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Monday, March 31, 2025

अमर शहीद राजा फतुआ गूजर

डॉ. सुशील भाटी 

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ भारतीय सैनिकों और आम जनता का एक बड़ा विद्रोह था। यह विद्रोह उत्तर भारत में मुख्य रूप से मेरठ, बुलंदशहर, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी आदि स्थानों पर केंद्रित था, किन्तु सहारनपुर क्षेत्र में भी इसका व्यापक प्रभाव हुआ। 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सैनिको के अतिरिक्त धन सिंह कोतवाल के नेतृत्त्व में वहाँ की पुलिस, सदर बाज़ार की भीड़ और आस-पास के हजारो गूजरों ने स्वतंत्रता संग्राम का विस्फोट कर दिया| जैसे ही यह खबर सहारनपुर पहुँची वहाँ के गूजरों ने बुड्ढा खेडा गाँव के फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह कर दिया|

सहारनपुर का गंगोह क्षेत्र इस विद्रोह का एक बड़ा केंद्र था| गंगोह क्षेत्र में गूजरों के बटार गोत की बाहुल्यता हैं| इस क्षेत्र में बटार गूजरों के 52 गाँव हैं, जोकि “बटारो की बावनी” के नाम से मशहूर हैं| बटारो के अधिकांश गाँव नकुड और गंगोह के बीच स्थित हैं| दूधला गाँव इस क्षेत्र में बटारो का मूल गाँव माना जाता हैं, कहते हैं कि इनके पूर्वज मुल्तान से आकर सबसे पहले दूधला गाँव में बसे थे, जहाँ से वो 52 गाँवों में फ़ैल गए| एक अनुमान के अनुसार 52 गाँवो में से 23 गाँव में मुस्लिम तथा शेष 29 गाँव में हिन्दू गूजर निवास करते हैं| गंगोह से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित मुस्लिम गूजरों का बुड्ढा खेडा गाँव हैं जहाँ बटारो की बावनी की चौधर थी| इस गाँव के मुस्लिम गूजर राव फतुआ गूजर “बटारों की बावनी” के चौधरी थे|  राव फतुआ गूजर मिटटी के किले के अन्दर लखोरी ईंटो से बने महल में रहते थे, उनके पास कई हज़ार बीघा जमीन की मिल्कियत थी|  हिन्दू-मुस्लिम गूजर समान रूप से उन्हें अपना सरदार अथवा चौधरी मानते थे| 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में राव फतुआ गूजर ने सहारनपुर क्षेत्र में हिन्दुस्तानियों का नेतृत्त्व किया| सहारनपुर क्षेत्र के गूजरों के अतिरिक्त कुंडा कलां, उमरपुर, मानपुर आदि गाँवो के मुस्लिम राजपूत, जिन्हें रांघड कहा जाता हैं, ने भी राव फतुआ गूजर का साथ दिया था|

सहारनपुर में इस विद्रोह के पीछे जनपद के गूजरों के राजनैतिक उद्देश्य भी थे| जिन्हें समझने के लिए हम सहारनपुर जिले के गूजरों की सामाजिक-राजनैतिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक हैं| नेविल द्वारा लिखित सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर के अनुसार पहले सहारनपुर जिले एक बड़े भाग को गुजरात कहा जाता था| वह कहता कि जिले के तीन भाग माने जाते हैं, इनमे से केन्द्रीय भाग, जिसमे गंगोह, रामपुर और नकुड क्षेत्र आते हैं, के अतिरिक्त मुज़फ्फरनगर का लगा हुआ क्षेत्र गुजरात कहलाता था| एरिक स्टोक्स पीजेंट आर्म्ड पुस्तक में बताते हैं कि इस गुजरात में मुज़फ्फरनगर जिले के कैराना और झिंझाना परगना भी सम्मिलित थे| इस प्रकार गंगोह के चारो तरफ विस्तृत बटार गूजरों की बावनी गुजरात का हिस्सा थी| इस बावनी के अतिरिक्त उक्त गुजरात में खूबड़ पंवार गूजरों की चौरासी, राठी गूजरों का बारहा, छोक्कर गोत के गूजरों का बारहा, तंवर गूजरों का बारहा, धूलि गोत के गूजरों का बारहा, कैराना के कल्सियान चौहान गूजरों की चौरासी जैसी मज़बूत खाप थी| सहारनपुर जिले में गूजर सबसे बड़े भूमिपति थे| तत्कालीन सहारनपुर जनपद में स्थित लंढोरा रियासत के राजा भी गूजर थे| लंढोरा रियासत में करीब आठ सौ गाँव थे, जोकि जवालापुर, निकट हरिद्वार से लेकर बहसूमा तक फैले हुए थे| अतः अठारवी शताब्दी में सहारनपुर जनपद में गूजर सामाजिक और राजनैतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली जाति थी| किन्तु 1813 में लंढोरा के राजा रामदयाल गूजर का निधन होने के बाद अंग्रेजो ने रियासत को कई ताल्लुको में बाँट दिया, और रियासत का बड़ा भाग अपने पास रख लिया| इस वज़ह से गूजरों में एक भारी राजनैतिक असंतोष था| इसी कारण से 1824 में भी ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध गूजर विद्रोह हो चुका था, जिसका नेतृत्व कलुआ गूजर और कुंजा बहादुरपुर के ताल्लुकेदार विजय सिंह गूजर ने किया था| गुजरात (सहारनपुर) के गूजर ब्रिटिश शासन को उखाड़ कर पुनः अपना गूजर राज़ स्थापित करना चाहते थे| फतुआ गूजर ने क्षेत्रीय गूजरों की भावनाओ के अनुरूप अंग्रेजो को अपने पूर्वजों के क्षेत्र गुजरात से बाहर निकालने का आव्हान किया| उसके आव्हान पर पूरे जिले के गूजर इस स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े| मुस्लिम राजपूत रांघडो ने भी उनका साथ दिया|

