डॉ सुशील भाटी
अनंगपुर भारत के हरियाणा राज्य के फ़रीदाबाद शहर के पास स्थित एक ऐतिहासिक गाँव है। अनंगपुर तंवर वंश के प्रथम शासक अनंगपाल प्रथम (736 ई.) की राजधानी थी, जिन्होंने यहाँ किले और स्मारक बनवाए थे| अनंगपाल प्रथम संभवतः उज्जैन के गुर्जर प्रतीहार शासक नागभट प्रथम का सामंत था, जिसने उसे उत्तर भारत में साम्राज्य विस्तार के समय वर्तमान महरौली-फरीदाबाद क्षेत्र में बारह गाँव की जागीर प्रदान की, जोकि आगे चलकर दिल्ली-हरयाणा के तंवर राज्य का केंद्र (Epicentre) बनी| अनंगपाल प्रथम ने अनंगपुर से अपने राज्य का विस्तार कम से कम करनाल क्षेत्र तक किया। तंवर वंश का प्रथम पुरातात्विक उल्लेख पेहोवा, (करनाल) से प्राप्त शिलालेख में हुआ है|
राजा अनंगपाल तंवर ने अपने शासनकाल में अनेक भवन तथा मंदिर बनवाए, जिनमें से अधिकांश अब नष्ट हो चुके हैं। अनंगपुर बांध एक भारतीय हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग संरचना है जिसे अनंगपाल प्रथम के शासनकाल के दौरान बनाया गया था| इस बाँध के निकट ही एक बड़ा चिनाई वाला तालाब ‘सूरजकुंड’ स्थित है, इसका उपयोग अनंगपुर बांध और आसपास के क्षेत्र से पानी इकट्ठा करने के लिए किया जाता था। अनंगपुर गाँव में आज भी अनंगपाल तंवर की राजधानी के पुरातात्विक अवशेष मौजूद हैं|
इस वंश के अंतिम राजा अनंगपाल द्वितीय थे, जिन्होंने
अनंगपुर को त्याग कर मिहिरपुर (महरौली) के निकट ‘लाल कोट’ का निर्माण करवाया तथा
वहाँ तंवरो की नई राजधानी बसाई| महरौली
स्थित लौह स्तम्भ से अनंगपाल द्वितीय का एक संक्षिप्त अभिलेख प्राप्त हुआ हैं| इतिहासकार
अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार अभिलेख इस प्रकार हैं "संवत् दिहाली 1109 अंग पाल बही"। इसका अर्थ यह है कि
अनंगपाल ने संवत 1109 (1052 ई.)
में दिहाली अर्थात दिल्ली को बसाया और इस स्तंभ को यहां स्थापित किया| गढ़वाल की पोथी के अनुसार
संवत् 1117 मार्गशीर्ष सुदी दशम, (1060 ई.) को लालकोट का निर्माण पूर्ण हआ| लाल कोट से तंवरो ने 1152 से शासन
किया| इस काल में तंवरो की पहली राजधानी अनंगपुर का राजनैतिक महत्व कम हो गया|
इतिहासकारों के एक वर्ग के अनुसार अजमेर के शासक विग्रहराज IV विसालदेव (1150-1164 ई.) ने दिल्ली विजय कर
हांसी तक के क्षेत्रो पर अधिकार कर लिया था| इसी राजवंश में जन्मे पृथ्वीराज
चौहान उर्फ़ राय पिथोरा ने लाल कोट का विस्तार कराया, उसके पश्चात यह किला राय
पिथोरा कहलाने लगा|
दिल्ली के तंवरो के राजनैतिक पतन के
विषय में एक लोककथा प्रचलित हैं, महरौली स्थित लौह स्तम्भ के विषय में एक ब्राह्मण
