डॉ. सुशील भाटी
1857
का प्रथम
स्वतंत्रता संग्राम ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ भारतीय सैनिकों और आम जनता का एक
बड़ा विद्रोह था। यह विद्रोह उत्तर भारत में मुख्य रूप से मेरठ, बुलंदशहर, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी आदि स्थानों पर केंद्रित था, किन्तु सहारनपुर क्षेत्र में भी इसका व्यापक
प्रभाव हुआ। 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सैनिको के अतिरिक्त धन सिंह कोतवाल
के नेतृत्त्व में वहाँ की पुलिस, सदर बाज़ार की
भीड़ और आस-पास के हजारो गूजरों ने स्वतंत्रता संग्राम का विस्फोट कर दिया| जैसे ही यह खबर सहारनपुर पहुँची वहाँ के गूजरों
ने बुड्ढा खेडा गाँव के फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध
विद्रोह कर दिया|
सहारनपुर में इस
विद्रोह के पीछे जनपद के गूजरों के राजनैतिक उद्देश्य भी थे| जिन्हें समझने के लिए हम सहारनपुर जिले के
गूजरों की सामाजिक-राजनैतिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक हैं| नेविल द्वारा लिखित सहारनपुर डिस्ट्रिक्ट
गज़ेटियर के अनुसार पहले सहारनपुर जिले एक बड़े भाग को गुजरात कहा जाता था| वह कहता कि जिले के तीन भाग माने जाते हैं, इनमे से केन्द्रीय भाग, जिसमे गंगोह, रामपुर और नकुड क्षेत्र आते हैं, के अतिरिक्त
मुज़फ्फरनगर का लगा हुआ क्षेत्र गुजरात कहलाता था| एरिक स्टोक्स पीजेंट आर्म्ड पुस्तक में बताते हैं कि इस गुजरात में
मुज़फ्फरनगर जिले के कैराना और झिंझाना परगना भी सम्मिलित थे| इस प्रकार गंगोह के चारो तरफ विस्तृत बटार
गूजरों की बावनी गुजरात का हिस्सा थी| इस बावनी के
अतिरिक्त उक्त गुजरात में खूबड़ पंवार गूजरों की चौरासी, राठी गूजरों का बारहा, छोक्कर गोत के गूजरों का बारहा, तंवर गूजरों का बारहा, धूलि गोत के गूजरों का बारहा, कैराना के कल्सियान चौहान गूजरों की चौरासी जैसी
मज़बूत खाप थी| सहारनपुर जिले में गूजर सबसे बड़े
भूमिपति थे| तत्कालीन सहारनपुर जनपद में स्थित
लंढोरा रियासत के राजा भी गूजर थे| लंढोरा रियासत
में करीब आठ सौ गाँव थे, जोकि जवालापुर, निकट हरिद्वार से लेकर बहसूमा तक फैले हुए थे| अतः अठारवी शताब्दी में सहारनपुर जनपद में गूजर
सामाजिक और राजनैतिक रूप से अत्यंत प्रभावशाली जाति थी| किन्तु 1813 में लंढोरा के राजा रामदयाल गूजर का
निधन होने के बाद अंग्रेजो ने रियासत को कई ताल्लुको में बाँट दिया, और रियासत का बड़ा भाग अपने पास रख लिया| इस वज़ह से गूजरों में एक भारी राजनैतिक असंतोष
था| इसी कारण से 1824 में भी ईस्ट इंडिया
कंपनी के विरुद्ध गूजर विद्रोह हो चुका था, जिसका नेतृत्व
कलुआ गूजर और कुंजा बहादुरपुर के ताल्लुकेदार विजय सिंह गूजर ने किया था| गुजरात (सहारनपुर) के गूजर ब्रिटिश शासन को उखाड़
कर पुनः अपना गूजर राज़ स्थापित करना चाहते थे| फतुआ गूजर ने क्षेत्रीय गूजरों की भावनाओ के अनुरूप अंग्रेजो को अपने
पूर्वजों के क्षेत्र गुजरात से बाहर निकालने का आव्हान किया| उसके आव्हान पर पूरे जिले के गूजर इस स्वतंत्रता
संग्राम में कूद पड़े| मुस्लिम राजपूत रांघडो ने भी उनका
साथ दिया|
सहारनपुर