सहारनपुर गज़ेटियर के अनुसार 12 मई 1857 को मेरठ में सैनिक और आम जनता के विद्रोह की खबर सहारनपुर पहुँच गई| उस समय आर. स्पेंकी जिले में मजिस्ट्रेट और एच. डी. रोबर्टसन जॉइंट मजिस्ट्रेट थे| जिले के गूजरों और रांघडो ने अपनी विद्रोही गतिविधियाँ आरम्भ कर दी| 21 मई को सहारनपुर के निकट उन्होंने मुल्लीपुर गाँव को लूट लिया| गूजर और रांघड किसान अंग्रेजो की राज़स्व नीति से भी असंतुष्ट थे| लगान बहुत अधिक था, और लगान चुकाने के लिए साहुकारो से भारी सूद पर ऋण लेना पड़ रहा था| उनकी ज़मीने नीलाम हो रही थी| साहुकारो को अंग्रेजी प्रशासन तहसील-थानों का संरक्षण प्राप्त था| अतः जैसे ही मेरठ में सैनिक और आम जनता के विद्रोह की खबर सहारनपुर पहुंची, गूजर और रांघडो ने साहुकारो और बैंकरो को लूटना आरम्भ कर दिया और ब्रिटिश राज के दमन के प्रतीक तहसील, थानों, और जेलों को निशाना बनाने की योज़ना बनाने लगे| 27 मई को जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन ने क्रांतिकारी गूजरों के बाबूपुर, फतेहपुर, सांपला बकल आदि गाँवो पर हमला किया| लगभग 400 विद्रोहियों ने जमकर अंग्रेजो का मुकाबला किया| सैकड़ो विद्रोही मारे गए| अंग्रेजो की जीत हुई विद्रोही गाँवो का जला दिया गया| 30 मई को मजिस्ट्रेट स्पेंकी मंगलौर पहुँच गया जहाँ जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन भी अपनी सेना लेकर पहुँच गया| मंगलौर को आधार बनाकर उन्होंने मानिकपुर आदमपुर गाँव पर हमला किया| इस गाँव के उमराव सिंह गूजर ने अपने आप को राजा घोषित कर आस-पास के क्षेत्रो से लगान वसूलना आरम्भ कर दिया था| अंग्रेज उमराव सिंह को पकड़ने में नाकामयाब रहें, और उन्होंने गाँव को आग में जलाकर खाक कर दिया| 

उमराव सिंह के बलिदान के बाद जिले के क्रांतिकारियों का नेतृत्त्व पूरी तरह से फतुआ गूजर के हाथो में आ गया| फतुआ गूजर की पुकार पर बटारो की बावनी सहित सम्पूर्ण गुजरात अंग्रेजो के विरुद्ध एकजुट हो गया| फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में लगभग 3000 हिन्दू-मुस्लिम गूजरों और रांघडो ने गंगोह में ब्रिटिश पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया, और पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया| उसके बाद राजा फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में स्वतंत्रता सेनानियों ने गंगोह से नकुड की तरफ कूच कर दिया| संढोली गाँव के चौधरी फ़तेह सिंह भी अन्य विद्रोहियों के साथ नकुड पहुँच गएँ| इनके अतिरिक्त टाबर गाँव के बख्शी राजपूत भी अपने साथियों के साथ फतुआ गूजर के समर्थन में नकुड पहुँच गए| फतुआ गूजर की अगुआई में स्वतंत्रता सेनानियों ने नकुड तहसील और पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया| सभी राज़स्व सम्बंधी दस्तावेज़ और महाजनों के खाते जला कर ख़ाक कर दिए गए| अंग्रेज परस्त साहुकारो को भी नहीं बख्शा गया| उनकी हवालियो और घरो पर भी हमला बोल सभी प्रकार के बही खाते जला दिए गए| नकुड के बाद सरसावा का भी यही हश्र हुआ| इब्राहिमी गाँव के आलियाँ खटाना भी फतुआ गूजर के प्रमुख सहयोगी थे| सरसावा की क्रांतिकारी घटनाओ में चौधरी आलियाँ खटाना की विशेष भूमिका थी|

20 जून को नकुड के घटानक्रम की जानकारी होने पर जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन तुरंत वहाँ पहुँच गया| उसका साथ 30 गोरखा और 40 पटियाला घुडसवार थे| उसने देखा की विद्रोही जा चुके थे, और तहसील और पुलिस थाने से आग की लपते उठ रही थी| अंग्रेजी प्रशासन के अनुसार मुसलमानों के घरो को छोड़ कर पूरे नकुड कस्बे को लूट लिया गया था| 

क्षेत्र की जनता ने पंचायत कर फतुआ गूजर को राजा घोषित कर दिया| फतुआ गूजर का राजा घोषित किया जाना ब्रिटिशराज को खुली चुनौती थी| ब्रिटिश प्रशासन इन घटनाओ से बहुत चिंतित हो गया| उसने फतुआ गूजर के जिन्दा या मुर्दा पकडवाने पर 200 रूपए का इनाम घोषित कर दिया, जोकि उस ज़माने में एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी|

अंग्रेजी प्रशासन ने प्रतिक्रिया और बदले की कार्यवाही आरम्भ कर दी| सबसे पहले फतेहपुर गाँव पर रोबर्टसन ने उपरोक्त वर्णित अपनी सेना लेकर आक्रमण किया| आस-पास के सभी गाँव फतेहपुर की रक्षा के लिए एकत्रित होकर वहाँ पहुँच गये| रोबर्टसन को पीछे हटना पड़ा| दो दिन बाद 22 जून को बोईसरगोन अपनी गोरखा सेना के साथ वहाँ पहुँच गया| स्वतंत्रता सेनानियों और अंग्रेजो की सयुक्त सेना के बीच जमकर युद्ध हुआ| जिसमे भारतीय भारी मात्रा में शहीद हुए| विजेता अंग्रेज सेना ने फतेहपुर और आस-पास के चार गाँवो में आग लगा उन्हें नष्ट कर दिया| 23 जून को संढौली और रणदेवा आदि क्रांतिकारी  गाँवों को अंग्रेजो ने रोबर्टसन के नेतृत्त्व में आग लगा दी| ब्रिटिश विरोधी इस संघर्ष में अम्बेहटा के आस-पास के घाटमपुर आदि गाँव भी सक्रिय थे, कितु उसके बाद जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन ने उन्हें छोड़ सेना के साथ गंगोह की तरफ रुख किया और गूजरों के मुख्यालय, राजा फतुआ गूजर के गाँव बुड्ढा खेडा पर हमला कर दिया| फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में भारतीयों ने मिटटी के किले में मोर्चा लिया| गूजर, रांघड आदि बहादुरी से लडे किन्तु अंग्रेजो ने हाथी की सहायता से किले का दरवाज़ा तोड़ दिया| अंग्रेजी सेना के आधुनिक हथियारों के समक्ष समक्ष भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को हार का सामना करना पड़ा| अनेक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी शहीद हो गए| राजा फतुआ गूजर अपने कुछ साथियों के साथ वहाँ से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहें| अंग्रेजो ने गुस्से में राजा फतुआ गूजर के किले को गिरा दिया, उनके महल को भी तोड़ -फोड़ दिया|

फतुआ गूजर अपने बचे हुए साथियों के साथ यमुना खादर के जंगलो में चले गए| रोबर्टसन ने उन्हें   घेरने का प्रयास किया| इस उपक्रम में बोईसरगोन ने एक सेना के साथ 26 जून को रांघडो के उमरपुर और मानपुर गाँवो पर आक्रमण किए, जहाँ भारतीयों की भारी शाहदत के बाद अंग्रेज विजयी हुए| कुंडा कलां गाँव के रांघड फतुआ गूजर के विशेष समर्थक थे अतः अंग्रेजो ने इस गाँव पर भी हमला किया, जहाँ भारी रक्त-पात हुआ और भारतीय का भारी बलिदान हुआ| 

