Search This Blog

Friday, January 9, 2026

उत्तराखण्ड के मुस्लिम वन गुज्जर – एक परिचय

 

डॉ सुशील भाटी

उत्तराखण्ड राज्य की शिवालिक पहाडियों की तराई में विकासनगर से लेकर नेपाल से सटे टनकपुर तक लगभग 7000 मुस्लिम गुज्जर परिवार अर्ध घमन्तु पशुपालको का जीवन जी रहे हैं, जिनमे सबसे अधिक लगभग 1000 परिवार श्यामपुर रेंज में हैं| इनके बुज़ुर्ग कभी सैकड़ो वर्ष पहले जम्मू से हिमाचल होते हुए उत्तराखण्ड आये थे| इन गुज्जरों के पास भूमि अधिकार नहीं हैं| वन विभाग के चुगान के पुराने परमिट ही इनके वनों में रहने और पशु चराने के अधिकार का आधार हैं| गुज्जर चरवाहे मुख्य रूप से भैंस पालते हैं, साथ में गाय और यातायात के लिए घोड़े भी पालते थे| आम तौर पर, वे अपनी भैंसों के साथ ऊपरी हिमालय में स्थित बुग्यालों (घास के मैदानों) में चले जाते हैं और मानसून के अंत में ही तलहटी में अपनी अस्थायी झोपड़ियों, डेरों में लौटते हैं। गुज्जर वनों में रहते हैं, अतः कई बार इन्हें वन गुज्जर भी कह देते हैं| सरकार ने राजा जी नेशनल पार्क और जिम कॉर्बेट पार्क से कुछ अर्ध-घुमंतू गुज्जरों को विस्थापित कर हरिद्वार जिले में दो बस्तियों में उनका पुनर्वासित भी किया हैं| एक गुज्जर बस्ती पदार्था के निकट पथरी में स्थित हैं तथा दूसरी गैंडीखाता में हैं|

पथरी स्थित गुज्जर बस्ती 1998 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने राजा जी नेशनल पार्क के मोतीचूर, रानीपुर आदि क्षेत्र से अर्ध घुमंतू गुज्जर चरवाहों को विस्थापित कर बसाई थी| बस्ती में लगभग 512 गुज्जर परिवारों को विस्थापित किया गया था| वर्तमान में गुज्जर बस्ती की आबादी 5000 से अधिक हैं, जिनमे लगभग 2700 व्यस्क हैं| 

गैंडीखाता गुज्जर बस्ती में लगभग 9000 गुज्जर निवास करते हैं। वर्ष 2002 में गैंडीखाता गुज्जर बस्ती में 881 गुज्जर परिवार ‘राजा जी नेशनल पार्क” और 157 गुज्जर परिवार “जिम कॉर्बेट पार्क” से विस्थापित किए गए थे| इस प्रकार उस समय कुल 1038 परिवारों को विस्थापित कर गेंखाडीता में गुज्जर बस्ती बसाई गई थी| एक अनुमान के अनुसार इस समय बस्ती की आबादी लगभग 9000 हैं, तथा जिनमे 4500 व्यस्क हैं| 

अर्थव्यवस्था- अर्ध-घुमंतू वन गुज्जरों की अर्थव्यवस्था को ऋतु प्रवास के लिए जाना जाता हैं| अधिकांश वन गुज्जरों का पुनर्वासित नहीं किया गया हैं, वे अभी भी अपनी भैंसों के साथ ऋतू प्रवास करते हैं| ऋतु प्रवास सामान्यतः बैसाखी के दिन आरम्भ किया जाता हैं, इस दिन मीठे चावल बनते थे और भैंसों तथा अन्य पशुओ को पत्थर की गरम कंकरी से छोप लगाया जाता था| विश्वास किया जाता था कि इससे ये पशु साल भर बीमार नहीं होते थे| इसी दिन वन गुज्जर मैदानी क्षेत्रो से पहाडी बुग्यालो के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं| इस प्रकार बैसाखी का वन-गुज्जरों में विशेष महत्व हैं| ऊँचे पहाड़ो पर स्थित बुग्यालो से वो फिर सावन-भादो के बाद असोज (क्वार) के महीने में लौटते थे|

