. Ranajit Guha, Elementary Aspects of Peasant Insurgency in Colonial India, p 313, 318, 321

11. R C Majumdar, The Sepoy Mutiny and the Revolt of 1857,  1963, p 106 

12. S B Chaudhari, Civil Rebellion in Indian Mutinies, 1857-1859, 1957, p 77, 287

13. Denzil Ibbetson, Tribes and castes of Panjab, Lahore, 1916



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