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Wednesday, December 24, 2025

बटार गुर्जरों की बावनी

डॉ सुशील भाटी

बटार गोत्र के गुर्जरों के 52 गाँव की एक खाप जिले सहारनपुर में स्थित हैं, इस खाप को बटारो की बावनी कहते हैं और इसका केंद्र गंगोह क़स्बा हैं| जानकार लोगो का मानना हैं कि परम्परागत 52 गाँव अब बढ़ कर 65 के करीब हो गए हैं| बटारो के अधिकांश गाँव गंगोह और नकुड के बीच हैं| वास्तव में यह बावनी “गुजरात” का हिस्सा हैं| अठारवी शताब्दी में मध्य सहारनपुर गुर्जर जाति की बाहुल्यता और आधिपत्य के कारण “गुजरात” कहलाता था| इस “गुजरात” में सहारनपुर के नकुड, गंगोह, रामपुर, परगने तथा मुज़फ्फरनगर के कैराना और झिंझाना क्षेत्र आते थे| इस क्षेत्र के ननौता, अम्भेटा, गंगोह, देवबंद और कांधला कस्बो में “गुज्जरवाडा” नाम के मोहल्ले हैं, जो इस क्षेत्र में  गुर्जरों के आधिपत्य को दर्शाते हैं|

बटारो गोत्र के लोगो में यह मान्यता चली आ रही हैं कि उनके पूर्वज मुल्तान से आये थे| डेंजिल इबटसन की पुस्तक ‘पंजाब कास्ट’ के अनुसार मुल्तान क्षेत्र में आज भी बटार गोत्र के जाट बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं| सबसे पहले बटार गुर्जर गंगोह के निकट दूधला गाँव में बसे| उन्होंने गंगोह के आस-पास 52 गाँव बसाये| जो कालांतर में बटारो की बावनी के नाम से प्रसिद्ध हुए| बटार गोत्र के सरदार ने गंगोह में एक किले का निर्माण किया और वहाँ सैन्य छावनी स्थापित किया| उसने गंगोह के इस किले को अपने प्रभावक्षेत्र का केंद्र बनाया| गंगोह स्थित इस किले के चार बुर्ज़ थे, जिनके अवशेष आज भी मौजूद हैं|| गंगोह में आज भी गुज्जरवाडा मोहल्ला हैं, ज़हां बटार गोत्र के गुर्जर रहते हैं| कुछ बटार परिवार, पंवार गुर्जरों की लंढोरा रियासत के उत्कर्ष काल में, लगभग 250 वर्ष पूर्व, गंगा के खादर में लक्सर क्षेत्र में चले गए, ज़हां आज भी उनके लक्सर, बसेडी, बसेड़ा  सीमली, मुबारिकपुर आदि अनेक गाँव हैं|