वन गुज्जर गाय-भैंस या किसी भी जानवर को वो अपने परिवार के सदस्य के रूप में मानते हैं| उनके मरने पर परिवार में मातम का माहौल हो जाता हैं| कुछ सदस्य रोने लगते हैं| अतः मांस के लिए उनकी हत्या नहीं की जाती| एक परिवार के पास लगभग 25 भैंसें होती हैं| उन्हें सिर्फ दूध के लिए पाला जाता हैं, उनकी भैसों के दूध की गुणवक्ता के कारण उन्हें उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बाजारों में अच्छी कीमत मिलती है।

पथरी और गैंडीखाता गुज्जर बस्तियों में स्थायी रूप से बसने के बावजूद खेती-किसानी से साथ-साथ पशुपालन आज भी उनका मुख्य पेशा है|

सामाजिक संगठन – मुस्लिम वन गुज्जर गोत व्यवस्था का पालन करते हैं, तथा इनमे कसाना, देदड, चेची, लोदा, खटाना, चौहान, बागड़ी, कालस, डिंडा आदि गोत के गुज्जर पाए जाते हैं| इनके सभी गोत्र इनके हिन्दू गुज्जर भाइयो से मिलते हैं| एक गोत्र के लड़का-लड़की भाई-बहन माने जाते हैं| वन गुज्जर को अपनी गुज्जर पहचान पर बहुत गर्व हैं| उनकी बस्ती का नाम ही गुज्जर बस्ती हैं| बहुत से वन गुज्जरों ने बाइक पर अपनी पहचान के तौर पर गुर्जर लिखावा रखा हैं, कुछ वन गुज्जरों ने अपने वाहनों पर गुज्जर चिन्ह भी लगा रखा हैं| मुस्लिम वन गुज्जरों का मानना हैं कि हिन्दू गुज्जरों के साथ उनका खून का रिश्ता हैं, उनकी जाति और गोत एक हैं| गोत व्यवस्था एक हैं| वे हिन्दू गुज्जरों से बड़े प्रेम और उत्त्साह से मिलते हैं| दोनों  एक साथ बैठ कर अपने सांझे इतिहास और सांस्कृतिक विरासत की बड़े गर्व के साथ चर्चा करते हैं| दोनों के बीच इस बात पर अच्छा-खासा जोर है कि भले ही उनके धर्म अलग अलग हैं लेकिन ख़ुशी या गम में एक दूसरे से मिलना चाहिए|

जनजाति पंचायत व्यवस्था- गुज्जरों में एक संस्था के रूप में परम्परगत जनजाति पंचायत आज भी प्रभावी रूप से विध्यमान हैं| आपस में किसी में वाद-विवाद झगडे की दशा में गुज्जर जनजाति के पैंच (पंच) फैसला करते हैं| जोकि सभी को मान्य होता हैं| कोर्ट कचहरी में मामले बहुत कम जाते हैं| अंततः विवादों के लगभग सभी फैसले पैंच (पंच) ही करते हैं| घरो की बैठकों में मूढो रखने का रिवाज़ हैं, थोडा-बहुत हुक्के का प्रचलन भी हैं|

हकीका- बच्चे के जन्म पर दावत दी जाती हैं उसे हकीका कहते हैं|

विवाह- मुस्लिम वन गुज्जर हिन्दू गुज्जर की तरह ही गोत्र बचा कर शादी ब्याह करते हैं। वन  गुज्जरों में न्योते मुह-जबानी दिए जाते हैं, कार्ड अन्य लोगो के लिए छपवाए जाते हैं| वन गुज्जर मुख्यत्तः शाकाहारी भोजन करते हैं। विवाह के अवसर पर दावत में घी-बूरा और दाल चावल का प्रयोग किया जाता हैं| शादी-ब्याह के मोके पर दुल्हन के मामा भात देते हैं| दहेज़ प्रथा का प्रचलन रहा हैं, लड़की को दहेज़ में भैंस दी जाती हैं| विवाह के समय स्त्रियों द्वारा गूजरी भाषा में मंगल गीत, जिन्हें बैंत कहते हैं, गाये जाते हैं| शादी-ब्याह के समय बारात में मनोरंजन के लिए मुगदर हिलाना और हाथ छुड़ाना जैसे शक्ति प्रदर्शन के खेल भी होते हैं|

