1857 के
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राव तुला राम की भूमिका और योगदान
डॉ.सुशील भाटी
सन 1857 का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ पहला बड़ा संगठित विद्रोह था। इस महासंग्राम में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से कई वीर नायकों ने जन्म लिया, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन्हीं नायकों में से एक प्रमुख नाम अहीरवाल (वर्तमान हरियाणा का दक्षिणी भाग) के शासक राव तुला राम का है। राव तुला राम ने न केवल रेवाड़ी और उसके आसपास के क्षेत्रों में विद्रोह का सफल नेतृत्व किया, बल्कि गुरिल्ला युद्ध रणनीति और कूटनीति के बल पर ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ा दिए। उनका जीवन और संघर्ष भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है।
राव तुला राम का जन्म 9 दिसंबर 1825 को हरियाणा के रेवाड़ी जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम रामपुरा के एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक राव (अहीर) परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम राव पूरन सिंह तथा माता का नाम रानी ज्ञान कंवर था। तत्कालीन परंपराओं के अनुसार, उन्होंने फारसी, उर्दू, हिंदी और प्रारंभिक अंग्रेजी भाषा की शिक्षा प्राप्त की। नवंबर 1839 में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात, मात्र 14 वर्ष की अल्पायु में राव तुला राम ने रामपुरा-रेवाड़ी की गद्दी संभाली।
राव परिवार का इतिहास देशभक्ति से
प्रेरित था। सन 1803 में द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के
दौरान राव तुला राम के पूर्वजों ने अंग्रेजों के खिलाफ मराठों की सहायता की थी।
परिणामतः, अंग्रेजों ने प्रतिशोध स्वरूप उनकी
पैतृक जागीर और भूमि को जब्त कर लिया और बदले में केवल 58 गांवों की एक सीमित 'इस्तमरारी'
दी। इस
दमनकारी नीति के कारण राव परिवार और उनके समर्थक अंग्रेजों से अत्यधिक असंतुष्ट थे
और ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मई 1857 में जैसे ही मेरठ और दिल्ली में विद्रोह की खबर फैली, रेवाड़ी की जनता भी उठ खड़ी हुई। 17 मई 1857 को राव
तुला राम ने अपने चचेरे भाई गोपाल देव और लगभग 400-500 अनुयायियों के साथ रेवाड़ी तहसील और सरकारी भवनों पर नियंत्रण कर
लिया।
उन्होंने रेवाड़ी के पास स्थित अपने
छोटे से किलेबंद गांव रामपुरा को अपना मुख्यालय बनाया। राव तुला राम स्वयं राजा
बने और राव गोपाल देव को सेनापति नियुक्त किया। उन्होंने तुरंत प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित कर
राजस्व और कर एकत्र करना शुरू किया ताकि व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके।
रामपुरा के किले में उन्होंने एक
विशाल कार्यशाला स्थापित की। यहाँ स्वदेशी तकनीक से बंदूकें, तोपगाड़ियाँ और बारूद का बड़े पैमाने पर निर्माण
किया गया। उन्होंने लगभग 5,000 सैनिकों
की एक मजबूत सेना तैयार की। इस दौरान जब ब्रिटिश सेना ने दिल्ली को घेर रखा था,
तब राव तुला राम ने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह
जफर को धन, रसद और सैनिक भेजकर क्रांतिकारी
ताकतों को मजबूत किया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्होंने लगभग 45,000 रुपये तथा हजारों बोरी गेहूँ विद्रोही सेना को
भेजा।
20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों द्वारा दिल्ली पर पुनः कब्जा करने के बाद, ब्रिगेडियर-जनरल शॉवर्स (Showers) के नेतृत्व में एक विशाल ब्रिटिश सेना को राव
तुला राम को कुचलने के लिए रेवाड़ी भेजा गया। रणनीतिक समझ के तहत, राव तुला राम रामपुरा का किला खाली कर सुरक्षित
स्थान पर चले गए ताकि खुली जंग में अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी जा सके।
16 नवंबर 1857 को नारनौल के पास नसीबपुर के
