डॉ सुशील भाटी
उत्तराखण्ड राज्य की
शिवालिक पहाडियों की तराई में विकासनगर से लेकर नेपाल से सटे टनकपुर तक लगभग 7000 मुस्लिम
गुज्जर परिवार अर्ध घमन्तु पशुपालको का जीवन जी रहे हैं, जिनमे सबसे अधिक लगभग
1000 परिवार श्यामपुर रेंज में हैं| इनके बुज़ुर्ग कभी सैकड़ो वर्ष पहले जम्मू से
हिमाचल होते हुए उत्तराखण्ड आये थे| इन गुज्जरों के पास भूमि अधिकार नहीं हैं| वन विभाग के चुगान के पुराने परमिट ही इनके वनों में रहने
और पशु चराने के अधिकार का आधार हैं| गुज्जर चरवाहे मुख्य रूप से भैंस पालते हैं, साथ में गाय और यातायात के लिए घोड़े भी पालते थे| आम तौर पर, वे अपनी भैंसों के साथ ऊपरी हिमालय में स्थित बुग्यालों
(घास के मैदानों) में चले जाते हैं और मानसून के अंत में ही तलहटी में अपनी
अस्थायी झोपड़ियों, डेरों में लौटते
हैं। गुज्जर वनों में रहते हैं, अतः कई बार इन्हें वन गुज्जर भी कह देते हैं| सरकार ने राजा जी नेशनल पार्क और जिम कॉर्बेट पार्क से कुछ
अर्ध-घुमंतू गुज्जरों को विस्थापित कर हरिद्वार जिले में दो बस्तियों में उनका
पुनर्वासित भी किया हैं| एक गुज्जर
बस्ती पदार्था के निकट पथरी में स्थित हैं तथा दूसरी गैंडीखाता में हैं|
पथरी स्थित गुज्जर बस्ती 1998 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने राजा जी
नेशनल पार्क के मोतीचूर, रानीपुर आदि क्षेत्र से अर्ध घुमंतू गुज्जर चरवाहों को
विस्थापित कर बसाई थी| बस्ती में
लगभग 512 गुज्जर परिवारों को विस्थापित किया गया था| वर्तमान में गुज्जर बस्ती की आबादी 5000 से अधिक हैं, जिनमे लगभग 2700 व्यस्क
हैं|
गैंडीखाता गुज्जर बस्ती
में लगभग 9000 गुज्जर निवास
करते हैं। वर्ष 2002 में गैंडीखाता गुज्जर बस्ती में 881 गुज्जर परिवार ‘राजा जी
नेशनल पार्क” और 157 गुज्जर परिवार “जिम कॉर्बेट पार्क” से विस्थापित किए गए थे| इस प्रकार उस समय कुल 1038 परिवारों को विस्थापित कर गेंखाडीता में गुज्जर बस्ती बसाई
गई थी| एक अनुमान के अनुसार इस समय बस्ती की आबादी
लगभग 9000 हैं, तथा जिनमे 4500 व्यस्क हैं|
अर्थव्यवस्था- अर्ध-घुमंतू वन गुज्जरों
की अर्थव्यवस्था को ऋतु प्रवास के लिए जाना जाता हैं| अधिकांश वन गुज्जरों का पुनर्वासित नहीं किया गया हैं, वे अभी भी अपनी भैंसों के साथ ऋतू प्रवास करते
हैं| ऋतु प्रवास सामान्यतः बैसाखी के दिन आरम्भ किया
जाता हैं, इस दिन मीठे चावल बनते थे और भैंसों तथा अन्य पशुओ को पत्थर की गरम
कंकरी से छोप लगाया जाता था| विश्वास किया
जाता था कि इससे ये पशु साल भर बीमार नहीं होते थे| इसी दिन वन गुज्जर मैदानी
क्षेत्रो से पहाडी बुग्यालो के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं| इस प्रकार बैसाखी का वन-गुज्जरों में विशेष महत्व हैं| ऊँचे पहाड़ो पर स्थित बुग्यालो से वो फिर सावन-भादो के बाद
असोज (क्वार) के महीने में लौटते थे|
वन गुज्जर गाय-भैंस या किसी भी जानवर को वो अपने परिवार के सदस्य के रूप में
मानते हैं| उनके मरने पर परिवार में
मातम का माहौल हो जाता हैं| कुछ सदस्य
रोने लगते हैं| अतः मांस के लिए उनकी
हत्या नहीं की जाती| एक परिवार के पास लगभग 25 भैंसें होती हैं| उन्हें सिर्फ दूध के लिए पाला जाता हैं, उनकी
भैसों के दूध की गुणवक्ता के कारण उन्हें उत्तराखंड
और उत्तर प्रदेश के बाजारों में अच्छी कीमत मिलती है।
पथरी और गैंडीखाता गुज्जर बस्तियों
में स्थायी रूप से बसने के बावजूद खेती-किसानी से साथ-साथ पशुपालन आज भी उनका