उसके पश्चात् सभवतः 27 जून को गंगोह के समीप राजा फतुआ गूजर और अंग्रेजो के बीच निर्णायक युद्ध हुआ| भारतीय बहादुरी से लड़ें किन्तु पराजित हुए, इस युद्ध में हजारो की तादात में स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए, कहते हैं कि भूमि पर शहीदों का इतना रक्त गिरा कि वहाँ की भूमि सुर्ख (लाल) हो गई| आज भी यह स्थान बलिदान स्थल सुर्खेवाला कहलाता हैं|

अंग्रेज अधिकारियो और कुछ यूरोपीय इतिहासकारों के अनुसार के सहारनपुर में विद्रोह का मुख्य कारण नकुड और उसके आस-पास के कट्टर मुसलमान थे, जिन्होंने असंतुष्ट हिन्दुओ को विशेषकर गूजरों को ब्रिटिश शासन के प्रति भड़का दिया था|किन्तु जिस प्रकार फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में क्रांतिकारी भीड़ ने नकुड तहसील के राजस्व रिकार्ड्स और साहुकारो की हवेलियों और बहीखातो को अपना निशाना बनाया उससे साफ़ पता चलता हैं कि आम व्यक्ति और किसान अंग्रेजी की भू-राज़स्व व्यवस्था से नाराज़ था| आम व्यक्ति की नज़र में लगान बहुत अधिक था, जिसे चुकाने के लिए वह साहुकारो के ऋण जाल में जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था| फतुआ गूजर के वर्तमान पारावारिक वंशज चौधरी ताहिर गूजर बताते हैं कि स्वयं बाबा फतुआ गूजर पर भारी मात्रा में राज़स्व बकाया था, जिस कारण से उन्हें अंग्रेजी प्रशासन ने प्रताड़ित किया था| यह भी सच हैं कि अठारवी शताब्दी में सहारनपुर का एक बड़ा हिस्सा गूजर जाति की बाहुल्यता और सामाजिक राजनैतिक वर्चस्व के कारण गुजरात कहलाता था| अतः फतुआ गूजर के लिए गुजरात (सहारनपुर) उसके पूर्वजों का पारंपरिक क्षेत्र था, जहाँ से वह अंग्रेजो को बाहर निकलकर पुनः गूजर राज की स्थापना करना चाहता थे| अंग्रेजो ने सहारनपुर में लड़ें गए इस स्वतंत्रता संग्राम को गूजरों और सहयोगी जातियों की लूटमार कहकर खारिज करने की बेशर्म कोशिश भी की हैं| परन्तु कई हजारो की तादात में गूजर और सहयोगी जातियो के लोगो का एकत्रित होकर ब्रिटिश राज़ के प्रतीक चिन्ह तहसील थानों को नष्ट कर आग लगा देने को लूटमार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता हैं, निश्चित ही यह संघर्ष एक स्वतंत्रता संग्राम था| 

1857 की इस जनक्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कीमत राजा फतुआ गूजर के गाँव वासियों को भी चुकानी पड़ी| ग्रामवासियों के अनुसार राज़स्व रिकॉर्ड में बुड्ढा खेडा गाँव कच्चा घोषित कर दिया गया और वहाँ के निवासियों की सभी जमीन-जायदाद जब्त कर ली गई| ईस्ट इंडिया कंपनी के दमन से बचने के लिए बुड्ढा खेडा गाँव के कुछ वाशिंदे भिस्सल हेडा गाँव में भी जाकर बस गए| राजा फतुआ गूजर और उनके गाँव बुड्ढा खेडा के बलिदान के बाद बटार गूजरों की चौधर भी वहाँ से चली गई| आज बटार गूजरों की बावनी के चौधरी शेरमऊ गाँव में रहते हैं|

आज़ादी के बाद राजा फतुआ गूजर को इतिहास लेखन में वह महत्वपूर्ण स्थान नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे| लेकिन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। उन्होंने सहारनपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध खड़ा किया| उनका नाम स्थानीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया था| आगामी पीढियां के लिए वो एक प्रेरणा का स्रोत बन गए| उनका विद्रोह भारतीय जनता की आज़ादी की आकांक्षाओं का प्रतीक था। उनके ब्रिटिश विरोधी संघर्ष की लोक स्मृति ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना को जीवित रखा।

राजा फतुआ गूजर के किले/महल की दीवार के अवशेष 

1980 के दशक तक राजा फतुआ के महल के अवशेष काफी अच्छी अवस्था में देखे जा सकते थे| किन्तु किसी संरक्षण के आभाव में वर्तमान में वहाँ महल की सिर्फ एक दीवार शेष रह गई हैं| वर्तमान में चौधरी ताहिर गूजर अपने परिवार के साथ उस स्थान पर रहते हैं, जहाँ फतुआ गूजर का महल था| चौधरी ताहिर गूजर ने अपने घर के निर्माण लिए महल की इस अवशेष दीवार को प्रयोग में ले रखा हैं| वो स्वयं को राजा फतुआ गूजर का वंशज बताते हैं| क्षेत्रीय लोगो के अनुसार भी वे राजा फतुआ गूजर के भाई के वंशज हैं|

आम समाज और आज़ाद देश की सरकारों द्वारा राजा फतुआ गूजर के बलिदान को भुला दिया गया| उनके वंशज भी आज गरीबी का जीवन जीने को मजबूर हैं| कुछ वर्षो से कुछ समाजसेवियों ने इस तरफ थोडा ध्यान दिया हैं| क्षेत्र के एक युवा मुस्तकीम चौधरी राजा फतुआ गूजर के नाम से गंगोह में “हेरोज़ मेमोरियल हाई स्कूल” में कोचिंग सेंटर चलाते हैं| कुछ वर्षो से क्षेत्र के समाजसेवी फतुआ गूजर के बलिदान की याद में कार्यक्रम भी करते हैं, परन्तु प्रदेश सरकारो ने अभी तक इस शहीद को सम्मान देने की तरफ ध्यान नहीं दिया| उनके नाम पर किसी चौक-चौराहे, सड़क, स्कूल, महाविद्यालय, संसथान आदि का नामकरण, किसी स्मारक का निर्माण, उनके गाँव को शहीद गाँव का दर्ज़ा और उनके परिवार को आर्थिक सहायता समय की मांग हैं|

सन्दर्भ-

1. H. R. Nevill, Saharanpur: A Gazetteer, Allahabad, 1909, p 101

2. Dangli Prasad Varun, Uttar Pradesh District Gazetteer: Saharanpur, Lucknow, 1981, p 64

3. Eric Stroke, Peasant Armed, Oxford, 1986, p 199, 207

4. Ranajit Guha, Elementary Aspects of Peasant Insurgency in Colonial India, p 313, 318, 321

5. सुशील भाटी, 1857 की जनक्रांति के जनक धन सिंह कोतवाल, दी जर्नल ऑफ़ मेरठ यूनिवर्सिटी हिस्ट्री एलुमनाई, खण्ड XII, 2008, पृष्ठ 62-66

6. सुशील भाटी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत राजा विजय सिंह- कल्याण सिंह, प्रकाशक- अशोक चौधरी, मेरठ, 2002