ने तंवर राजा से कहा कि लौह स्तम्भ धरती में पृथ्वी को धारण करने वाले वासुकि नाग
के फन तक गढ़ा हुआ है तथा उस ब्राह्मण ने यह भविष्यवाणी की जब तक यह लौह स्तम्भ मजबूती
से गढ़ा रहेगा तब तक तंवर राज्य अक्षुण रहेगा| राजा को इस कथन पर संदेह हुआ और उसने स्तम्भ को उखाड़कर जांच करने का आदेश दिया। जब लौह
स्तम्भ निकाला गया, तो उसके निचले छोर पर रक्त लगा था| यह देखकर राजा ने उसे पुनः स्थापित करा दिया|
लोककथा के अनुसार इस बार लौह स्तम्भ ढीला रह गया और पहले जैसा दृढ़ न रह सका। लोक मान्यता के अनुसार इस घटना के कारण तंवर
राज्य का क्षय हो गया और एक कहावत प्रचलित हुई “कीली तो ढीली भई,
तंवर भये मतहीन।
दिल्ली में शासन ख़त्म होने पर भी तंवरो का दिल्ली के ग्रामीण
क्षेत्रो में सामाजिक वर्चस्व बना रहा| उत्तर भारत में एक कहावत है "दिल्ली तंवरो की"
जिसका मतलब है कि दिल्ली तंवरों का वर्चस्व रहा है। उत्तर भारत में एक अन्य कहावत
भी प्रचलित हैं, “जब
तक दिल्ली तंवरो की,
तंवर मरे पे औरों की “दिल्ली के क्षेत्र में अभी भी तंवर
गूजरों के बारह गांव की खाप हैं| इनमे आठ गाँव महरौली क्षेत्र में पड़ते हैं| महरौली क्षेत्र के आठ गाँव फतेहपुर बेरी, असोला, डेरा, मांडी, ग्वाल पहाडी, चांदन हूला, बास खुर्द और बास कलां हैं| इनके अतिरिक्त
भाटी खुर्द,
भाटी कलां, सतबड़ी और तातारपुर अन्य तंवर बाहुल्य गाँव हैं| इन गांवों को आज भी यहाँ के युवाओं की
मजबूत कद-काठी, आपसी
भाईचारे और निर्भयता के लिए जाना जाता है। आज
भी इन गांवों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण यहाँ के तंवर गुर्जरों को, दिल्लीवासी
“दिल्ली का राजा” कहकर संबोधित करते है। फतेहपुर बेरी और ग्वाल पहाड़ी इस तंवर
बारहा खाप के मुख्यालय हैं। फतेहपुर बेरी गाँव में तंवरो का चबूतरा हैं, जहाँ आवश्यकता
अनुसार तंवर खाप की बैठक आयोजित की जाती हैं| दिल्ली में असोला, फरीदाबाद में अनखीर, तथा पलवल में कारना तंवर
गुर्जरों के अन्य महत्वपूर्ण गांव हैं। इस क्षेत्र के तंवर गुर्जरों के भाट के
अनुसार अनंगपाल ने अनंगपुर बसाया|
उसके वंशजो में रणजीत सिंह और हरसुख ने कारना गाँव बसाया| कारना गाँव से शेरपुर
मझोई और रामपुर गाँव निकले| कारना
गाँव के राव लाठे सिंह ने रामपुर बसाया था| राव लाठे सिंह के चार पुत्रो में धन्ना
सिंह ने फतेहपुर बेरी, मुन्ना
सिंह ने धौजपुर,
प्यारे सिंह ने पृथला, और चौथे पुत्र कालिया सिंह ने उत्तर प्रदेश में काठीखेडा
बसाया| महरौली क्षेत्र
के अन्य सात गाँव फतेहपुर बेरी से निकल कर बसे| दिल्ली में लगभग तंवर गुर्जरों के 20 गाँव हैं| भाट की बात पर यकीन किया जाए तो