मुग़ल काल में बटारो की बवानी के बड़े आबादी समूह ने इस्लाम धर्म को अपना लिया| ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध 1857 के स्वाधीनता संग्राम के समय बटारो की बावनी के परंपरागत चौधरी भी बुड्ढाखेडा गाँव के एक मुस्लिम गुर्जर चौधरी फतुआ गूजर थे| उनके पास 5200 बीघा ज़मीन थी| चौधरी फतुआ गूजर बुड्ढाखेड़ा स्थित मिट्टी के किले में लखौरी इंटों से बने शानदार महल में रहते थे| उन्होंने अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूक दिया और स्वयं को क्षेत्र का राजा घोषित किया| उन्होंने अंग्रेजो को सहारनपुर जिले में गुर्जरों के परपरागत क्षेत्र ‘गुजरात’ से बाहर निकालने का आवाहन किया| उनके नेतृत्त्व में हिन्दू और मुस्लिम गुर्जर सगे भाइयो के तरह मिलकर कम्पनी शासन के विरुद्ध लड़ें| इस संघर्ष में वे अपने साथ क्षेत्रीय हिन्दू राजपूतो और मुस्लिम राजपूतो (रांघडो) को भी अपने साथ जोड़ने में सफल रहें| शेख एवं तुर्कमान भी वैचारिक रूप से इस संघर्ष में फतुआ गूजर के साथ थे, हालाकि वे प्रत्यक्ष इस संघर्ष में उनके साथ नहीं लड़ें| इब्राहिमी गाँव के चौधरी आलिया खटाना, टाबर गाँव के ठाकुर बख्शी सिंह, रांघडो के उमरपुर, मानपुर, कुंडा कलां आदि गाँव बाबा फतुआ गूजर के विशेष सहयोगी थे|  फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में लगभग 3000 क्षेत्रीय लोगो ने गंगोह और नकुड पर हमला बोल दिया और अंग्रेजी राज का सफाया कर दिया| नकुड तहसील और थाने को आग के हवाले कर दिया| प्रतिक्रिया में अंग्रेजी सेना ने रोबर्टसन के नेतृत्त्व में बुड्ढाखेडा पर हमला बोल दिया| हाथी के मदद से अंग्रेजो ने किले का दरवाज़ा तोड़ दिया| फतुआ गूजर बहादुरी से लड़ें किन्तु पराजित हुए| किन्तु वे किले से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहें| अंग्रेजो ने मिट्टी के किले का गिरा दिया और महल को क्षतिग्रस्त कर दिया| एक ज़ोरदार संघर्ष के बाद अंततः 27 जून 1857 फतुआ गूजर सुर्खवाला के युद्ध में शहीद हो गए| अंग्रेजो ने उनकी भूमि और संपत्ति ज़ब्त कर ली| उनके गाँव को राज़स्व रिकार्ड्स में कच्चा घोषित कर बदहाल स्तिथि में पहुंचा दिया गया| बाबा फतुआ के कोई पुत्र नहीं था| बुड्ढा खेडा के बहुत से लोग अंग्रेजो के जुल्म के कारण भिस्सल हेडा गाँव चले गए|

उपरोक्त परिस्थिथियो में बटारो की चौधर 1890 ई. के लगभग में शेरमऊ गाँव के हिन्दू बटार गुर्जरों के पास चली गई| शेर मऊ गाँव के चौधरी उमराव सिंह उर्फ़ अमरा सिंह बटारो की बावनी के चौधरी बनें| इसके बाद इनके वंशज लगातार बटारो की बावनी खाप के चौधरी बनते आ रहें हैं| शेर मऊ के चौधरी परिवार से सम्बंधित चौधरी पारस सिंह पुत्र श्री जय सिंह ने बताया की औरंगजेब के काल में भी बटारो की चौधर शेर मऊ गाँव में उनके पूर्वज चौधरी करमचंद जी के पास थी, जोकि क्षेत्र से लगान वसूल कर दिल्ली खजाने में जमा करते थे| एक बार जब वो इसी कार्य से दिल्ली गए हुए थे, लौटकर मुसलमान बन गएँ| श्री इमरान अली, निवासी बुड्ढा खेडा के अनुसार यह घटना जहाँगीर के काल की हैं| वे कहते हैं उनके पूर्वज ने वहां मुस्लिम भोजनालय या किसी मुस्लिम के यहां खाना खा लिया और घर आकर सच्चाई बता दी। घरवालों ने सनातन धर्म का मानने से इनकार कर दिया, उसके खाने पीने के बर्तन अलग कर दिए। उसका दूसरा बियाह उसकी घरवाली ने ही कराया था। उनकी हिन्दू पत्नी जोकि कैराना की बेटी थी, उसने उनकी देखभाल के लिए, उनका निकाह कैराना से ही अपनी जान-पहचान की एक मुस्लिम लड़की से करा दिया, जिनसे उन्हें दो पुत्र हुए| एक पुत्र का नाम जामुद्दीन था, जिसने बुड्ढा खेडा गाँव बसाया, और वह बटारो की बावनी का चौधरी बना| मुस्लिम पत्नी के दूसरे पुत्र ने भिस्सल हेडा गाँव बसाया| चौधरी करमचंद की हिन्दू पत्नी के तीन लडको के वंशज कम्हेडा, शेर मऊ और कुराली में बस गए| शेर मऊ के वर्तमान चौधरी का वंश वृक्ष इस प्रकार हैं-

1.     चोधरी उमराव सिंह उर्फ़ अमरा सिंह

2.     चौधरी राजाराम

3.     चौधरी नत्थू सिंह

4.     चौधरी सोम सिंह

5.     श्री धनेंदर चौधरी (बटार बावनी के वर्तमान चौधरी)