गज़ेटियर के अनुसार 12 मई 1857 को मेरठ में सैनिक और आम जनता के विद्रोह की खबर
सहारनपुर पहुँच गई| उस समय आर. स्पेंकी जिले में
मजिस्ट्रेट और एच. डी. रोबर्टसन जॉइंट मजिस्ट्रेट थे| जिले के गूजरों और रांघडो ने अपनी विद्रोही
गतिविधियाँ आरम्भ कर दी| 21 मई को सहारनपुर के निकट उन्होंने मुल्लीपुर गाँव
को लूट लिया| गूजर और रांघड किसान अंग्रेजो की
राज़स्व नीति से भी असंतुष्ट थे| लगान बहुत अधिक
था, और लगान चुकाने के लिए साहुकारो से
भारी सूद पर ऋण लेना पड़ रहा था| उनकी ज़मीने
नीलाम हो रही थी| साहुकारो को अंग्रेजी प्रशासन
तहसील-थानों का संरक्षण प्राप्त था| अतः जैसे ही
मेरठ में सैनिक और आम जनता के विद्रोह की खबर सहारनपुर पहुंची, गूजर और रांघडो ने साहुकारो और बैंकरो को लूटना
आरम्भ कर दिया और ब्रिटिश राज के दमन के प्रतीक तहसील, थानों, और जेलों को
निशाना बनाने की योज़ना बनाने लगे| 27 मई को जॉइंट
मजिस्ट्रेट रोबर्टसन ने क्रांतिकारी गूजरों के बाबूपुर, फतेहपुर, सांपला बकल आदि
गाँवो पर हमला किया| लगभग 400 विद्रोहियों ने जमकर
अंग्रेजो का मुकाबला किया| सैकड़ो विद्रोही
मारे गए| अंग्रेजो की जीत हुई विद्रोही गाँवो
का जला दिया गया| 30 मई को मजिस्ट्रेट स्पेंकी मंगलौर
पहुँच गया जहाँ जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन भी अपनी सेना लेकर पहुँच गया| मंगलौर को आधार बनाकर उन्होंने मानिकपुर आदमपुर
गाँव पर हमला किया| इस गाँव के उमराव सिंह गूजर ने अपने
आप को राजा घोषित कर आस-पास के क्षेत्रो से लगान वसूलना आरम्भ कर दिया था| अंग्रेज उमराव सिंह को पकड़ने में नाकामयाब रहें, और उन्होंने गाँव को आग में जलाकर खाक कर दिया|
उमराव सिंह के
बलिदान के बाद जिले के क्रांतिकारियों का नेतृत्त्व पूरी तरह से फतुआ गूजर के हाथो
में आ गया| फतुआ गूजर की पुकार पर बटारो की
बावनी सहित सम्पूर्ण गुजरात अंग्रेजो के विरुद्ध एकजुट हो गया| फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में लगभग 3000
हिन्दू-मुस्लिम गूजरों और रांघडो ने गंगोह में ब्रिटिश पुलिस चौकी पर हमला बोल
दिया, और पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया| उसके बाद राजा फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में
स्वतंत्रता सेनानियों ने गंगोह से नकुड की तरफ कूच कर दिया| संढोली गाँव के चौधरी फ़तेह सिंह भी अन्य
विद्रोहियों के साथ नकुड पहुँच गएँ| इनके अतिरिक्त
टाबर गाँव के बख्शी राजपूत भी अपने साथियों के साथ फतुआ गूजर के समर्थन में नकुड
पहुँच गए| फतुआ गूजर की अगुआई में स्वतंत्रता
सेनानियों ने नकुड तहसील और पुलिस थाने को आग के हवाले कर दिया| सभी राज़स्व सम्बंधी दस्तावेज़ और महाजनों के खाते
जला कर ख़ाक कर दिए गए| अंग्रेज परस्त साहुकारो को भी नहीं
बख्शा गया| उनकी हवालियो और घरो पर भी हमला बोल
सभी प्रकार के बही खाते जला दिए गए| नकुड के बाद
सरसावा का भी यही हश्र हुआ| इब्राहिमी गाँव
के आलियाँ खटाना भी फतुआ गूजर के प्रमुख सहयोगी थे| सरसावा की क्रांतिकारी घटनाओ में चौधरी आलियाँ खटाना की विशेष भूमिका
थी|
20 जून को नकुड