मैदान में दोनों सेनाओं के बीच एक अत्यंत भीषण और निर्णायक युद्ध हुआ। राव तुला
राम के सैनिकों ने ऐसा जोरदार और अदम्य आक्रमण किया कि ब्रिटिश सेना की अग्रिम
पंक्तियाँ (पटियाला इन्फैंट्री और मुल्तानी हॉर्स) बिखर गईं। युद्ध के दौरान
ब्रिटिश कर्नल जेरार्ड (Gerrads) क्रांतिकारियों
की मस्कट की गोली से मारे गए, जिससे
ब्रिटिश खेमे में हड़कंप मच गया। हालांकि, अंततः
आधुनिक हथियारों, भारी तोपखाने और कारबाईनर्स के कारण
क्रांतिकारी ताकतों की कमर टूट गई। राव तुला राम की पराजय हुई, परंतु वे अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और सुरक्षित
निकलने में सफल रहे। इस युद्ध में संभवतः राव तुलाराम के भाई जोकि 1857 में मेरठ
शहर कोतवाली में कोतवाल रहे थे शहीद हो गए| जिला
मेरठ के म्युटिनी नैरेटिव के अनुसार मेरठ शहर के कोतवाल बिशन सिंह रेवाड़ी के
क्रान्तिकारी नेता राजा तुलाराव का भाई थे| परन्तु
वह क्रान्ति के प्रभाव में आ चुके थे। उन्होंने
मेरठ में क्रांतिकारी ग्राम गगोल पर अंग्रेजो के होने वाले हमले की खबर वहां
पहुँचा दी| राव बिशन सिंह को अंग्रेजी सेना को गाईड का काम करना था, वे जानबूझ कर
अंग्रेजी सेना के पास देर से पहुँचे। इसका नतीजा भारतीयों के हक में रहा, जब यह सेना गगोल पहुँची तो सभी ग्रामीण वहाँ से
भाग चुके थे। अंग्रेजो ने पूरे गाँव को आग लगा दी। बिशन सिंह भी सजा से बचने के
लिए नारनौल, हरियाणा भाग गए जहाँ वे अग्रेजों से
लड़ते हुए शहीद हो गए।
नसीबपुर की पराजय के बाद भी राव तुला
राम ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक वर्ष तक तात्या टोपे की सेना के साथ मिलकर काम
किया। नवंबर 1858 में जब ब्रिटिश महारानी ने बिना शर्त
माफी की घोषणा की, तो उसमें उन लोगों को शामिल नहीं
किया गया जिन पर ब्रिटिश सैनिकों की हत्या का आरोप था। राव तुला राम जानते थे कि
अंग्रेज उन्हें कभी जीवित नहीं छोड़ेंगे।
अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा
अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने के उद्देश्य से वे 1862 में भारत छोड़कर ईरान पहुंचे। ईरान के बाद वे अफगानिस्तान की राजधानी
काबुल गए, जहाँ उन्होंने अमीर दोस्त मोहम्मद
खान और रूस के जार से सैन्य सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। लगातार यात्राओं,
कठिन परिस्थितियों और मानसिक तनाव के कारण काबुल
में उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। मात्र 38 वर्ष
की आयु में, 23 सितंबर 1863 (कुछ स्रोतों में शीतकाल 1862 का
उल्लेख है) को पेचिश के कारण काबुल में इस महान स्वतंत्रता सेनानी का निधन हो गया।
आज भी राव तुला राम को को एक वीर और
शहीद के रूप में याद किया जाता हैं|उनकी
शहादत की याद में प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को संपूर्ण हरियाणा में 'वीर एवं शहीदी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। भारत की राजधानी नई दिल्ली में
अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास एक प्रमुख मार्ग का नाम उनके सम्मान में 'राव तुला राम मार्ग' रखा गया है। भारत सरकार द्वारा उनकी स्मृति में विशेष डाक टिकट भी जारी किया गया
है।
राव तुला राम केवल एक क्षेत्रीय
जमींदार या राजा नहीं थे, बल्कि
वे एक दूरदर्शी राष्ट्रभक्त, कुशल
सैन्य रणनीतिकार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ थे। उन्होंने जाति और संप्रदाय से
ऊपर उठकर सभी को एकजुट किया और स्वदेशी संसाधनों के बल पर साम्राज्यवादी ब्रिटिश
सेना को चुनौती दी। मातृभूमि को स्वतंत्र कराने का उनका सपना भले ही उनके जीवनकाल
में पूरा न हो सका, लेकिन उनकी शहादत ने आने वाली
पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता की मशाल को प्रज्वलित रखा।
संदर्भ
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