मुस्लिम बटार गुर्जरों के गाँवो की सूची-

1. दरबूजी 2. थावनी 3. भिस्सलहेडा 4. तिघरी 5. घाटमपुर 6. नवाज़पुर 7. घिस्सेवाला 8. किडौली  9. भलापड़ा 10. हाजीपुर 11. गुड़हनपुर 12. खानपुर 13 खैरपुर 14. टापाहेडी 115. सौंतर  16. पीर माजरा 17. हमजागढ़ 18.फतेहपुर ढोला 19. क़ुतुब खेडी 20. बोड़पुर 21. बुड्ढाखेडा 22. कोटडा 23. टिंडोल्ली

हिन्दू-मुस्लिम बटार गुर्जरों की मिश्रित आबादी वाले गाँवों की सूची

1. मैनपुरा / मोहनपुरा 2. बाढ़ी माजरा 3. बडगाँव 4. सांगाखेडा 5. कुलहेडी 6. गंगोह (गुज्जरवाडा) 7. भोगीवाला माज़रा

हिन्दू बटार गुर्जरों के गाँवो की सूची-

1. रामगढ़ 2. ढोला माजरा 3. सिरस्का 4. किशनपुरा 5. सनौली 6. छाप्पुर छोटी 7. छाप्पुर बड़ी  7. बिस्नोट 8. खोसपुर 9. कुराली 10. नया गाँव 11. समसपुर 12. भैरमऊ 13. दरियापुर 14. रामसहायवाला 15. रंधेडी / धीर खेडी 16. ढायकी 17. चकवाली 18. अलीपुरा 19. बंदाहेडी 20. बीराखेडी 21. शेरमऊ  22. कम्हेडा 23. सालारपुरा 24. 25. जुखेडी  26. ज़न्धेडा

दूधला गाँव के कैप्टन मंगत सिंह (बटार), अधिवक्ता एक अन्य प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और नेता थे, जोकि 1937 में विधायक निर्वाचित हुए थे| ग्राम बीरा खेडी में जन्मे महंत जगन्नाथ दास (बटार) क्षेत्र की एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे, उनका आश्रम गाँव रणदेवा में था| वे 1946 में सहारनपुर से निर्विरोध विधायक चुने गए| उनकी याद में “महंत जगन्नाथ दास इंटर कॉलेज” बांदूखेडी गाँव संचालित किया जाता हैं| गंगोह के श्री कदम सिंह (बटार) स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार थे|  दूधला गाँव के श्री कंवरपाल सिंह (बटार) नकुड विधानसभा से तीन बार वर्ष 1989, 1991 और 1996 में विधायक चुने गए| उनके सुपुत्र श्री प्रदीप चौधरी दो बार नकुड और एक बार गंगोह से विधायक रहें| वे एक बार वर्ष 2014 से 2019 तक कैराना लोकसभा से सांसद भी रहें हैं| चौधरी इरशाद वर्ष 2005 से 2010 तक सहारनपुर के जिला पंचायत अध्यक्ष रहें हैं| भिस्सल हेडा के चौधरी दोस्त मोहम्मद (बटार) गंगोह ब्लाक के प्रमुख रहें हैं| हरडाखेडी गाँव के चौधरी ताहिर (बटार) चिलकाना ब्लाक के प्रमुख रहें हैं| फतेहपुर ढोला गाँव के चौधरी मज़ाहिर राणा एक अन्य प्रमुख बटार गुर्जर हैं|

क्षेत्र के लोग हिन्दू-मुस्लिम गुर्जरों की एकता की मिसाल देते हैं| बटार गोत्र के हिन्दू-मुस्लिम गुर्जरों की एकता को प्रोत्साहित करने के लिए वर्ष 1986 में सालारपुरा गाँव में एक गुर्जर सम्मलेन का अयोज़न भी किया गया था| वर्तमान में हिन्दू-मुस्लिम गुर्जर, 27 जून को, गंगोह कस्बे में बाबा फतुआ गूजर का शाहदत दिवस बड़े धूम-धाम से मनाते हैं| चुनावी राजनीती में भी हिन्दू-मुस्लिम गूजर धर्म-संप्रदाय से ऊपर उठकर अपनी जाति और गोत्र के प्रत्याशी को वोट करते हों|

सन्दर्भ-

1. टेलीफोनिक साक्षात्कार चौधरी पारस सिंह, ग्राम शेर मऊ, सहारनपुर, दिनांक 23.12.2025