के घटानक्रम की जानकारी होने पर जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन तुरंत वहाँ पहुँच गया| उसका साथ 30 गोरखा और 40 पटियाला घुडसवार थे| उसने देखा की विद्रोही जा चुके थे, और तहसील और पुलिस थाने से आग की लपते उठ रही थी| अंग्रेजी प्रशासन के अनुसार मुसलमानों के घरो को
छोड़ कर पूरे नकुड कस्बे को लूट लिया गया था|
क्षेत्र की जनता
ने पंचायत कर फतुआ गूजर को राजा घोषित कर दिया| फतुआ गूजर का राजा घोषित किया जाना ब्रिटिशराज को खुली चुनौती थी| ब्रिटिश प्रशासन इन घटनाओ से बहुत चिंतित हो गया| उसने फतुआ गूजर के जिन्दा या मुर्दा पकडवाने पर
200 रूपए का इनाम घोषित कर दिया, जोकि उस ज़माने
में एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी|
अंग्रेजी
प्रशासन ने प्रतिक्रिया और बदले की कार्यवाही आरम्भ कर दी| सबसे पहले फतेहपुर गाँव पर रोबर्टसन ने उपरोक्त
वर्णित अपनी सेना लेकर आक्रमण किया| आस-पास के सभी
गाँव फतेहपुर की रक्षा के लिए एकत्रित होकर वहाँ पहुँच गये| रोबर्टसन को पीछे हटना पड़ा| दो दिन बाद 22 जून को बोईसरगोन अपनी गोरखा सेना
के साथ वहाँ पहुँच गया| स्वतंत्रता सेनानियों और अंग्रेजो की
सयुक्त सेना के बीच जमकर युद्ध हुआ| जिसमे भारतीय
भारी मात्रा में शहीद हुए| विजेता अंग्रेज
सेना ने फतेहपुर और आस-पास के चार गाँवो में आग लगा उन्हें नष्ट कर दिया| 23 जून को संढौली और रणदेवा आदि
क्रांतिकारी गाँवों को अंग्रेजो ने
रोबर्टसन के नेतृत्त्व में आग लगा दी| ब्रिटिश विरोधी
इस संघर्ष में अम्बेहटा के आस-पास के घाटमपुर आदि गाँव भी सक्रिय थे, कितु उसके बाद जॉइंट मजिस्ट्रेट रोबर्टसन ने
उन्हें छोड़ सेना के साथ गंगोह की तरफ रुख किया और गूजरों के मुख्यालय, राजा फतुआ गूजर के गाँव बुड्ढा खेडा पर हमला कर
दिया| फतुआ गूजर के नेतृत्त्व में भारतीयों
ने मिटटी के किले में मोर्चा लिया| गूजर, रांघड आदि बहादुरी से लडे किन्तु अंग्रेजो ने
हाथी की सहायता से किले का दरवाज़ा तोड़ दिया| अंग्रेजी सेना
के आधुनिक हथियारों के समक्ष समक्ष भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को हार का सामना
करना पड़ा| अनेक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी शहीद
हो गए| राजा फतुआ गूजर अपने कुछ साथियों के
साथ वहाँ से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहें| अंग्रेजो ने गुस्से में राजा फतुआ गूजर के किले को गिरा दिया, उनके महल को भी तोड़ -फोड़ दिया|
फतुआ गूजर अपने
बचे हुए साथियों के साथ यमुना खादर के जंगलो में चले गए| रोबर्टसन ने उन्हें घेरने का प्रयास किया| इस उपक्रम में बोईसरगोन ने एक सेना के साथ 26 जून
को रांघडो के उमरपुर और मानपुर गाँवो पर आक्रमण किए, जहाँ भारतीयों की भारी शाहदत के बाद अंग्रेज विजयी हुए| कुंडा कलां गाँव के रांघड फतुआ गूजर के विशेष
समर्थक थे अतः अंग्रेजो ने इस गाँव पर भी हमला किया, जहाँ भारी रक्त-पात हुआ और भारतीय का भारी बलिदान हुआ|
उसके पश्चात्
सभवतः 27 जून को गंगोह के समीप राजा फतुआ गूजर और अंग्रेजो के बीच निर्णायक युद्ध
हुआ| भारतीय बहादुरी से लड़ें किन्तु पराजित
हुए, इस युद्ध में हजारो की तादात में
स्वतंत्रता सेनानी शहीद हुए, कहते हैं कि