मृत्यु भोज प्रथा- परिवार जन की मौत पर मृत्यु भोज दिया जाता हैं| मौत के सातवे और चालीसवे दिन रिश्तेदार और मित्र घर पर आते हैं और एक भोज का आयोजन होता| मृत्यु एक साल बाद बरसी होती हैं और उस पर कुटुम्ब और रिश्तेदारों को बुलाया जाता हैं और भोज किया जाता हैं|

खान-पान- वन गुज्जर मुख्यत्तः शाकाहारी भोजन करते हैं। विवाह के अवसर पर दावत में घी-बूरा और दाल-चावल का प्रयोग किया जाता हैं| बानियाँ गोत के मुस्लिम गुज्जर दीपावली के दिन मीठे चावल बनाते हैं| बैसाखी के दिन का, ऋतु प्रवास के सन्दर्भ में, वन गुज्जरों में विशेष महत्व हैं, इस दिन मीठे चावल बनते हैं| पालतू पशु की मांस के लिए उनकी हत्या नहीं की जाती| उन्हें सिर्फ दूध के लिए पाला जाता हैं| वन गुज्जरो का भोजन दूध-दही-मक्खन पर आधारित शाकाहारी भोजन हैं| शादी ब्याह या किसी कारज में थोडा-बहुत हुक्के का प्रचलन भी हैं|

वस्त्र-पहनावा- महिलाओ में पर्दा प्रथा नहीं हैं| वे सलवार कुर्ता पहनती हैं, और सिर ढककर रखती हैं| सिर ढकने के लिए चादरी अथवा ओढनी का प्रयोग करती हैं| विवाहित महिलाये नाक में बड़ी गोल लोंग पहनती हैं| पहले के समय में चांदी की हसली गले में पहनती थी| ओढनी/ ओन्ना तथा चांदी की भारी हसली पहनने का रिवाज़ हिन्दू गुज्जर महिलाओ में भी रहा हैं| परंपरागत रूप से वन गुज्जर कुर्ता और तहमद पहनते हैं| पुरुष दाढ़ी-मूंछ रखते हैं और  सफ़ेद या काले रंग की गूजरी पगड़ी बांधते हैं अथवा नीचे से गोल और ऊपर से नुकीली गूजरी टोपी पहनते हैं| | बाहर जाते वक्त हाथ में लाठी रखते हैं| सर्दियों में परागत फुतोई पहनते हैं| गर्म चादर ओढ़ते हैं, जिसे पट्टी कहते हैं|

गूजरी भाषा- वन गुज्जरों की अपनी भाषा “गूजरी” हैं जो अधिकांशतः राजस्थानी से मिलती हैं, परन्तु इस पर पंजाबी और डोगरी का प्रभाव भी हैं| यह एक ऐतिहासिक सच हैं कि आधुनिक गुजराती और राजस्थानी भाषाओ की उत्पत्ति गुर्जरी अपभ्रंश से हुई| गुर्जरी अपभ्रंश सातवी-आठवी शताब्दी में आधुनिक राजस्थान जोकि उस समय गुर्जर देश/ गुर्जरत्रा भूमि कहलाता में प्रचलित थी|अतः वन गुज्जरों की गूजरी भाषा की राजस्थानी से समानता ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि करता हैं|

वन गुज्जरों की समस्याए और अपेक्षाए- वन गुज्जरों के पास उनके ग्रीष्मकालीन ‘गोविंद पशु विहार राष्ट्रीय उद्यान’ तथा अन्य बुग्यालो और शीतकालीन आवासों में पशु चुगान के वैध परमिट हैं। लेकिन अधिकारियों द्वारा उन्हें पार्क में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। उत्तराखण्ड के माननीय  उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में गोविंद पशु विहार राष्ट्रीय उद्यान के भीतर स्थित बुग्यालों, हिमालयी अल्पाइन घास के मैदान, में अपने ग्रीष्मकालीन निवासों में प्रवास करने के वन गुज्जरों के अधिकार को बरकरार रखता है। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) के आधार पर उक्त आदेश निर्गत किया हैं|