7. R C Majumdar, History of Freedom Movement in India, Vol. 1, Firma K. L. Mukhopadhyay, 1971, p 155

8. R C Majumdar, The History and Culture of the Indian People: British paramountcy and Indian renaissance, pt. 1, G. Allen & Unwin, 1951, p 503

9. R C Majumdar, The Sepoy Mutiny and the Revolt of 1857, Firma K. L. Mukhopadhyay, 1963, p 106 

10. S B Chaudhari, Civil Rebellion in Indian Mutinies, 1857-1859, 1957, p 77, 287

11. Denzil Ibbetson, Tribes and castes of Panjab, Lahore, 1916

12. Biswamoy Pati, The 1857 Rebellion, Oxford University Press, 2007, p 90

13. श्री मुस्तकीम चौधरी, निवासी गुज्जरवाडा, गंगोह का साक्षात्कार एवं दूरभाषवार्ता|

14. चौधरी बलबीर सिंह तोमर, निवासी डूभर किशनपुर, सहारनपुर से दूरभाषवार्ता साक्षात्कार |

15.  चौधरी मुस्लिम चौहान, निवासी ग्राम गढ़ी भरल, ब्लाक घरोंडा, जिला करनाल से दूरभाषवार्ता साक्षात्कार|

राजा फतुआ गूजर के वर्तमान वंशज चौधरी ताहिर गूजर के साथ डॉ. सुशील भाटी 


Wednesday, May 22, 2024

दिल्ली की 9 गर्दी

डॉ सुशील भाटी

1707 में बादशाह औरंगजेब के मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य का पतन बहुत तेज़ी के साथ हुआ| 1739 में ईरान के शासक नादिर शाह के आक्रमण के समक्ष मुग़ल शक्ति बिखर कर रह गई| पूरी दुनिया में मुग़ल साम्राज्य का खोखलापन उजागर हो गया| दक्कन में मराठा शक्तिशाली हो गए थे| दिल्ली के निकट जाट, गूजर और रोहिल्ला पठानो की शक्ति पनपने लगी थी| मुग़ल दरबारी और तुर्क सैनिक भी बादशाह को आँख दिखाने लगे| 1739 से 1761 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी दिल्ली 9 गर्दियो का शिकार बनी| 9 गर्दियो का तात्पर्य 9 लूटमार के सिलसिलो से हैं, जोकि  9 भिन्न शासको अथवा जाति समूहों के द्वारा संचालित किए गए| नादिर शाह ने दो बार, अहमद शाह अब्दाली ने चार बार, भरतपुर के जाट राजा सूरज मल ने एक बार, मेरठ क्षेत्र के राव जीत सिंह गूजर ने एक बार,  रोहतक के बहादुर खान बलूच ने एक बार, रोहिल्ला सरदार नजीब खान ने आठ बार, मराठो ने आठ बार, खुद मुग़ल अधिकारियो और शाही सेना के तुर्क सैनिको ने भी दिल्ली को लूटा| दिल्ली के ऊपर बीती प्रमुख गर्दियाँ निम्नवत हैं-

1. नादिर गर्दी- ईरान के शासक नादिर शाह ने मार्च 1739 में दिल्ली पर आक्रमण किया और मार्च से मई 1739 तक दिल्ली को जमकर लूटा| करनाल युद्ध के बाद नादिर शाह 50 लाख रूपए लेकर वापस अपने देश जाने को तैयार हो गया था, किन्तु अवध का नवाब सादात खान उससे मिलने पहुँच गया और उसने उसे दिल्ली चलने और लूटने के लिए यह कहकर उकसाया कि वहाँ से उसे 50 करोड़ रूपए का धन प्राप्त होगा| 7 मार्च को नादिर शाह दिल्ली पहुँच गया| नादिर शाह ने 11 मई 1739 में दिल्ली में कत्लेआम कराया था, जिसमे बीस हज़ार से अधिक लोग एक दिन में क़त्ल किए गए थे|  एक अनुमान के अनुसार वह दिल्ली से 70-80 करोड़ रूपये कीमत की सोना चांदी धन संपत्ति को लूटकर अपने देश ले गया, जिसमे मुगलों का मयूर सिंघासन और कोहिनूर हीरा भी शामिल थे|

2. शाह गर्दी- अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह अब्दाली ने जनवरी 1757 से 1761 तक भारत पर कई बार आक्रमण किए और 4 बार दिल्ली को लूटा| रोहिल्ला सरदार नजीब खान उर्फ़ नाजीबुदौल्लाह अहमद शाह अब्दाली का समर्थक था| दिल्ली और दिल्ली में मुग़ल दरबार की राजनीति पर पर नियंत्रण साधने के लिए नजीबुदौल्लाह ने अहमद शाह अब्दाली से मदद की गुहार की थी| दक्कन के मराठे, भरतपुर के जाट, सभी दिल्ली को नियंत्रित करना चाहते थे| नजीबुदौल्लाह दिल्ली के पूर्व में स्थित ऊपरी दोआब  और गंगा पार रूहेलखंड में सक्रिय था| वह गंगा पार का रोहिल्ला पठान था, उसका लक्ष्य दिल्ली था, इसलिए वह जाटो और मराठो के साथ संघर्ष में आ गया था| उनसे अपना हिसाब-किताब चुकता करने के लिए उसने अपने स्वदेश अफगानिस्तान से सजातीय पठान शासक अहमद शाह अब्दाली को आमंत्रित किया था| 

3. जाट गर्दी- मुग़ल बादशाह अहमद शाह और उसके वजीर सफ़दर जंग के बीच मार्च -नवम्बर 1739 में गृह युद्ध चला| मराठो और रोहिल्लो ने बादशाह का पक्ष लिया, वही भरतपुर के जाटो ने सफदरजंग का साथ दिया| सफदरजंग के उकसावे पर 9 मई 1753 को भरतपुर के राजा सूरजमल के नेतृत्त्व में जाटो ने पुरानी दिल्ली पर हमला लूट लिया| लूटमार का यह सिलसिला 4 जून 1753 तक चला|

4. गूजर गर्दी- गृह युद्ध के दौरान मीर बख्शी ईमाद उल मुल्क ने सेना की भर्ती की| ईमाद उल मुल्क के आमन्त्रण पर जब नजीब दिल्ली कूच कर रहा था रास्ते में मीरापुर के निकट स्थित कतेव्रह (Katewrah) के नवाब फतेहुल्लाह खान ने नजीब खान से परीक्षतगढ़ के राव जीत सिंह गूजर की दोस्ती करा दी थी| अतः जीत सिंह भी 2 जून 1754 को नजीब खान के साथ 2000 गूजर सैनिको की रेजिमेंट लेकर दिल्ली आ गया| नजीब खान ने जीत सिंह गूजर को मीर बख्शी ईमाद उल मुल्क से मिलवाया| इन सैनिको को दिल्ली में सफ़दर जंग और उसके समर्थको के विरुद्ध तैनात किया| इस कार्यवाही में सफदरजंग के समर्थको के घरो को भी नहीं बख्शा गया और उन्हें जमकर लूटा गया| अगस्त-सितम्बर के माह में सैनिको को तनख्वाह नहीं मिली तब गूजर और रोहिल्ला सैनिको ने दिल्ली को लूट लिया|