2. टेलीफोनिक साक्षात्कार चौधरी धनेंदर सिंह, ग्राम शेर मऊ, सहारनपुर, दिनांक 23.12.2025

3. टेलीफोनिक साक्षात्कार चौधरी संजय सिंह, ग्राम शेर मऊ, सहारनपुर, दिनांक 21.12.2025

4. टेलीफोनिक साक्षात्कार श्री मुस्तकीम चौधरी, गुज्जरवाडा, गंगोह, सहारनपुर, दिनांक 19.12.2025

5. टेलीफोनिक साक्षात्कार श्री विपिन आर्य, ग्राम ढोला माज़रा, सहारनपुर, दिनांक 19.12.2025

6. टेलीफोनिक साक्षात्कार श्री ओमकार सिंह चौधरी, ग्राम उमरी कलां, सहारनपुर, दिनांक 19.12.2025

7. H. R. Nevill, Saharanpur: A Gazetteer, Allahabad, 1909, p 101

8. Dangli Prasad Varun, Uttar Pradesh District Gazetteer: Saharanpur, Lucknow, 1981, p 64

9. Eric Stroke, Peasant Armed, Oxford, 1986, p 199, 207

10. Ranajit Guha, Elementary Aspects of Peasant Insurgency in Colonial India, p 313, 318, 321

11. R C Majumdar, The Sepoy Mutiny and the Revolt of 1857,  1963, p 106 

12. S B Chaudhari, Civil Rebellion in Indian Mutinies, 1857-1859, 1957, p 77, 287

13. Denzil Ibbetson, Tribes and castes of Panjab, Lahore, 1916



Statue of Mahant Jagan NathDas

Gurjar / GujjarLogo

Shri Mangat Singh Doodhla


 

 

 

 

 

 

 

 

Thursday, November 13, 2025

उत्तराखंड में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उमराव सिंह गूजर “मानिकपुरी” की भूमिका

 उत्तराखंड में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उमराव सिंह गूजर “मानिकपुरी” की भूमिका

डॉ सुशील भाटी

पृष्ठभूमि 1857 का विद्रोह, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है, ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ भारतीय सैनिकों और जनता का एक बड़ा विद्रोह था। यह विद्रोह उत्तर भारत में मुख्य रूप से मेरठ, बुलंदशहर, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और अन्य स्थानों पर केंद्रित था, लेकिन उत्तराखंड जैसे क्षेत्रीय इलाकों में भी इसका प्रभाव पड़ा था। उत्तराखंड, जो उस समय उत्तर पश्चिमी प्रांत (उत्तर प्रदेश का हिस्सा) का भाग था, में भी 1857 के विद्रोह का प्रभाव पड़ा| यहाँ पर भी कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ और संघर्ष हुए थे।

उत्तराखंड का अधिकांश हिस्सा ब्रिटिश शासन के अधीन था। ब्रिटिशों ने 1815 में सुगौली संधि के तहत गढ़वाल और कुमाऊं को नेपाल से छीन लिया और अपने अधीन कर लिया। इस प्रकार वर्तमान गढ़वाल और कुमाऊ 19वीं सदी में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा बन गया। उत्तरखण्ड का वर्तमान हरिद्वार जनपद तब ऊपरी दोआब का हिस्सा था मुग़ल प्रशासन के अंतर्गत दिल्ली सूबे की सहारनपुर सरकार का हिस्सा था| | हरिद्वार-सहारनपुर क्षेत्र में राजा रामदयाल राजनैतिक रूप से सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्ति थे| मुगल साम्राज्य के अंतर्गत राजा रामदयाल के पास 804 गाँव की मुकरर्दारी रियासत थी | मुगलों के बाद उत्तर भारत में जब मराठो का उत्कर्ष हुआ तब 1803 तक हरिद्वार क्षेत्र मराठो के कब्ज़े में रहा| 1803 में मराठे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से पराजित हो गए| ग्वालियर के सिन्धियाओ के साथ हुई, सुर्जी अर्जुन गाँव की संधि के अंतर्गत हरिद्वार क्षेत्र सहित ऊपरी दोआब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को प्राप्त हो गया था | ऊपरी दोआब के प्रशासनिक पुनर्गठन करते हुए कंपनी ने हरिद्वार को सहारनपुर जिले में सम्मिलित कर दिया था| वाटसन द्वारा लिखित देहरादून डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियरके पृष्ठ 189 के अनुसार 1815 में सुगौली की संधि के बाद, कंपनी प्रशासन ने 1817 से 1825 तक देहरादून को भी सहारनपुर जनपद का हिस्सा बना दिया था|उक्त अवधि में हरिद्वार और देहरादून सहारनपुर के अंतर्गत आते थे|  इस प्रकार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय उत्तराखण्ड का हरिद्वार जनपद सहारनपुर का हिस्सा था|