मुख्य पेशा है|
सामाजिक संगठन – मुस्लिम वन गुज्जर गोत
व्यवस्था का पालन करते हैं, तथा इनमे कसाना, देदड, चेची, लोदा, खटाना, चौहान, बागड़ी, कालस, डिंडा आदि गोत के गुज्जर पाए जाते हैं| इनके सभी गोत्र इनके हिन्दू गुज्जर भाइयो से मिलते हैं| एक गोत्र के लड़का-लड़की भाई-बहन माने जाते हैं| वन गुज्जर को अपनी गुज्जर पहचान पर बहुत गर्व हैं| उनकी बस्ती का नाम ही गुज्जर बस्ती हैं| बहुत से वन गुज्जरों ने बाइक पर अपनी पहचान के तौर पर
गुर्जर लिखावा रखा हैं, कुछ वन गुज्जरों ने अपने वाहनों पर गुज्जर चिन्ह भी लगा
रखा हैं| मुस्लिम वन गुज्जरों का
मानना हैं कि हिन्दू गुज्जरों के साथ उनका खून का रिश्ता हैं, उनकी जाति और गोत एक
हैं| गोत व्यवस्था एक हैं| वे हिन्दू गुज्जरों से बड़े प्रेम और उत्त्साह से मिलते
हैं| दोनों एक साथ बैठ कर अपने सांझे इतिहास और सांस्कृतिक
विरासत की बड़े गर्व के साथ चर्चा करते हैं| दोनों के बीच इस बात पर अच्छा-खासा जोर है कि भले ही उनके धर्म अलग अलग हैं
लेकिन ख़ुशी या गम में एक दूसरे से मिलना चाहिए|
जनजाति पंचायत व्यवस्था- गुज्जरों में एक संस्था के रूप में परम्परगत जनजाति पंचायत
आज भी प्रभावी रूप से विध्यमान हैं| आपस में किसी
में वाद-विवाद झगडे की दशा में गुज्जर जनजाति के पैंच (पंच) फैसला करते हैं| जोकि सभी को मान्य होता हैं| कोर्ट कचहरी में
मामले बहुत कम जाते हैं| अंततः विवादों
के लगभग सभी फैसले पैंच (पंच) ही करते हैं| घरो की बैठकों
में मूढो रखने का रिवाज़ हैं, थोडा-बहुत हुक्के का प्रचलन भी हैं|
हकीका- बच्चे के जन्म पर दावत दी जाती हैं उसे हकीका कहते हैं|
विवाह- मुस्लिम वन गुज्जर
हिन्दू गुज्जर की तरह ही गोत्र बचा कर शादी ब्याह करते हैं। वन गुज्जरों में न्योते मुह-जबानी दिए जाते हैं, कार्ड अन्य लोगो के लिए छपवाए जाते हैं| वन गुज्जर मुख्यत्तः शाकाहारी
भोजन करते हैं। विवाह के अवसर पर दावत में घी-बूरा और दाल चावल का प्रयोग किया
जाता हैं| शादी-ब्याह के मोके पर दुल्हन के मामा भात देते
हैं| दहेज़ प्रथा का प्रचलन रहा हैं, लड़की को दहेज़
में भैंस दी जाती हैं| विवाह के समय स्त्रियों
द्वारा गूजरी भाषा में मंगल गीत, जिन्हें बैंत कहते हैं, गाये जाते हैं| शादी-ब्याह के समय बारात में मनोरंजन के लिए मुगदर हिलाना
और हाथ छुड़ाना जैसे शक्ति प्रदर्शन के खेल भी होते हैं|
मृत्यु भोज
प्रथा- परिवार जन की मौत
पर मृत्यु भोज दिया जाता हैं| मौत के सातवे और चालीसवे दिन रिश्तेदार और मित्र घर
पर आते हैं और एक भोज का आयोजन होता| मृत्यु एक साल
बाद बरसी होती हैं और उस पर कुटुम्ब और रिश्तेदारों को बुलाया जाता हैं और भोज
किया जाता हैं|
खान-पान- वन गुज्जर मुख्यत्तः शाकाहारी भोजन करते हैं। विवाह
के अवसर पर दावत में घी-बूरा और दाल-चावल का प्रयोग किया जाता हैं| बानियाँ गोत के मुस्लिम
गुज्जर दीपावली के दिन मीठे चावल बनाते हैं| बैसाखी के दिन का, ऋतु प्रवास के सन्दर्भ में, वन गुज्जरों में विशेष महत्व
हैं, इस दिन मीठे चावल बनते हैं| पालतू पशु की
मांस के लिए उनकी हत्या नहीं की जाती| उन्हें सिर्फ
दूध के लिए पाला जाता हैं| वन गुज्जरो का
भोजन दूध-दही-मक्खन पर आधारित शाकाहारी भोजन हैं| शादी ब्याह या किसी कारज में थोडा-बहुत हुक्के का प्रचलन
भी हैं|
वस्त्र-पहनावा- महिलाओ में पर्दा प्रथा
नहीं हैं| वे सलवार कुर्ता पहनती
हैं, और सिर ढककर रखती हैं| सिर ढकने के