5. बलूच गर्दी- अगस्त-सितम्बर के माह में सैनिको को तनख्वाह नहीं मिली तब बहादुर खान बलूच के सैनिको ने दिल्ली में लूटमार कर दी|

6. रोहिल्ला गर्दी- सितम्बर 1753 में नजीब खान के सैनिको के वेतन आदि के 25 लाख रूपए मुग़ल दरबार पर बकाया थे| उसे केवल 4 लाख रूपए का भुगतान किया गया| उसे 15 लाख रूपए का राज़स्व गंगा दोआब में आवंटित कर दिया गया| इस सब के बावजूद 26 नवम्बर 1753 को दिल्ली से लोटते हुए नजीब और उसके सैनिको ने पटपडगंज और शाहदरा को लूट लिया| 11 अगस्त 1757 को नजीब और उसके लोगो ने वजीर ईमाद उल मुल्क के घर को लूटा| नजीब के 20-25 हज़ार सैनिको ने अफ़ग़ान शासक अहमद शाह अब्दाली की सेना के साथ मिलकर दिल्ली को लूटा|

7. मराठा गर्दी- पेशवा बाजीराव ने अप्रैल 1737 में अचानक से दिल्ली में प्रकट हो हमला बोल दिया| मराठा सेनापति खांडेराव नवम्बर- दिसम्बर 1753, रघुनाथ राव जून- दिसम्बर 1754, अंताजी जनवरी 1757 से जनवरी 1758 तक किसी ना किसी कारण से दिल्ली में रहें और उन्होंने दिल्ली को लूटा| कुल मिलाकर मराठो ने दिल्ली को आठ बार लूटा|  

8. मुग़ल गर्दी- मुग़ल वजीर इमाद उल मुल्क ने सैनिक मदद के बदले मराठो को 40 लाख रूपए देने का वादा किया था, शाही खजाने में धन नहीं होने के कारण उसने जून-अक्टूबर 1754 में स्वयं दिल्ली की जनता पर ज़बरदस्ती अतिरिक्त कर आदि लगा कर लूटा|

9. तुर्क गर्दी- तुर्क गर्दी का काल मार्च-जून 1754 तक रहा| तुर्क सैनिको के सिन-दाघ रिसाले को एक साल से वेतन नहीं मिला था, अतः मार्च 1754 में उन्होंने दिल्ली के सुनारों को लूट लिया| इसी प्रकार की लूट की कार्यवाही जून 1754 तक चलती रही|

सही कहा जाता हैं कि वक्त सबसे बलवान होता हैं| कभी मौहम्मद तुग़लक, अलाउद्दीन खिलजी, शाहजहाँ और औरंगजेब जैसे बलशाली और प्रचण्ड तुर्क-मुग़ल शासको की राजधानी रही दिल्ली 1739 से लेकर 1761 तक, 22 साल की अवधि में, अनेक बार लूटी गई| दिल्ली की 9 गर्दियों की कहानी वास्तव में मुगलिया दिल्ली के बेआबरू होने की कहानी हैं| 

 

सन्दर्भ

1.Hari Ram Gupta, Marathas and Panipat, Panjab University, 1961

2. Edwin T Atkinson, Statistical Descriptive and Historical Account of the North-Western Provinces of India, Vol II, Part 1, Allahabad, 1875

3. H M Elliot, Memoirs on the History, Folk-lores and Distribution of the Races of North-Western Provinces of India, London

4. Uday Kulkarni, Solstice at Panipat: 14 January 1761

5. Jadunath Sarkar, Fall of the Mughal Empire, Vol. 1, Calcutta, 1932

6. H R Nevil, District Gazetteers of the United Provinces of Agra and Oudh: Meerut, Allahabad, 1904

Thursday, June 22, 2023

राणा अलीहसन चौहान की वंशावली

डॉ. सुशील भाटी

राणा अलीहसन चौहान का जन्म 13 नवम्बर 1922 को कैराना क्षेत्र के मल्हीपुर गाँव में एक मुस्लिम गुर्जर परिवार में हुआ था| राणा अलीहसन चौहान पेशे से इंजीनियर थे, जोकि आज़ादी के बाद पकिस्तान स्थित गूजरांवाला के गाँव कोटशेरा में बस गए| राणा अलीहसन चौहान ने इतिहासकार के रूप में विशेष ख्याति पाई| 1960 में राणा अलीहसन चौहान ने उर्दू भाषा में तारीख़-ए-गुर्जर नामक पुस्तक में गुर्जर जाति का इतिहास लिखा, जिसके पांच खण्ड थे| 1998 में अंग्रेजी भाषा में “ए शोर्ट हिस्ट्री ऑफ़ गुर्जर्स” नामक पुस्तक लिखी, इस पुस्तक की उपयोगिता को देखते हुए इसका भारत में हिंदी अनुवाद श्री ओमप्रकाश गुर्जर (गांधी) आदि द्वारा किया गया| राणा अलीहसन के अनुसार उनका संबंध ऐतिहासिक पृथ्वीराज चौहान के भाई हरिराज चौहान (हर्रा) के परिवार से था| राणा अलीहसन चौहान ने अपनी वंशावली का लेखा-जोखा सुरक्षित रखा था| उनकी वंशावली का अध्ययन भारतीय उपमहाद्वीप में गुर्जर इतिहास और विरासत को समझने में सहायक हैं| उनकी पुस्तक “ए शोर्ट हिस्ट्री ऑफ़ गुर्जर्स” जिसका हिंदी अनुवाद श्री ओमप्रकाश गुर्जर (गांधी) आदि ने किया हैं, के अनुसार उनकी वंशावली निम्नवत हैं|

1. अर्णोराज चौहान

2. सोमेश्वर चौहान

3. हरिराज चौहान (हर्रा)

4. राणा कलसा (कैराना कस्बे के संस्थापक)

5. राणा सहजा

6. राव कुम्भा (8.3.1265 को खन्द्रावली गाँव की स्थापना की)

7. चंद्रपाल

8. राणा श्रीपाल

9. राणा वीर साल (इस्लाम कबूल कर लिया)

10. राणा हरदेवा

11. राणा दलीप

12. राणा कुंवर

13.मल्हा राव (मल्हीपुर गाँव के संस्थापक)

14. सुखराज

15. हरचंदराज

16. खेतराज

17. मनोहराज

18. राणा बारू

19. राणा दरगाही

20. राय दीन

21. चाँद दीन

22. राणा नत्थू

23. राणा नेमत अली

24. राणा जीवन अली

25. राणा गुलाब अली (1857)

26. नादिर अली उर्फ़ न्यादरा

27. लखमीर

28. रहमत अली

29. अलीहसन (जन्म 13.11.1922)