उत्तराखंड के निवासी, जो मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर थे, ब्रिटिश शासन की जमींदारी व्यवस्था, लगान और करों के बोझ तले दबे हुए थे। इन कारणों से लोकविरोधी भावना विकसित हो गई थी।

ब्रिटिश शासन ने मिशनरी कार्य के माध्यम से धर्म परिवर्तन और ईसाई धर्म के प्रचार को बढ़ावा दिया, जिससे स्थानीय हिंदू और अन्य धार्मिक समुदायों के बीच असंतोष पैदा हुआ। स्थानीय लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने के लिए ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ उठ खड़े हुए थे।

हरिद्वार जनपद में उमराव सिंह गूजर का विद्रोह : 1857 का स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह विद्रोह केवल सैनिकों द्वारा नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ किया गया था। उमराव सिंह मानिकपुर आदमपुर गांव के निवासी थे, यह गाँव मंगलौर के निकट हरिद्वार जनपद में स्थित हैं| |उमराव सिंह गूजर 1857 के विद्रोह के एक प्रमुख स्थानीय नेता थे, जिन्होंने इस विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका संघर्ष ब्रिटिश शासन के खिलाफ था, और उनका नेतृत्व साहस और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक बन गया। उमराव सिंह के पिता फतेह सिंह भी इस विद्रोह में सक्रिय योगदान कर रहें थे|

जैसा कि कहा जा चुका हैं कि गंगा यमुना का समस्त ऊपरी दोआब और गढ़वाल-कुमाऊ के क्षेत्र 1857 के विद्रोह के समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के तहत थे। ब्रिटिश शासन के दौरान इन क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों, खासकर किसानों और सैनिकों के साथ अत्यधिक शोषण हो रहा था। ब्रिटिश द्वारा लागू किए गए कठोर करों, भूमि करों और सैनिकों की भर्ती के कारण जनता में असंतोष था। उमराव सिंह के ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के विरुद्ध हुए इस विद्रोह को समझने के लिए हमें समकालीन सहारनपुर-हरिद्वार क्षेत्र की भू-राजनैतिक परिस्थिथियो का अवलोकन करना होगा, क्योकि इस विद्रोह का कारण मात्र कृषक असंतोष नहीं था, इस अतिरिक्त क्षेत्रीय रूप से प्रभुत्वशाली गूजर जाति की राजनैतिक महत्वकांक्षा भी थी| 1857 के विद्रोह के समय हरिद्वार क्षेत्र सहारानपुर जनपद में आता था| नेविल द्वारा लिखित सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर के पृष्ठ संख्या 101 के अनुसार पहले सहारनपुर जिले एक बड़े भाग को गुजरात कहा जाता था, और जिले में गूजर सबसे बड़े भूमिपति थे| वर्तमान हरिद्वार जनपद में स्थित लंढोरा रियासत के राजा भी गूजर थे| वह लिखता हैं कि “ In former days a large part of Saharanpur was commonly known as Gujarat, and at the present time three divisions of the area are generally recognised ..........the central portion (division) Gujarat, comprising the parganas of Gangoh, Rampur and Nakur, as well as the neighbouring tracts of Muzaffarnagar. वेह आगे लिखता हैं कि “The Gujars are the largest proprietors in the district, their holdings including the great Landhaura estate.”  एरिक स्टोक्स द्वारा लिखित पीजेंट आर्म्ड पुस्तक के पृष्ठ संख्य 199 के अनुसार इस गुजरात में मुज़फ्फरनगर जिले के कैराना और झिंझाना परगना सम्मिलित थे| 1813 में लंढोरा के राजा रामदयाल गूजर का निधन हो गया| अंग्रेजो ने राजपरिवार के सदस्यों में विवाद का लाभ उठा कर रियासत को कई ताल्लुको में बाँट दिया, और रियासत का बड़ा भाग अपने पास रख लिया| जिस कारण क्षेत्रीय गूजरों में अंग्रेजी शासन के प्रति एक राजनैतिक असंतोष था| इसी कारण से हरिद्वार क्षेत्र में पूर्व में 1824 में भी ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध विद्रोह हो चुका था| विद्रोह का नेतृत्व कलुआ गूजर और राजा विजय सिंह गूजर ने किया था| राजा विजय सिंह लंढोरा रियासत के कुंजा बहादुरपुर ताल्लुके के ताल्लुकेदार थे| इतिहास में यह विद्रोह गूजर विद्रोह के नाम से जाना जाता हैं| आरम्भ में यह विद्रोह कलुआ गूजर के नेतृत्त्व में उत्तराखण्ड में गढ़वाल और कुमाऊ की तराई में फैला हुआ था परन्तु विद्रोह के अंतिम दौर में कुंजा का किला इसका केंद्र बन गया था| कुंजा गाँव रूडकी के पास हरिद्वार जनपद में ही स्थित हैं| अंग्रेजो ने गोरखों की सिरमोर बटालियन की मदद से इस विद्रोह को कुचल दिया था| कुछ इतिहासकार इस विद्रोह को 1857 के विद्रोह का पूर्वाभ्यास भी कहते हैं| उत्तराखण्ड सरकार ने भी इस विद्रोह के ऐतिहासिक महत्व को समझते हुए हरिद्वार जनपद के कुंजा गाँव में कलुआ गूजर और राजा बिजय सिंह का भव्य स्मारक बनवाया हैं|1857 के विद्रोह में, इस प्रकार क्षेत्रीय गूजर भूमिपतियों ने उमराव सिंह गूजर की अगुआई में पुनः अपनी राजनैतिक सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया| सहारनपुर में बूढा खेडी के फतुआ गूजर ने अपने को राजा घोषित किया था| 