वन गुज्जरों की मांग हैं कि सरकार को सभी ऋतू प्रवास करने वाले अर्ध घुमंतू गुज्जरों को विस्थापित कर बसा देना चाहिए| तभी वे राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड सकेंगे| उनके बच्चे पढ़ पाएंगे और उन्हें समय चिकित्सा आदि सभी सुविधाए मिल पाएंगी|

उनके बुज़ुर्ग कभी सैकड़ो वर्ष पहले जम्मू से हिमाचल होते हुए उत्तराखण्ड आये थे, वहाँ दोनों राज्यों में अर्ध घुमंतू चरवाहा गुज्जरों को एस टी का दर्ज़ा वर्षो पहले मिल गया हैं| मूल रूप से उन्ही का हिस्सा होते हुए, उनके जैसे ही हालात हुए भी, अभी तक उन्हें उत्तराखण्ड में यह दर्ज़ा प्राप्त नहीं हैं, जोकि वन गुज्जरों के विकास के लिए परम आवश्यक हैं|

वन गुज्जरों का यह मत है कि जो कृषि भूमि उन्हें गुज्जर बस्ती में आवंटित की गई हैं उसके कब्ज़े आदि के दस्तावेज़-प्रमाणपत्र आदि उन्हें मिल जाने चाहिए, जोकि अभी तक अप्राप्त हैं|

सन्दर्भ –

1.     साक्षात्कार- गनी कसाना, गुज्जर बस्ती पथरी, हरिद्वार, दिनांक 4.10.2024

2.     साक्षात्कार-  श्री सुलेमान कसाना, गुज्जर बस्ती पथरी, हरिद्वार, दिनांक 4.10.2024

3.     साक्षात्कार-  चौधरी शफी लोदा, गुज्जर बस्ती गैंडीखाता, हरिद्वार, दिनांक 18. 10.24

4.     साक्षात्कार-  चौधरी वजीर चोपड़ा गुज्जर बस्ती गैंडीखाता, हरिद्वार, दिनांक 18. 10.24

5.     साक्षात्कार- श्री आमीर हमजा, कुनाऊचौड, पौड़ी गढ़वाल, दिनांक 3.1.25  

6.     साक्षात्कार- चौधरी रफ़ी गुज्जर नरेंद्रनगर, दिनांक 3.1.25 

डॉ सुशील भाटी वन-गुज्जरों से बातचीत करते हुए 


 

Tuesday, December 30, 2025

चौहान गुर्जरों की कलस्यान चौरासी खाप

डॉ सुशील भाटी

शामली जिले के कैराना और कांधला क्षेत्र में यमुना नदी के पूर्वी तट पर चौहान गुर्जरों की कलस्यान खाप के 84 गाँव आबाद हैं| प्रसिद्ध इतिहासकार राम शरण शर्मा अपनी पुस्तक भारतीय सामन्तवाद में कहते हैं कि अपने नव विजित क्षेत्र में, 12 अथवा उसके गुणांक 24, 60, 84, 360  की संख्या में गाँवो की जागीर अपनी सेना के विजेता सरदारों को प्रदान करने की परिपाटी, कन्नौज के गुर्जर प्रतीहार सम्राट तथा  उनके गुहिल, तोमर, चौहान आदि सामंतो की रही हैं| कल्स्यान गुर्जर इस खाप को बसाने का श्रेय हरिराज चौहान उर्फ़ राणा हर्रा को प्रदान करते हैं| हरिराज चौहान दिल्ली-अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान उर्फ़ राय पिथोरा के भाई थे| अतः चौहान गुर्जरों की यह कलस्यान चौरासी खाप मूलतः एक जागीर हैं जिसे पृथ्वीराज राज चौहान ने अपने भाई हरिराज चौहान को प्रदान किया था| हरिराज चौहान ने पंजीठ गाँव को चौरासी का केंद्र बनाया| उसने इस क्षेत्र में तीतरवाडा गाँव के त्तीतर खान को मारकर क्षेत्र के लोगो को उसके ज़ुल्मो से मुक्ति दिलाई थी| अपने पुत्र कल्सा को इस जागीर की देखभाल का कार्य सौप कर हरिराज चौहान अजमेर चले गएँ| 1192 में पृथ्वीराज चौहान तराइन के दूसरे युद्ध में मौहम्मद गोरी से पराजित हो गए और दिल्ली पर तुर्कों का कब्ज़ा हो गया| किन्तु चौहानों ने हरिराज चौहान के नेतृत्त्व में अजमेर से तुर्कों के विरुद्ध संघर्ष ज़ारी रखा| कालान्तर में चौहान अजमेर में भी पराजित हुए| परिणाम स्वरुप चौहान राजपरिवार के सदस्यों ने रणथम्भोर को अपना केंद्र बना लिया| मशहूर इतिहासकार डिर्क एच ए कोल्फ के अनुसार यह हरिराज चौहान बगडावत गुर्जरों का भी दादा था|