महरौली, फरीदाबाद और पलवल क्षेत्र के तंवर गुर्जर अनंगपाल के वंशज हैं और उन सबका
निकल अनंगपुर से हैं|
पूर्व में हमने पेहोवा, कर्नल स्थित तंवर वंश के प्रथम शिलालेख के
विषय में बात की थी| यह शिलालेख कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल (885–910 ई.) के सामंत गोग्गा तंवर ने अंकित करवाया
था| उक्त शिलालेख
के अनुसार पृथुदक ‘पेहोवा’ में शासन करने वाले तंवर वंश के आदि पूर्वज का नाम
जाऊला हैं| जाऊला हमें कुडा अभिलेख के तोरमाण शाही जावुला का स्मरण कराता हैं| इतिहासकार रुडोल्फ होर्नले ने अपने
शोध पत्र “Some Problems of
Ancient Indian History, No. III The Gurjara Clans” में जाऊला की पहचान हूण सम्राट तोरमाण से की हैं,
और तंवर वंश को मूल रूप से गुर्जर जाति का बताया हैं| होर्नले कहता हैं कि पेहोवा अभिलेख
दर्शाता हैं कि नवी शताब्दी के अंत में भी समाज में यह स्मरण बना हुआ था, कि तोमरो
की उत्पत्ति तोरमाण हूण से हुई हैं| वह
कहता हैं कि तोमर शब्द तोरमाण का बिगड़ा हुआ रूप हैं जिसका अर्थ हैं तोरमाण का वंशज| होर्नले कहता हैं कि भारत में शब्दों
के अक्षरों को आगे-पीछे करना आम बात हैं| वह बताता हैं कि राजतरंगिणी में भी तोरमाण को तोमरान लिखा गया हैं|आज भी पेहोवा के पास तंवर गुर्जरों का क्योडक
नाम का गाँव एक बहुत बड़ा गांव स्थित है, जिसकी आबादी लगभग 20,000 हैं|
तंवर अथवा तोमर वंश के गुर्जर सम्बन्ध में कुछ अन्य रोचक तथ्य भी हैं| ग्वालियर के गंगोलाताल से, प्राप्त
संवत 1551, में स्थानीय भाषा में उत्कीर्ण एक अभिलेख में राजा मान सिंह तोमर
(1486-1516 ई.) के नाम से पूर्व गुरजैर शब्द का प्रयोग हुआ हैं| जिससे उनके गुर्जर होने का अनुमान
होता हैं| कुछ विद्वान
गुरजैर गुरवैर (गुरुवार) पढ़े जाने के पक्ष में हैं| सच्चाई जानने के लिए इस अभिलेख का सूक्ष्म अध्ययन किया जाना आवश्यक
हैं| ग्वालियर के
किले के समीप राजा मान सिंह तोमर द्वारा बनवाए गए महल को आज भी गूजरी महल कहते है| लोक मान्यता हैं कि यह महल राजा मान
सिंह तोमर ने अपनी गूजरी रानी मृगनयनी के लिए बनवाया था| राजा मान सिंह की तथाकथित गूजरी रानी
मृगनयनी की ऐतिहासिकता संदेहास्पद हैं| इस लोक मान्यता को
वृदावनलाल वर्मा के लोकप्रिय उपन्यास मृगनयनी के 1950 में प्रकाशन से अधिक बल मिला
हैं| यदि मृगनयनी
नामक कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, तो प्रश्न उठता हैं कि राजा मान सिंह द्वारा बनवाए गए महल को गूजरी
महल क्यों कहा जाता हैं? तब क्या यह उनकी जाति को इंगित करता हैं?