10 मई 1857 को मेरठ में देशी सैनिक और धन सिंह कोतवाल सहित मेरठ की पुलिस ने अंग्रेजो को खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजा दिया था| उसके बाद विद्रोह की लहर देशी सैनिको और आम जनता में फैलती चली गई| 1857 के विद्रोह में, हरिद्वार क्षेत्र में मानिकपुर गाँव, ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध गूजर विद्रोह का केंद्र बना गया और उमराव सिंह ने उसका नेतृत्त्व किया| उन्होंने स्थानीय गूजर किसानों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट किया ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेकने का आव्हान किया। उमराव सिंह गूजर ने क्षेत्र को स्वतंत्र करा कर स्वयं को राजा घोषित कर दिया, उन्होंने अपने राज्य को स्थिर करने के लिए राज आज्ञाए जारी करनी आरम्भ कर दी| आजादी के इस संघर्ष में हरिद्वार क्षेत्र में क्षेत्र और देश को आज़ाद करने की भावना से “मारो फिरंगी को” नारा सभी तरफ गूँज रहा था| हर तरफ यही उद्घोष था कि “अंग्रेजो को मालगुजारी मत दो, थाने- तहसील को आग के हवाले कर दो|” “एकजुट होकर अपना राज़ वापिस ले आओ।“ इस बदलते माहौल का व्यापक असर क्षेत्र पर होने लगा| राजा उमराव सिंह का राज्य स्थिर होना लगा और क्षेत्र से उन्हें मालगुजारी-लगान मिलने लगा| इस घटनाक्रम की जानकारी मिलने पर अंग्रेज अधिकारी चकित रह गए| उमराव सिंह ने   युद्ध की रणनीति अपनाई और 22 मई को मंगलौर पर हमला कर दिया उन्होंने सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश अधिकारियों को चुनौती देना शुरू किया। एरिक स्ट्रोक्स के अनुसार “gathering of 200 Gujars intent on attacking Manglaur (south of Rurki) on 22 (June) May , and the setting up of Umrao Singh as raja at Manikpur (modern Adampur Manakpur, seven miles west of Rurki), where he became ‘the leader of all the disaffected Goojurs in the Pergunnah.” उन्होंने सहारनपुर के आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश सेना के आपूर्ति मार्गों को बाधित किया और ब्रिटिश सरकार के बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचाया।