इधर हरिराज चौहान के पुत्र कल्सा ने पंजीठ के अतिरिक्त कैराना को अपना केंद्र बनाया और चौरासी का संचालन किया| कल्सा के नाम पर ही यह चौरासी कलस्यान चौरासी खाप कहलाई|  मुग़ल बादशाह अकबर के समय भी कलस्यान खाप प्रभावशाली रूप से अस्तित्व में थीसर्वखाप पंचायत के सौरम गाँव में स्थित कार्यालय के दस्तावेजों के अनुसार 1578 ई. में अकबर ने दिल्ली सूबे की पांच खाप जिनमे बालियान जाट खाप, कलस्यान गूजर खापसलकलेन जाट खापदहिया जाट खाप तथा गठवाला जाट खाप सम्मिलित थी, के लिए एक फरमान ज़ारी कर उन्हें धार्मिक मामलो और आतंरिक प्रशासनिक मामलो में स्वतंत्रता प्रदान की थी| आज भी कलस्यान खाप के चौहान गुर्जर बालियान और सलकलेन जाटो से विशेष भाईचारा मानते हैंअबुल फज़ल द्वारा लिखित आईन-ए-अकबरी पुस्तक के अनुसार दिल्ली सूबे की सहारनपुर सरकार में कैराना महल के जमींदार गूजर जाति के थेइसके अतिरिक्त कांधला जोकि दिल्ली सरकार के अंतर्गत था, वहाँ के जमींदार भी गूजर जाति के थेइस प्रकार हम देखते हैं कि अकबर के शासनकाल में कल्शान चौरासी के क्षेत्र कैराना-कांधला में गूजर जमींदार थेकैराना में आज भी कलस्यान चौपाल हैं, जहाँ खाप की आवश्यक बैठक होती हैंकलस्यान खाप के वर्तमान चौधरी कैराना के चौधरी रामपाल हैं, जोकि  मूलतः पंजीठ गाँव से हैं| हालाकि कुछ पीढियों पहले उनका परिवार कैराना में बस गया था| उनके चाचा चौधरी हुकुम सिंह (1938 -2018) कैराना से सांसद और विधायक रहें हैं|  सन 1964 तक चौधरी हुकुम सिंह के दादा चौधरी मान सिंह कलस्यान खाप के चौधरी थे| उसके बाद चौधरी मान सिंह के बड़े पुत्र चौधरी मुख्तार सिंह 1964 से 2003 ई. तक खाप के चौधरी रहें| उसके बाद चौधरी मुख्तार सिंह के पुत्र चौधरी रामपाल सिंह 2003 से कलस्यान खाप के चौधरी हैं|