भूमि पर शहीदों का इतना रक्त गिरा कि वहाँ की भूमि सुर्ख (लाल) हो गई| आज भी यह स्थान बलिदान स्थल सुर्खेवाला कहलाता
हैं|
अंग्रेज
अधिकारियो और कुछ यूरोपीय इतिहासकारों के अनुसार के सहारनपुर में विद्रोह का मुख्य
कारण नकुड और उसके आस-पास के कट्टर मुसलमान थे, जिन्होंने असंतुष्ट हिन्दुओ को विशेषकर गूजरों को ब्रिटिश शासन के
प्रति भड़का दिया था|किन्तु जिस प्रकार फतुआ गूजर के
नेतृत्त्व में क्रांतिकारी भीड़ ने नकुड तहसील के राजस्व रिकार्ड्स और साहुकारो की
हवेलियों और बहीखातो को अपना निशाना बनाया उससे साफ़ पता चलता हैं कि आम व्यक्ति और
किसान अंग्रेजी की भू-राज़स्व व्यवस्था से नाराज़ था| आम व्यक्ति की नज़र में लगान बहुत अधिक था, जिसे चुकाने के लिए वह साहुकारो के ऋण जाल में
जकड़ा हुआ महसूस कर रहा था| फतुआ गूजर के
वर्तमान पारावारिक वंशज चौधरी ताहिर गूजर बताते हैं कि स्वयं बाबा फतुआ गूजर पर
भारी मात्रा में राज़स्व बकाया था, जिस कारण से
उन्हें अंग्रेजी प्रशासन ने प्रताड़ित किया था| यह भी सच हैं कि अठारवी शताब्दी में सहारनपुर का एक बड़ा हिस्सा गूजर
जाति की बाहुल्यता और सामाजिक राजनैतिक वर्चस्व के कारण गुजरात कहलाता था| अतः फतुआ गूजर के लिए गुजरात (सहारनपुर) उसके
पूर्वजों का पारंपरिक क्षेत्र था, जहाँ से वह
अंग्रेजो को बाहर निकलकर पुनः गूजर राज की स्थापना करना चाहता थे| अंग्रेजो ने सहारनपुर में लड़ें गए इस स्वतंत्रता
संग्राम को गूजरों और सहयोगी जातियों की लूटमार कहकर खारिज करने की बेशर्म कोशिश
भी की हैं| परन्तु कई हजारो की तादात में गूजर
और सहयोगी जातियो के लोगो का एकत्रित होकर ब्रिटिश राज़ के प्रतीक चिन्ह तहसील
थानों को नष्ट कर आग लगा देने को लूटमार कहकर खारिज नहीं किया जा सकता हैं, निश्चित ही यह संघर्ष एक स्वतंत्रता संग्राम था|
1857 की इस
जनक्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कीमत राजा फतुआ गूजर के गाँव वासियों
को भी चुकानी पड़ी| ग्रामवासियों के अनुसार राज़स्व
रिकॉर्ड में बुड्ढा खेडा गाँव कच्चा घोषित कर दिया गया और वहाँ के निवासियों की
सभी जमीन-जायदाद जब्त कर ली गई| ईस्ट इंडिया
कंपनी के दमन से बचने के लिए बुड्ढा खेडा गाँव के कुछ वाशिंदे भिस्सल हेडा गाँव
में भी जाकर बस गए| राजा फतुआ गूजर और उनके गाँव बुड्ढा
खेडा के बलिदान के बाद बटार गूजरों की चौधर भी वहाँ से चली गई| आज बटार गूजरों की बावनी के चौधरी शेरमऊ गाँव
में रहते हैं|
आज़ादी के बाद राजा फतुआ गूजर को इतिहास लेखन में वह महत्वपूर्ण स्थान नहीं मिला जिसके वे हक़दार थे| लेकिन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था। उन्होंने सहारनपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक सशक्त प्रतिरोध खड़ा किया| उनका नाम स्थानीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया था| आगामी पीढियां के लिए वो एक प्रेरणा का स्रोत बन गए| उनका विद्रोह भारतीय जनता की आज़ादी की आकांक्षाओं का प्रतीक था। उनके ब्रिटिश विरोधी संघर्ष की लोक स्मृति ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की भावना को जीवित रखा।