ब्रिटिश सेना ने विद्रोहियों के खिलाफ अपनी कार्रवाई तेज की, उमराव सिंह को पकड़ने अथवा मारने के प्रयास बढ़ गए। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए सहारनपुर का जिला मजिस्ट्रेट स्पेंकी सेना लेकर मंगलोर पहुँच गया| जॉइंट मजिस्ट्रेट राबर्टसन भी अपनी सेना लेकर उससे मंगलौर में आ मिला। 30 मई 1857 को जिले भर की समस्त अंग्रेजी सेना ने मंगलोर को आधार बनाकर मानिकपुर पर हमला कर दिया| उमराव सिंह स्थानीय गुप्तचर व्यवस्था काफी अच्छी थी| सभवतः उसे अंग्रेजो के आक्रमण की पूर्व में ही सूचना मिल गई थी| विद्रोहियों के संख्याबल और संसाधनों के कम होने के कारण, ब्रिटिश शासन ने मानिकपुर में विद्रोह को कुचल दिया। किन्तु अंग्रेज उमराव सिंह को गिरफ्तार नहीं कर सके| परन्तु उनके कई साथी विद्रोहियों को पकड़ लिया गया और उन्हें कठोर दंड दिया गया। अंग्रेजो ने विद्रोह में शामिल होने वालेसभी आस-पास के गांवों को सामूहिक सजा दी। अंग्रेजो ने मानिकपुर और आसपास के कई गांवों को आग में जला कर ख़ाक कर दिया गया| विद्रोही नेताओं को फांसी दी गई। 1981 में प्रकाशित सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर के पृष्ठ संख्या 64 पर इस ऐतिहासिक घटना का विवरण इस प्रकार दिया गया हैं “ On the 30th of May, Spankie, joined by Robertson and his force, went to Manglaur in order. to make a raid on Manakpur, then held by one Umrao Singh; who had set himself up as raja and was levying contributions from the villagers. The village was taken and burned, but an attempt to capture Umrao Singh failed as he and his -followers succeeded in effecting their escape.

अंग्रेजो ने राजा उमराव सिंह को गिरफ्तार करने की हर संभव कोशिश की मगर कामयाब नहीं हो पाए। जब उन्हें किसी भी प्रकार कामयाबी नहीं मिली तब अंग्रेजों ने एक क्षेत्रीय जमींदार, जो राजा  उमराव सिंह के रिश्तेदार थे, उनकी मदद से उन्हें सहारनपुर के निकट सीडकी गाँव से गिरफ्तार कर लिया और फांसी लगा दी गई|

उमराव सिंह का नाम इतिहास में उतना प्रसिद्ध नहीं है जितना अन्य प्रमुख विद्रोही नेताओं का, लेकिन उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। उन्होंने आसपास के इलाकों में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोध खड़ा किया, और उनकी भूमिका को याद किया जाना चाहिए। उमराव सिंह का नाम स्थानीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया था| आगामी पीढियां के लिए वो एक प्रेरणा का स्रोत बन गए| उनके संघर्ष ने यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हर स्तर पर संघर्ष किया जा सकता है, चाहे वह स्थानीय स्तर पर ही क्यों न हो। उनका विद्रोह न केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ था, बल्कि यह उस समय की भारतीय जनता की आज़ादी की आकांक्षाओं का प्रतीक था। हालांकि उनका संघर्ष ब्रिटिश सेना द्वारा दबा दिया गया, लेकिन उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा, क्योंकि उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना को जीवित रखा।

सन्दर्भ –

1. H. G. Watson, Dehradun: A Gazetteer, Allahabad, 1911, p 189

2. H. R. Nevill, Saharanpur: A Gazetteer, Allahabad, 1909

3. Dangli Prasad Varun, Uttar Pradesh District Gazetteer: Saharanpur, Lucknow, 1981

4. सुशील भाटी, 1857 की जनक्रांति के जनक धन सिंह कोतवाल, दी जर्नल ऑफ़ मेरठ यूनिवर्सिटी हिस्ट्री एलुमनाई, खण्ड XII, 2008, पृष्ठ 62-66

5. सुशील भाटी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत राजा विजय सिंह- कल्याण सिंह, प्रकाशक- अशोक चौधरी, मेरठ, 2002

6. Eric Stroke, Peasant Armed, Oxford, 1986, p 205

7. Ranajit Guha, Elementary Aspects of Peasant Insurgency in Colonial India, 206, 318