तुर्कों और मुगलों के काल में कलस्यान खाप के कुछ परिवारों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था| कलस्यान खाप के ग्राम माल्हीपुर में जन्मे मशहूर इतिहासकार राणा अली हसन चौहान के अनुसार उनके पूर्वज राणा वीरसाल ने 1300 ई. के आस-पास इस्लाम धर्म अपनाया था| राणा अलीहसन चौहान के अनुसार हरिराज चौहान (हर्रा) की सत्ताईस्वी पीढ़ी में उनका जन्म हुआ| राणा वीरसाल के अतिरिक्त चौहान गुर्जरों की कल्शान खाप के बहुत से अन्य परिवारों एवं गाँवों ने भी इस्लाम धर्म काबुल कर लिया था कलस्यान चौरासी का मूल मुख्यालय पंजीठ के एक परिवार ने भी इस्लाम धर्म अपना लिया और वो पास में ही जन्धेदी गाँव में बस गया| जबकि उनके हिंदू भाई ही काल्स्यान खाप की चौधर संभालते रहे। जन्धेडी के इसी मुस्लिम कलस्यान गुर्जर परिवार में कालांतर में चौधरी अख्तर हसन (कलस्यान) का जन्म हुआ, उनका परिवार कैराना के मोहल्ला "आल दरम्यान" में आकर बस गया| उन्होंने कैराना में एक चबूतरा स्थापित किया और वहाँ से अपनी सामाजिक और राजनैतिक गतिविधिया का संचालन किया|वे 1984 में कैराना से सांसद निर्वाचित हुए| उनकी विरासत को उनके पुत्र चौधरी मुनव्वर हसन (कलस्यान) (1964-2008) ने संभाला जोकि संसद और विधानसभा के चारो सदनों के सदस्य रहें, इस उपलब्धि के कारण उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज हैं| वर्तमान में चौधरी अख्तर हसन के पोते चौधरी नाहिद हसन (कलस्यान) कैराना से विधायक और पोती चौधरी इकरा हसन (कलस्यान) कैराना से सांसद हैं|

इस प्रकार हम देखते कि कलस्यान खाप के मूल मुख्यालय पंजीठ से सम्बंधित एक ही खानदान के एक  हिन्दू और एक मुस्लिम कलस्यान परिवार खाप की सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों को नियंत्रित कर रहें हैं|

कलस्यान खाप में बीनडा गाँव की भी एक अलग पहचान हैं| आज़ादी के बाद 1950 ई. में सर्व खाप पंचायत को फिर से सक्रिय किया गया| इस हेतु मुज़फ्फरनगर के सोरम गाँव में सर्वखाप  पंचायत का आयोजन किया गया| पंचायत में पश्चिमी यू. पी., हरियाणा और पंजाब की विभिन्न जातियों की लगभग 18 खापो ने भागेदारी की| बीनडा गाँव के चौधरी जवान सिंह (कलस्यान) गुर्जर को सर्वखाप पंचायत का प्रधान चुना गया| ठाकुर यशपाल सिंह निवासी ग्राम पनियाला को सर्वखाप का उप प्रधान तथा एवं ग्राम सोरम के चौधरी कबूल सिंह (जाट) को सर्वखाप का मंत्री/वजीर चुना गया| सर्वखाप पंचायत ने बहुत से महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए, जो प्रतिभागी सभी खापो और जातियों के लिए बाध्यकारी थे| बीनडा गाँव से चौधरी नारायण सिंह सन 1979-80 में (कलस्यान) उत्तर प्रदेश के पहले उप मुख्यमंत्री रहें| इनके पुत्र श्री संजय (कलस्यान) चौहान बिजनौर लोकसभा से सांसद रहें तथा वर्तमान में इनके पोते श्री चन्दन चौहान बिजनौर से सांसद हैं|

कलस्यान खाप का जसाला गाँव भी महत्वपूर्ण हैं| यहाँ के चौधरी अजब सिंह कांधला से विधायक रहें| बाद में उनके भतीजे चौधरी वीरेंदर सिंह अनेक बार कांधला से विधायक रहें| उनके दूसरे भतीजे चौ. यशवीर सिंह 1989 में खादी एवं ग्राम उद्योग के अध्यक्ष बने| चौधरी वीरेंदर सिंह के सुपुत्र श्री मनीष चौधरी शामली जिले के जिला पंचायत अध्यक्ष रहें हैं| डुंडुखेड़ा गाँव में कलस्यान इंटर कॉलेज हैं|

इस प्रकार स्पष्ट हैं कि कलस्यान खाप की क्षेत्रीय समाज और राजनीती में महत्वपूर्ण भूमिका हैं| इसका  प्रमुख कारण कलस्यान खाप की एकता हैं|