 उपरोक्त वंशावली के अनुसार हरिराज चौहान के पुत्र राणा कलसा ने कैराना बसा कर उसे अपना केंद्र बनाया| कैराना क्षेत्र में चौहान गुर्जरों की कल्शान खाप की चौरासी, यानि चौरासी गाँव हैं| मुग़ल बादशाह अकबर के समय भी कल्शान खाप प्रभावशाली रूप से अस्तित्व में थी| 1578 ई. में अकबर ने दिल्ली सूबे की पांच खाप जिनमे बालियान जाट खाप, कल्शान गूजर खाप, सलकलेन जाट खाप, दहिया जाट खाप तथा गठवाला जाट खाप सम्मिलित थी, के लिए एक फरमान ज़ारी कर उन्हें धार्मिक मामलो और आतंरिक प्रशासनिक मामलो में स्वतंत्रता प्रदान की थी| आज भी कल्शान खाप के चौहान गुर्जर बालियान और सलकलेन जाटो से विशेष भाईचारा मानते हैं| अबुल फज़ल द्वारा लिखित आईन-ए-अकबरी पुस्तक के अनुसार दिल्ली सूबे की सहारनपुर सरकार में कैराना महल के जमींदार गूजर जाति के थे| इसके अतिरिक्त कांधला जोकि दिल्ली सरकार के अंतर्गत था, वहाँ के जमींदार भी गूजर जाति के थे| इस प्रकार हम देखते हैं कि अकबर के शासनकाल में कल्शान चौरासी के क्षेत्र कैराना-कांधला में गूजर जमींदार थे| कैराना में आज भी कल्शान चौपाल हैं, जहाँ खाप की आवश्यक बैठक होती हैं| वर्तमान कैराना निवासी चौधरी रामपाल सिंह कल्शान चौरासी खाप के मुखिया हैं| आप पूर्व सांसद चौधरी हुकुम सिंह के भतीजे हैं| इसी खानदान के कुछ परिवारो ने कुछ पीढ़ी पूर्व इस्लाम धर्म अपना लिया था, उनमे चौधरी अख्तर हसन और चौधरी मुनव्वर हसन भी सांसद रहें हैं|

 उक्त वंशावली के अनुसार 1265 ई. में राणा अलीहसन चौहान के पूर्वज राव कुम्भा ने खंद्रवली ग्राम बसाया, जहाँ हरिराज चौहान की छठी पीढ़ी में जन्मे राणा वीर साल ने इस्लाम कबूल कर लिया| राणा वीर साल की चौथी पीढ़ी के वंशज मल्हा राव ने मल्हीपुर गाँव बसाया| उक्त वंशावली के अनुसार मल्हीपुर गाँव में ही हरिराज चौहान (हर्रा) की सत्ताईस्वी पीढ़ी में राणा अलीहसन चौहान का जन्म हुआ|

राणा वीर साल के अतिरिक्त चौहान गुर्जरों की कल्शान खाप के बहुत से अन्य परिवारों एवं गाँवों ने भी इस्लाम धर्म काबुल कर लिया था| वर्तमान में कल्शान चौरासी में लगभग 35 गाँवो में मुस्लिम गुर्जर निवास करते हैं| कुछ गाँवों में हिन्दू और मुस्लिम गुर्जरों की मिली-जुली आबादी हैं, जिनके पूर्वज एक हैं, सभी कलसा राज चौहान को अपना पुरखा मानते हैं| चौहान गुर्जरों की कल्शान खाप के हिन्दू-मुस्लिम गुर्जर अपनी एकता के लिए प्रसिद्ध हैं|

 सन्दर्भ-

 1. राणा अली हसन चौहान, गुर्जरों का संछिप्त इतिहास (अनुवाद- श्री ओमप्रकाश गुर्जर (गांधी), यमुनानगर, 2001

2. R S Sharma, Indian Feudalism, AD 300-1200

3. Sushil Bhati, Khaps in Upper Doab of Ganga and Yamuna, Janitihas Blog, 2017 https://janitihas.blogspot.com/2017/01/khaps-in-upper-doab-of-ganga-and-yamuna.html

 4. John F Richards, The Mughal Empire, Part 1, Vol. 5, Cambridge University Press, 1995

5. M C Pradhan, The political system of the Jats of Northern India. 1966

6. Abul Fazl Allami, Ain I Akbari, Vol. II (Translation- H S Jarrett), Calcutta, 1981




 

Tuesday, May 9, 2023

1857 के स्वतंत्रता समर में मेरठ जिले का प्रमुख घटनाक्रम

डॉ. सुशील भाटी

10 मई 1857 – जनक्रांति का आरम्भ| महत्वपूर्ण स्थान- काली पलटन (ओघड्नाथ मंदिर), सदर कोतवाली, भामाशाह पार्क (नई जेल)| मेरठ सदर बाज़ार कोतवाली में तैनात, ग्राम पांचली निवासी, कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने 10 मई 1857 के दिन इतिहास प्रसिद्ध ब्रिटिश विरोधी जनक्रांति के विस्फोट में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक पूर्व योज़ना के तहत, विद्रोही सैनिकों तथा धन सिंह कोतवाल सहित पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरूद्ध साझा मोर्चा गठित कर क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया था। शाम 5 से 6 बजे के बीच, सदर बाज़ार की सशस्त्र भीड़ और सैनिकों ने सभी स्थानों पर एक साथ विद्रोह कर दियाधन सिंह कोतवाल द्वारा निर्देशित पुलिस के नेतृत्व में क्रान्तिकारी भीड़ ने ‘मारो फिरंगी’ का घोष कर सदर बाजार और कैंट क्षेत्र में अंग्रेजो का कत्लेआम कर दिया| धन सिंह कोतवाल के आह्वान पर उनके अपने गाँव पांचली सहित घाट, नंगला, गगोल नूरनगर, लिसाड़ी, चुडियाला, डीलना आदि गाँवो के हजारों लोग सदर कोतवाली क्षेत्र में जमा हो गए| प्रचलित मान्यता के अनुसार इन लोगो ने, धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में, रात दो बजे नई जेल जेल तोड़कर 839 कैदियों क  छुड़ा लिया और जेल में आग लगा दी।

3 जून 1857 – नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल का बलिदान| नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल के किसान उन क्रान्तिवीरों में से थे जो 10 मई 1857 की रात को घाट, पांचली, नंगला आदि के किसानों के साथ धनसिंह कोतवाल के बुलावे पर मेरठ पहुँचे थे। इस घटना के बाद नूरनगर, लिसाड़ी, और गगोल के क्रान्तिकारियों बुलन्दशहर आगरा रोड़ को रोक दिया और डाक व्यवस्था भंग कर दी। आगरा उस समय उत्तरपश्चिम प्रांत की राजधानी थी। गगोल आदि गाँवों के इन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व गगोल के झण्डा सिंह उर्फ झण्डू दादा कर रहे थे। 3 जून 1857 को क्रांति गाँव नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल पर अंग्रेजो ने का हमला बोल दिया| इन गाँवो को जला कर राख कर दिया| कुछ दिन बाद अंग्रेजों ने फिर से गगोल पर हमला किया और बगावत करने के आरोप में 9 लोग रामसहाय, घसीटा सिंह, रम्मन सिंह, हरजस सिंह, हिम्मत सिंह, कढेरा सिंह, शिब्बा सिंह बैरम और दरबा सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इन क्रान्तिवीरों पर राजद्रोह का मुकदमा चला और दशहरे के दिन इन 9 क्रान्तिकारियों को चैराहे पर फांसी से लटका दिया गया। तब से लेकर आज तक गगोल गांव में लोग दशहरा नहीं मनाते हैं।