लिए चादरी अथवा ओढनी का प्रयोग करती हैं| विवाहित महिलाये नाक में बड़ी गोल लोंग पहनती हैं| पहले के समय में चांदी की
हसली गले में पहनती थी| ओढनी/ ओन्ना
तथा चांदी की भारी हसली पहनने का रिवाज़ हिन्दू गुज्जर महिलाओ में भी रहा हैं| परंपरागत रूप से वन गुज्जर कुर्ता और तहमद पहनते हैं| पुरुष दाढ़ी-मूंछ
रखते हैं और सफ़ेद या काले रंग की गूजरी पगड़ी
बांधते हैं अथवा नीचे से गोल और ऊपर से नुकीली गूजरी टोपी पहनते हैं| | बाहर जाते वक्त हाथ में लाठी रखते हैं| सर्दियों में परागत फुतोई पहनते हैं| गर्म चादर ओढ़ते हैं, जिसे पट्टी कहते हैं|
गूजरी भाषा- वन गुज्जरों की अपनी भाषा “गूजरी” हैं जो
अधिकांशतः राजस्थानी से मिलती हैं, परन्तु इस पर पंजाबी और डोगरी का प्रभाव भी हैं|
यह एक ऐतिहासिक सच हैं कि आधुनिक गुजराती और राजस्थानी भाषाओ की उत्पत्ति गुर्जरी
अपभ्रंश से हुई| गुर्जरी अपभ्रंश सातवी-आठवी शताब्दी में आधुनिक राजस्थान जोकि उस
समय गुर्जर देश/ गुर्जरत्रा भूमि कहलाता में प्रचलित थी|अतः वन गुज्जरों की गूजरी भाषा की राजस्थानी से समानता
ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि करता हैं|
वन गुज्जरों की
समस्याए और अपेक्षाए- वन गुज्जरों के
पास उनके ग्रीष्मकालीन ‘गोविंद पशु विहार राष्ट्रीय उद्यान’ तथा अन्य बुग्यालो और
शीतकालीन आवासों में पशु चुगान के वैध परमिट हैं। लेकिन अधिकारियों द्वारा उन्हें
पार्क में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। उत्तराखण्ड के माननीय उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में गोविंद पशु
विहार राष्ट्रीय उद्यान के भीतर स्थित बुग्यालों, हिमालयी अल्पाइन घास के मैदान,
में अपने ग्रीष्मकालीन निवासों में प्रवास करने के वन गुज्जरों के अधिकार को
बरकरार रखता है। न्यायालय ने
संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) के आधार पर उक्त आदेश निर्गत किया हैं|
वन गुज्जरों की मांग हैं
कि सरकार को सभी ऋतू प्रवास करने वाले अर्ध घुमंतू गुज्जरों को विस्थापित कर बसा
देना चाहिए| तभी वे राष्ट्र की मुख्य
धारा से जुड सकेंगे| उनके बच्चे पढ़ पाएंगे और
उन्हें समय चिकित्सा आदि सभी सुविधाए मिल पाएंगी|
उनके बुज़ुर्ग कभी सैकड़ो वर्ष पहले जम्मू से हिमाचल होते हुए
उत्तराखण्ड आये थे, वहाँ दोनों
राज्यों में अर्ध घुमंतू चरवाहा गुज्जरों को एस टी का दर्ज़ा वर्षो पहले मिल गया
हैं| मूल रूप से उन्ही का हिस्सा होते हुए, उनके जैसे ही हालात हुए भी, अभी तक
उन्हें उत्तराखण्ड में यह दर्ज़ा प्राप्त नहीं हैं, जोकि वन
गुज्जरों के विकास के लिए परम आवश्यक हैं|
वन गुज्जरों का यह मत है
कि जो कृषि भूमि उन्हें गुज्जर बस्ती में आवंटित की गई हैं उसके कब्ज़े आदि के
दस्तावेज़-प्रमाणपत्र आदि उन्हें मिल जाने चाहिए, जोकि अभी तक अप्राप्त हैं|
सन्दर्भ –
1.
साक्षात्कार- गनी कसाना, गुज्जर बस्ती
पथरी, हरिद्वार,
दिनांक 4.10.2024
2.
साक्षात्कार- श्री सुलेमान कसाना, गुज्जर बस्ती पथरी, हरिद्वार, दिनांक 4.10.2024
3.
साक्षात्कार- चौधरी शफी लोदा, गुज्जर बस्ती गैंडीखाता,
हरिद्वार, दिनांक 18.
10.24
4. साक्षात्कार- चौधरी वजीर चोपड़ा गुज्जर बस्ती गैंडीखाता,
हरिद्वार, दिनांक 18.
10.24
5.
साक्षात्कार- श्री आमीर हमजा,
कुनाऊचौड, पौड़ी गढ़वाल, दिनांक 3.1.25
6. साक्षात्कार- चौधरी रफ़ी गुज्जर नरेंद्रनगर, दिनांक 3.1.25
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| डॉ सुशील भाटी वन-गुज्जरों से बातचीत करते हुए |