गुर्जरों की कलस्यान खाप में 84 गाँव, जोकि मुख्यतः जनपद शामली के अंतर्गत आते हैं, की सूची निम्नवत हैं-  

मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों के गाँव की सूची – 1. पंजीठ  2. जन्धेडी 3. मंडावर 4. गंदरऊ  5. दभेडी खुर्द 6. गढ़ी मियां 7. रामडा 9. खुरगान 10. बसेड़ा 11. अकबरपुर सुन्हेटी 12. गढ़ी दौलत 13. मंसूरा 14. मुकुंदपुर खेडी 15. बरनावी 16. रोटन 17. ओदरी 18. ख्वाजपुरा/कबीरपुर 19. फतेहपुर (यमुना किनारे)  20. असरपुर/अशरफपुर 21. बधुपुरा 22. बराला 23. गोंगवान 24 केरटू  25. माल्हीपुर (मशहूर इतिहासकार राणा अली हसन का पैतृक गाँव) 26. चौंतरा 27. मलकपुर 28. जडाना 29. दुगड्डा 30. अम्भेटा 31. गढ़ी अब्दुल्ला, 32. साल्हा खेडी 33. तसंग 34. बरनऊ

यमुना नदी द्वारा अपना रास्ता बदलने के कारण मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों के कुछ गाँव हरयाणा में चले गएँ, जो इस प्रकार हैं- 1.पत्थरगढ़ (राय पिथोरा के नाम पर), 2. जलालपुर 3. गढ़ी बैसख 4. राणा माजरा 5. बल्हेडा 6. मुण्डी गढ़ी, 7. नवादा  

हिन्दू-मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों के मिश्रित गाँवो की सूची – 1. कैराना, 2. भूरा 3. पावटी कला 4. बलवा गुजरान 5. खन्द्ररावली 6. खेडा कुरतान 7. तीतरवाडा  8. अलीपुर  9. जहानपुरा  10. कांधला 11. ममौर   

हिन्दू कलस्यान गुर्जरों के गाँव की सूची – 1. कंडेला 2. शेखूपुरा 3. हिंगोखेड़ी 4. मीमला 7.  ऊँचागाँव 8.  गुर्जरपुर 9. बीनडा 10. पंजोखरा 12. बुच्चाखेडी 13. फतेहपुर 14. जगनपुर 15. आल्दी 16. गढ़ी रामकौर 17. डुंडुखेड़ा 18. श्याम गढ़ी 19. रसूलपुर 20. जसाला 21. ब्रह्मखेडा  22. डूढार 23. बल्हेडा 24. इस्सोपुर टील, 25. सहपत 26. बोड्ढा 27. गढ़ी राडा 28. चढाव 29. सलेमपुर  30 पठेड 31. बीबीपुर 32. डोंकपुरा 33. जैनपुर 34. गंगेरु 35. ककौर

दिल्ली रोड के पूर्व में कलस्यान चौरासी के सात गाँव पड़ते हैं, इन्हें सतगामा भी कहते हैं| ये सात गाँव इस प्रकार हैं- जसाला, रसूलपुर, मीमला, बलवा गुजरान, पंजोखरा, और ब्रह्मखेडा| इस सतगामे की चौधर लम्बे समय तक माल्हीपुर गाँव में रही हैं| आज़ादी से पहले माल्हीपुर के बाबा न्यादरा सतगामे के प्रसिद्ध चौधरी थे| इस सतगामे की पुरानी धर्मशाला खंद्रावली रेलवे स्टेशन के ठीक सामने स्थित हैं| यह धर्मशाला इस सतगामे की चौधर का प्रतीक हैं, वर्तमान में बड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं| बाबा न्यादर अली उर्फ़ न्यादरा गुर्जर जाति की जो भी बारात खंद्रावली रेलवे स्टेशन आती थी, उन सभी का उचित सत्कार कर उन्हें अपनी बैलगाडियो से उनके गंतव्य तक पहुचाते थे| माल्हीपुर के श्री क़ुतुब मुखिया भी सतगामे के चौधरी रहें हैं| वर्तमान में बलवा गाँव के चौधरी अनिल सिंह (कलस्यान) सतगामे के चौधरी हैं|