27 जून 1857- बरेली ब्रिगेड का गंगा पार कर दिल्ली पहुंचना| प्रमुख स्थल गढ़ मुक्तेश्वर पुल, परीक्षतगढ़| 1857 के स्वतंत्रता संग्राम मे राव कदम सिंह मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रान्तिकारियों का नेता था। उसके साथ दस हजार क्रान्तिकारी थे, जो कि प्रमुख रूप से मवाना, हस्तिनापुर और बहसूमा क्षेत्र के थे। ये क्रान्तिकारी कफन के प्रतीक के तौर पर सिर पर सफेद पगड़ी बांध कर चलते थे। मेरठ के तत्कालीन कलक्टर आर0 एच0 डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट को 28 जून 1857 को लिखे पत्र से पता चलता है कि क्रान्तिकारियों ने पूरे जिले में खुलकर विद्रोह कर दिया और परीक्षतगढ़ के राव कदम सिंह को पूर्वी परगने का राजा घोषित कर दिया। मेरठ और बिजनौर दोनो ओर के घाटो, विशेषकर दारानगर और रावली घाट, पर राव कदमसिंह का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। राव कदम सिंह की सहायता से विद्रोही बरेली ब्रिगेड ने गढ़ मुक्तेश्वर से गंगा पार की और दिल्ली पहुँच गई, जिससे दिल्ली में विद्रोहियों की स्थिति काफी मज़बूत हो गई|

4 जुलाई 1857– पांचली का बलिदान| मेरठ के क्रान्तिकारी हालातो पर काबू पाने के लिए अंग्रेजो ने मेजर विलयम्स के नेतृत्व में खाकी रिसाले का गठन किया। जिसने 4 जुलाई 1857 को पहला हमला 10 मई 1857 को जनक्रांति के प्रमुख नायक धन सिंह कोतवाल के गाँव पांचली और अन्य निकटवर्ती विद्रोही ग्राम घाट और नंगला पर किया| मेरठ गजेटियर के अनुसार खाकी रिसाले ने 4 जुलाई, 1857 को प्रातः चार बजे पांचली पर गाँव को चारो तरफ से घेर कर लिया| खाकी रिसाले में 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपची थे। एरिक स्ट्रोक के अनुसार अंग्रेजी सेना में 300 सैनिक थे, जिनमे दो तिहाई यूरोपीय थे| पांचली वासियों के अनुसार उस समय गाँव के दक्षिण में एक चौपाल पर काफी तादात में विद्रोही ठहरे हुए थे| पूरे पांचली गाँव को तोप से उड़ा दिया गया। लगभग 400 लोग मारे गए, जो बच गए उनमें से 46 लोग कैद कर लिए गए और इनमें से 40 को बाद में मिलिट्री कमीशनने फांसी पर लटकवा दिया। आचार्य दीपांकर के अनुसार पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा पर चढ़ाया गया|। पूरे गांव को आग लगा दी गई| पूरा गाँव जल कर नष्ट हो गया।

9 जुलाई 1857- सीकरी का बलिदान| मेरठ से 13 मील दूर, दिल्ली जाने वाले राज मार्ग पर मोदीनगर से सटा हुआ एक गुमनाम गाँव है-सीकरी खुर्द। 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में इस गाँव ने एक अत्यन्त सक्रिय भूमिका अदा की थी| बेगमाबाद कस्बा सीकरी खुर्द से मात्र दो मील दूर था। बेगमाबाद के अंग्रेज परस्तों ने गाजियबााद और दिल्ली के बीच हिण्डन नदी के पुल को तोड़ने का प्रयास किया। वो दिल्ली की क्रान्तिकारी सरकार और बुलन्दशहर के बागी नवाब वलिदाद खान के बीच के सम्पर्क माध्यम, इस पुल को समाप्त करना चाहते थे। इस घटना ने सीकरी खुर्द में स्थित क्रान्तिकारियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और उन्होंने 8 जुलाई सन् 1857 को बेगमाबाद पर हमला कर दिया। सबसे पहले बेगमाबाद में स्थित पुलिस चौकी को नेस्तनाबूत कर अंग्रेज परस्त पुलिस को मार भगाया। इस हमले की सूचना प्राप्त होते ही आसपास के क्षेत्र में स्थित अंग्रेज समर्थक काफी बड़ी संख्या में बेगमाबाद में एकत्रित हो गये। प्रतिक्रिया स्वरूप सीकरी खुर्द, नंगला, दौसा, डीलना, चुडि़याला और अन्य गाँवों के विद्रोही क्रान्तिकारी बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए। आमने सामने की इस लड़ाई में क्रान्तिकारियों ने सैकड़ों गद्दारों को मार डाला, चन्द गद्दार बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भाग सके।

बेगमाबाद की इस घटना की खबर जैसे ही मेरठ स्थित अंग्रेज अधिकारियों को मिली, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गयी। अंग्रेजी खाकी रिसाले ने रात को दो बजे ही घटना स्थल के लिए कूच कर दिया। अंग्रेजों के अचानक आने की खबर से क्रान्तिकारी हैरान रह गये परन्तु शीघ्र ही वो तलवार और भाले लेकर गाँव की सीमा पर इकट्ठा हो गये। खाकी रिसाले ने कारबाईनों से गोलियाँ बरसा दी| अंग्रेजी तोपखाने ने कहर बरपा दिया| गाँव की सीमा पर ही 30 क्रान्तिकारी शहीद हो गये। अन्ततः क्रान्तिकारियों ने सीकरी खुर्द के बीचोबीच स्थित किलेनुमा दोमजिला हवेली में मोर्चा लगा लिया। कैप्टल डीवयली के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना की टुकड़ी ने हवेली के मुख्य दरवाजे को तोप से उड़ाने का प्रयास किया। क्रान्तिकारियों के जवाबी हमले में कैप्टन डीवायली की गर्दन में गोली लग गयी और वह बुरी तरह जख्मी हो गया। इस बीच कैप्टन तिरहट के नेतृत्व वाली सैनिक टुकड़ी हवेली की दीवार से चढ़कर छत पर पहुँचने में कामयाब हो गयी। हवेली की छत पर पहुँच कर इस अंग्रेज टुकड़ी में नीचे आंगन में मोर्चा ले रहे क्रान्तिकारियों पर गोलियों की बरसात कर दी। तब तक हवेली का मुख्य द्वारा भी टूट गया, भारतीय क्रान्तिकारी बीच में फंस कर रह गये। हवेली के प्रांगण में 70 क्रान्तिकारी लड़ते-लड़ते शहीद हो गये|  उस दिन सीकरी में लगभग 170 भारतीयों इस आमने -सामने के युद्ध में अपने प्राण न्योछावर किए|