योगमाया तंवरो की कुलदेवी हैं, जिनका मंदिर भी महरौली में स्थित है| अनंगपुर
महरौली और तुगलकाबाद के साथ एक भौगोलिक त्रिभुज बनाता है। यहाँ तंवरो और उनके
भाई-बंद गोत्र बिधुड़ी आदि की पुराने गाँव-बस्तियां हैं। तंवर गुर्जरों के साथ बिधुड़ी गोत्र की उपस्थिति,
तंवरो का एक अन्य हूण-गुर्जर कोण उपस्थित करती
है| बिधुड़ी गोत्र के गुर्जर हूण गोत्र के
गुर्जरों से विवाह नहीं करते हैं क्योकि वे स्वयं को हूण गोत्र से ही निकला मानते
हैं| जैसा कि पूर्व
में कहा जा चुका हैं कि ब्रिटिश इतिहासकार रुडोल्फ होर्नले तंवरो / तोमरो को हूण
शासक तोरमाण का वंशज मानते हैं| इतिहासकारो
के अनुसार मिहिरपुर (महरौली) की स्थापना भी हूण सम्राट मिहिर कुल ने की थी| कल्हण की राजतरंगिणी पुस्तक के अनुसार
मिहिरकुल द्वारा एक अन्य मिहिरपुर नगर कश्मीर में बसाया गया था|
अनंगपुर गाँव में अब मुख्यतः भडाना गुर्जर निवास करते हैं| यह गाँव अब भडाना खाप के बारह गाँव
में से एक हैं|
तंवर गुर्जरों के कुछ परिवार अभी भी भड़ाना गुर्जरों के साथ अनंगपुर गांव में रहते
हैं।
भडाना गोत्र के बारह गाँव की खाप किस समय इस क्षेत्र में स्थापित
हुई, यह एक ऐतिहासिक महत्व का प्रश्न हैं| समकालीन स्त्रोतों से पता चलता हैं कि
12वीं शताब्दी के दौरान राजस्थान का बयाना क्षेत्र भड़ाना या भदानक देश के नाम से
जाना जाता था| ऐतिहासिक स्त्रोतों में भडानो को भड़ानक या भदानक भी कहा गया हैं| हमें अजमेर के चौहानों के साथ उनकी
लड़ाई के कई संदर्भ मिलते हैं, जिनमे भादानक अथवा भडाना पराजित हुए और चौहानों के
सामंत बन गए|
संभवतः बारहवी शताब्दी के उत्तरार्ध में चौहानों द्वारा दिल्ली विजय के समय भडाना
भी उनकी सेना में सम्मिलित थे,
तथा जिन्हें दिल्ली विजय के बाद 12 गाँव की जागीर फरीदाबाद क्षेत्र में प्रदान की
गई| इन बारह गाँव
में एक अनंगपुर भी हैं|
इस प्रकार आठवी शताब्दी से दसवी शताब्दी तक अनंगपुर तंवर गुर्जरों की
राजधानी था|
उसके बाद उनकी राजधानी मिहिरपुर ‘महरौली’ के निकट ढिल्लीकापुरी /दिहाली / दिल्ली बनी|
अजमेर के चौहानों की दिल्ली विजय के बाद अनंगपुर भडाना गुर्जरों की बारह
गाँव की जागीर का हिस्सा बना दिया गया| अनंगपुर में गुर्जरों के बसने के प्रमाण आठवी शताब्दी से मिलते हैं|
सन्दर्भ:
1. A
F Rudolf Hornle, Some Problems of Ancient Indian History, No. III The Gurjara
Clans, Journal of The Royal Asiatic Society, 1904, p 1-32
https://x.com/Lost_History1/status/1191114056800727040
2. Sushil Bhati, Huna origin of Gurjara clans,
https://janitihas.blogspot.com/2015/01/huna-origin-of-gurjara-clans.html
3. Sushil
Bhati, Khaps of Haryana
https://janitihas.blogspot.com/2017/04/khaps-of-haryana.html
4. सुशील भाटी, भडाना देश एवं वंश,
https://janitihas.blogspot.com/2013/02/bhadana-desh.html
5.
तंवरो के भाट की विडियो रिकॉर्डिंग https://www.facebook.com/reel/3280577605452033
6. दिल्ली के राजा संस्थापक अनंगपाल तंवर गुर्जर का इतिहास
https://www.facebook.com/watch/?v=2869513073288299
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