कलस्यान चौरासी में एक नौगामा भी जिसमे आल्दी, फतेहपुर, गुर्जरपुर, सलेमपुर, मलकपुर आदि गाँव हैं| आल्दी के चौधरी पहल सिंह नौगामे के मौजूदा मुखिया हैं|

इसी प्रकार कलस्यान चौरासी में एक बारहा भी हैं जिसमे तीतरवाडा, सहपत, चढाव, गंगेरु, गढ़ी दौलत, डुंडुखेड़ा,ऊँचा गाँव, बुच्चाखेडी आदि गाँव हैं| वर्तमान में तीतारवाडा के चौधरी सुरेश सिंह बारहा के चौधरी हैं|  

खुरगान के चौधरी फतेहजंग भी क्षेत्र की मशहूर हस्ती रहें हैं, जोकि अपनी दरियादिली के लिए जाने जाते हैं| खुरगान मुस्लिम कलस्यान गुर्जरों का सबसे बड़ा गाँव हैं| कांधला के चौधरी शफकत जंग 1971 में कैराना से सांसद रहें, उनके यहाँ सभी हिन्दू-मुस्लिम कलस्यान गुर्जर आते-जाते थे, और एक ही हुक्का पीते थे|

गुर्जरों की कलस्यान खाप एकता की मिसाल हैं| कलस्यान खाप हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो के मानने वाले गुर्जर हैं किन्तु वे समाज में बहुत भाईचारे से रहते हैं, वे सभी अपने को बाबा कल्सा की संतान मानते हैं| राजनीती में भी वो धर्म-संप्रदाय से ऊपर उठकर जाति के उमीदवार को वोट करते हैं|

 

सन्दर्भ –

1. Dirk H A Kolff, Naukar, Rajput and Sepoy, Cambridge University Press, 1991, p 83

2 . राणा अली हसन चौहान, गुर्जरों का संछिप्त इतिहास (अनुवाद- श्री ओमप्रकाश गुर्जर (गांधी), यमुनानगर, 2001

3. R S Sharma, Indian Feudalism, AD 300-1200, Macmilan publishers pvt. ltd, Delhi, 1965

4. Sushil Bhati, Khaps in Upper Doab of Ganga and Yamuna, Janitihas Blog, 2017 https://janitihas.blogspot.com/2017/01/khaps-in-upper-doab-of-ganga-and-yamuna.html

5. John F Richards, The Mughal Empire, Part 1, Vol. 5, Cambridge University Press, 1995

6 . M C Pradhan, The political system of the Jats of Northern India. 1966

7. Abul Fazl Allami, Ain I Akbari, Vol. II (Translation- H S Jarrett), Calcutta, 1981
8. D.R. Chaudhary, Khap Panchayat and Modern Age, National Book Trust, 2014

9. “For instance, in its first sarv khap panchayat after independence in Sorem in the district of Muzaffarnagar of western UP held in 1950, Chaudhary Jawan Singh Gurjjar of the village Beenra Niwas was its pradhan, Thakur Yashpal Singh of village Puniala was UP Pradhan, while Chaudhary Kabul Singh of village Sorem was its mantri,” https://iajesm.in/admin/papers/67cec74342bb6.pdf

10. अनिरुद्ध चौहान (कलस्यान), ग्राम ब्रह्मखेडा, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 26.12.25

11. चौधरी मैसर अली (कलस्यान) चौहान, ग्राम माल्हीपुर, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 27.12.25 

12. श्री सतीश कलस्यान, ग्राम गढ़ी रामकौर, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 28.12.25 

13. श्री विनय कलस्यान, ग्राम जसाला, जिला शामली, टेलीफोनिक साक्षात्कार, दिनांक 29.12.25 

14. सुशील भाटी, राणा अली हसन चौहान की वंशावली, Janitihas Blog, 2023 https://janitihas.blogspot.com/2023/06/

 

  

कलस्यान चौरासी खाप के चौधरी रामपाल सिंह डॉ सुशील भाटी के साथ