17 जुलाई 1857– बासोद का बलिदान| बासौद गांव के लोगों ने आरम्भ से ही क्रन्तिकारी गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था| मेरठ के पश्चिमी भाग में क्रांतिकारियों के नेता बाबा शाहमल उस दिन बासोद ग्राम में ही थे| अंग्रेजी घुड़सवार बासौद को घेरने के लिए बढ़े तो, रिसाले के अग्रिम रक्षकों ने देखा कि बहुत से लोग, जो हाथों में बंदूकें और तलवारें लिए हुए थे, गांव से भागे जा रहे थे। अंग्रेज जब गांव में पहुंचे तो पता चला कि बाबा शाहमल के जासूसों ने उन्हें खाकी रिसाले के आने की खबर दे दी थी और वो रात में ही बड़ौत की तरफ चले गये। अंग्रेजों को वहां आठ मन अनाज और दालों का भण्डार मिला जो कि दिल्ली के क्रांन्तिकारियों को रसद के तौर पर पहुंचाने के लिए इकट्ठा किया गया था। गांव में जो भी आदमी मिला उसे अंग्रजों ने गोली मार दी या फिर तलावार से काट दिया। सभी क्रांन्तिकारियाों को मारने के बाद गांव को आग लगा दी गई । वहां से प्राप्त रसद को भी आग के हवाल कर दिया गया। मेरठ के कलक्टर डनलप के अनुसार बासौद में लगभग 150 लोग मारे गये।

18 जुलाई 1857 बड़ोत का युद्ध| 18 जुलाई की सुबह खाकी रिसाला डौला से पूर्वी यमुना नहर के किनारे किनारे बडौत की तरफ चल दिया। बडौत में क्रान्तिकारियों ने एक बाग में मोर्चा लगा रखा था, करीब 3500 क्रान्तिकारी बाबा शाहमल के साथ वहां अंग्रेजों से भिडने को तैयार थे। भारतीय बहादुरी से लडे परन्तु भारतीयों की देशी बंदूकें अंग्रेजी राइफलो और तोपों का मुकाबला न कर सकी। भारतीय जान हथेली पर लेकर लडे पर विजय आघुनिक हथियारों की हुई। इस लडाई में करीब 200 भारतीय शहीद हुए। जिनमें बाबा शाहमल भी थे, जिन्हे एक अंग्रेज मि. तोन्नाकी ने दो भारतीय सिपाहियों की मदद से मारा था। अंग्रेजों ने बाबा शाहमल का सिर काट कर एक लम्बे भाले पर लटका दिया। बाबा का सिर जहाँ अंग्रेजों के लिए विजयी चिन्ह था, वहीं भारतीयों के लिए वह क्रान्तिकारी ललकार और सम्मान का प्रतीक था। इसलिए उन्होनें इसे वापिस पाने के लिए अंग्रेजो का हिंडन तक पीछा किया।

22 जुलाई 1857- अकलपुरा का बलिदान| खाकी रिसाला, जब 21 जुलाई 1857 को सरधना पहुँच गया खाकी रिसाले ने बेगम समरू के महल में डेरा डाल दिया। 22 जुलाई को खाकी रिसाला अकलपुरा पहुँच गया और  गांव  को चारो तरफ से घेर लिया। क्रांतिकारी  भी तैयार थे। रात में ही औरतों और बच्चों को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया गया था। अंग्रेजो की गोली का जवाब गोली से दिया गया।क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजो को  गांव  में घुसने नहीं दिया। इस पर अंग्रेजो ने तोपो से गोलाबारी की और गांव में घुसने में कामयाब हो गए। क्रान्तिकारी नरपत सिंह के घर के आस-पास मोर्चा जमाए हुये थे। परन्तु आधुनिक हथियारों के सामने वे टिक न सकें। गांव  मे जो भी आदमी मिला अंग्रेजो ने उसे गोली से उडा दिया। सैकडो क्रान्तिकारी शहीद हो गए। उनके शव जहाँ-तहाँ पडे थे उनमे से एक सुन्दर और सुडोल शव क्रांतिकारियों के नेता नरपत सिंह का भी था।

29 जुलाई 1857- गुलावठी का युद्ध| बुलंदशहर में विद्रोहियों के नेता वलीदाद खान अपने साथी दादरी के राजा राव उमराव सिंह के साथ, मेरठ पर आक्रमण करने के लिए, 28 जुलाई को गुलावठी मे दिया था| उनके साथ 400 घुड़सवार, 600 पैदल सिपाही और 1000 विद्रोही गूजर और राजपूत थे| मेरठ से अंग्रेजी सेना भी पहुँच गई जिसमे 50 कारबाईनर, 50 राइफलमैन तथा सैन्य रेजिमेंट का एक हिस्सा भेज दिए गए| 29 जुलाई 1857 को आमने-सामने के लड़ाई में सैंकड़ो भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को वीरगति प्राप्त हुई|

 

 सन्दर्भ-

1. गौतम भद्रा, फोर रिबेल्स ऑफ ऐत्तीन फिफटी सेवन; लेख, सब - आल्टरन स्टडीज, खण्ड.4 सम्पादक. रणजीत गुहा

2. डनलप, सर्विस एण्ड एडवैन्चर ऑफ खाकी रिसाला इन इण्डिया इन 1857.58

3. नैरेटिव ऑफ इवैन्ट्स अटैन्डिंग दि आउटब्रेक ऑफ डिस्टरबैन्सिस एण्ड रेस्टोरेषन आॅफ अथारिटी इन दि डिस्ट्रिक्ट ऑफ मरेठ इन 1857.58

4. एरिक स्ट्रोक, पीजेन्ट आम्र्ड

5. एस0 ए0 ए0 रिजवी, फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश खण्ड.5

6. ई0 बी0 जोशी, मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर

7. सुशील भाटी, अमर क्रान्तिकारी बाबा शाहमल सिंह, https://janitihas.blogspot.com/2012/10/baba-shahmal-singh.html

8. सुशील भाटी, मेरठ के क्रान्तिकारियों का सरताज राव कदम सिंह https://janitihas.blogspot.com/2012/10/rao-kadam-singh.html

9. सुशील भाटी, गगोल का बलिदान          https://janitihas.blogspot.com/2012/10/blog-post_28.html

10. सुशील भाटी, सीकरी की शहादत                  https://janitihas.blogspot.com/2012/10/blog-post.html

11. सुशील भाटी, क्रान्तिवीर नरपत सिंह एवं अकलपुरा का बलिदान https://janitihas.blogspot.com/2012/10/akalpura-ka-balidan.html

12. सुशील भाटी, 1857 की जनक्रान्ति के जनक धन सिंह कोतवाल https://janitihas.blogspot.com/2012/11/1857-dhan-singh-kotwal.html

13. सुशील भाटी, बासौद की कुर्बानी                   https://janitihas.blogspot.com/2013/03/blog-post.html