राजा फतुआ गूजर के किले/महल की दीवार के अवशेष |
1980 के दशक तक
राजा फतुआ के महल के अवशेष काफी अच्छी अवस्था में देखे जा सकते थे| किन्तु किसी संरक्षण के आभाव में वर्तमान में
वहाँ महल की सिर्फ एक दीवार शेष रह गई हैं| वर्तमान में
चौधरी ताहिर गूजर अपने परिवार के साथ उस स्थान पर रहते हैं, जहाँ फतुआ गूजर का महल
था| चौधरी ताहिर गूजर ने अपने घर के
निर्माण लिए महल की इस अवशेष दीवार को प्रयोग में ले रखा हैं| वो स्वयं को राजा फतुआ गूजर का वंशज बताते हैं| क्षेत्रीय लोगो के अनुसार भी वे राजा फतुआ गूजर
के भाई के वंशज हैं|
आम समाज और आज़ाद
देश की सरकारों द्वारा राजा फतुआ गूजर के बलिदान को भुला दिया गया| उनके वंशज भी आज गरीबी का जीवन जीने को मजबूर हैं| कुछ वर्षो से कुछ समाजसेवियों ने इस तरफ थोडा
ध्यान दिया हैं| क्षेत्र के एक युवा मुस्तकीम चौधरी
राजा फतुआ गूजर के नाम से गंगोह में “हेरोज़ मेमोरियल हाई स्कूल” में कोचिंग सेंटर
चलाते हैं| कुछ वर्षो से क्षेत्र के समाजसेवी
फतुआ गूजर के बलिदान की याद में कार्यक्रम भी करते हैं, परन्तु प्रदेश सरकारो ने अभी तक इस शहीद को
सम्मान देने की तरफ ध्यान नहीं दिया| उनके नाम पर
किसी चौक-चौराहे, सड़क, स्कूल, महाविद्यालय, संसथान आदि का नामकरण, किसी स्मारक का निर्माण, उनके गाँव को शहीद गाँव का दर्ज़ा और उनके परिवार
को आर्थिक सहायता समय की मांग हैं|
सन्दर्भ-
1.
H. R. Nevill, Saharanpur: A Gazetteer, Allahabad, 1909, p 101
2.
Dangli Prasad Varun, Uttar Pradesh District Gazetteer: Saharanpur, Lucknow,
1981, p 64
3. Eric Stroke, Peasant Armed, Oxford, 1986, p 199, 207
4. Ranajit Guha, Elementary Aspects of Peasant Insurgency
in Colonial India, p 313, 318, 321
5. सुशील भाटी, 1857
की जनक्रांति के जनक धन सिंह कोतवाल, दी जर्नल ऑफ़ मेरठ यूनिवर्सिटी
हिस्ट्री एलुमनाई, खण्ड XII, 2008, पृष्ठ
62-66
6. सुशील भाटी, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत राजा विजय सिंह- कल्याण सिंह, प्रकाशक- अशोक चौधरी, मेरठ, 2002
7. R C Majumdar,
History of Freedom Movement in India, Vol. 1, Firma K.
L. Mukhopadhyay, 1971, p 155
8.
R C Majumdar, The History and Culture of the Indian
People: British paramountcy and Indian renaissance, pt. 1, G. Allen &
Unwin, 1951, p 503
9.
R C Majumdar, The Sepoy Mutiny and the Revolt of 1857,
Firma K. L. Mukhopadhyay, 1963, p 106
10. S B
Chaudhari, Civil Rebellion in Indian Mutinies, 1857-1859, 1957, p 77, 287
11.
Denzil Ibbetson, Tribes and castes of Panjab, Lahore, 1916
12.
Biswamoy Pati, The 1857 Rebellion, Oxford University Press, 2007, p 90
13. श्री मुस्तकीम चौधरी, निवासी
गुज्जरवाडा, गंगोह का साक्षात्कार एवं
दूरभाषवार्ता|
14. चौधरी बलबीर सिंह तोमर, निवासी
डूभर किशनपुर, सहारनपुर से दूरभाषवार्ता
साक्षात्कार |
15. चौधरी मुस्लिम चौहान, निवासी ग्राम गढ़ी भरल, ब्लाक
घरोंडा, जिला करनाल से दूरभाषवार्ता साक्षात्कार|
राजा फतुआ गूजर के वर्तमान वंशज चौधरी ताहिर गूजर के साथ डॉ. सुशील भाटी |